नरेंद्र मोदी

फोटोः विकास कुमार
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ऐसा भी कहा गया कि मोदी की इस शानदार जीत में उन मुसलमानों का भी योगदान है जिनको भाजपा का डर दिखाकर सारे दल अपने पाले में करने के लिए सारे करतब करते दिखाई दिए. परिणाम के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि मुस्लिम प्रभाव वाली 92 सीटों में से भाजपा को 41( शिवसेना-3) सीटें हासिल हुईं. पिछली बार से यह संख्या 28 अधिक है.

जो पार्टी सवर्ण हिंदुओं, ब्राह्मणों और बनियों की मानी जाती थी उस पार्टी का जमीन पर सारे सामाजिक समीकरणों को ध्वस्त करना सभी को हैरान कर गया.

ऐसे में इस बात को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या भविष्य में स्थायी तौर पर भाजपा एक ऐसी पार्टी का रूप ले सकती है जिसपर मुस्लिम सहित समाज के सभी वर्ग अपना भरोसा जता सकें?

अजय बोस कहते हैं, ‘भाजपा की ऐसी इच्छा जरूर रहेगी लेकिन ऐसा संभव होता नहीं दिखता. ये तात्कालिक था. ये चुनावी मोबिलाइजेशन था. इस प्रक्रिया में पार्टी खड़ी नहीं हुई है.’ रशीद भी बोस जैसी ही सोच रखते हैं. वे कहते हैं, ‘ये बिलकुल सही है कि मोदी ने इस बार न सिर्फ जातिगत समीकरणों को तोड़ा है बल्कि उसे मुस्लिम मत भी ठीकठाक मिले हैं. लेकिन अभी कोई फैसला देना जल्दबाजी होगी.’

हालांकि रशीद मोदी को लेकर मुस्लिम समुदाय में परिवर्तन की संभावना से इनकार भी नहीं करते हैं. वे कहते हैं, ‘हमें ये सोचना होगा कि केवल वाल्मीकि का ही हृदय परिवर्तन का अधिकार थोड़े ही है. मोदी को लेकर मुसलमानों का नजरिया बदलने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. ये ध्यान रखना जरूरी है कि अब तक जिस नेहरूवियन मॉडल को मुस्लिम अपना समर्थन देते आए हैं. उसमें ये संभव है कि वो अब किसी और मॉडल को परखने की सोच रहे हैं.

खैर विभिन्न वर्गों के लोगों के मन में चाहे जो भी हो यह तय है कि भाजपा जरूर खुद को समाज के सभी वर्गों की पार्टी बनाने की कोशिश करेगी. जिससे आने वाले समय में वर्तमान लोकसभा की सफलता को फिर से दोहराया जा सके.

पूरा देश

भाजपा को हमेशा से इस बात का कष्ट था कि वह भले ही कांग्रेस के समान एक राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन देश के हर कोने में उसकी उपस्थिति नहीं है. पूर्वोत्तर और दक्षिण में पार्टी की अनुपस्थिति उसे हमेशा सालती रहती थी. लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम ने पार्टी को सही अर्थों में राष्ट्रीय बना दिया. 13 से बढ़ते हुए भाजपा इस बार 21 राज्यों में फैल गई. 2009 में पार्टी का जो वोट शेयर 18.8 फीसदी था वह बढ़कर 33.7 फीसदी पर पहुंच गया. अपनी स्थापना के 34 साल बाद आज भाजपा पूरे भारत में दिखाई दे रही है.

उत्तर और पश्चिमी भारत में जहां पहले से उसका अपना एक आधार था वहां सूनामी सरीखी सफलता पा चुकी भाजपा इस बार पूर्वोत्तर और दक्षिण के राज्यों में भी- जहां नॉन प्लेयर मानी जाती थी – हलचल पैदा करने में सफल रही.

पूर्वोत्तर की बात करें तो भाजपा ने असम में अपनी परफॉर्मेंस से सभी को चौंका दिया. सत्ताधारी कांग्रेस की भाजपा ने वहां वह फजीहत की कि मुख्यमंत्री इस्तीफा देने की पेशकश करते दिखाई दिए. पूरे देश में बताई जा रही मोदी लहर नॉर्थ इस्ट में सबसे ज्यादा असम में ही दिखी. भाजपा ने इस बार असम से सात सीटें जीतीं और 36 फीसदी वोट शेयर उसके नाम रहा.

इस बार अरूणाचल में भी भाजपा को एक सीट हासिल हुई. पूर्वोत्तर के आठ राज्यों (सिक्किम,अरूणाचल,असम, मिजोरम,मेघालय,मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड की 25 सीटों में से भाजपा को आठ सीटें मिलीं हैं जो पिछली बार की तुलना में चार अधिक हैं.

वहीं दक्षिण की बात करें तो आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल को मिलाकर कुल 129 सीटों में से भाजपा को 21 सीटें हासिल हुईं. पार्टी ने आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में फिर से खाता खोलने में सफलता पाई. मोदी लहर पर सवार होकर भाजपा 10 साल बाद कन्याकुमारी सीट जीतने में सफल रही. तो उसकी सहयोगी पीएमके को एक सीट मिली.

फोटोः विकास कुमार
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आंध्र में भाजपा से जुड़ने का टीडीपी को भी फायदा मिला. कहा जा रहा है कि शहरी इलाकों में यह मोदी के असर का ही कमाल था कि वायएसआर कांग्रेस नेता जगन रेड्डी की मां विजयम्मा भाजपा से हार गईं. कर्नाटक में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा तीसरे नंबर पर चली गई थी लेकिन इस चुनाव में उसे मात्र दो सीटों का घाटा हुआ और उसने 17 सीटें जीतीं. राज्य में अभी भी वह लोकसभा में सबसे बडी पार्टी के रुप में है. हालांकि केरल में अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा अपना खाता नहीं खोल पाई. तिरुवनंतपुरम में भाजपा के राजगोपाल ने शुरुआत में शशि थरूर पर बढ़त बनाई थी. लेकिन अंत में मात्र 15 हजार वोटों से हार गए. लेकिन राज्य में भाजपा का मत प्रतिशत जरूर दोगुना होकर 10 फीसदी पहुंच गया. उड़ीसा में एक तो आंध्र प्रदेश में उसे तीन सीटें मिली.

यही स्थिति पश्चिम बंगाल में भी रही जहां भाजपा अपनी सीट एक से दो करने में सफल रही. हालांकि उसके वोट प्रतिशत में काफी इजाफा हुआ और वह 18 फीसदी वोटों के साथ टीएमसी और लेफ्ट के बीच अपना स्थान बनाने में सफल रही. गुजरात, राजस्थान, दिल्ली उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा की सभी सीटें जीतने वाली भाजपा ने जीत को छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, यूपी और बिहार में लगभग एकतरफा बना दिया और महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में कांग्रेस को हाशिए पर ठकेल दिया. हरियाणा जहां भाजपा की लोकसभा में बहुत अच्छी स्थिति नहीं रही है, वहां वह 7 सीटें और 33 फीसदी मत जीतने में सफल रही.

तो इन परिणामों के आधार पर क्या हम कह सकते हैं कि भाजपा अब एक ऐसी पार्टी के रूप में विकसित हो गई है जो आने वाले समय में दक्षिण से लेकर पूर्व तक की राजनीति में एक महत्वपूर्ण रोल अदा करेगी.

जानकार मानते हैं कि ऐसा सोचना जल्दबाजी होगी. बोस कहते हैं, ‘ये सही है कि इस बार भाजपा को पूर्वोत्तर और दक्षिण तक प्रेरित करने वाले मत मिले हैं लेकिन ये लोकसभा चुनाव तक ही सीमित रहेंगे ऐसी संभावना है.’ बोस के मुताबिक, इन राज्यों में भाजपा का अपना कोई संगठन नहीं है ऐसे में वहां स्थानीय स्तर पर विधानसभा से लेकर जो भी चुनाव होंगे, पार्टी उसमें हाशिए पर ही रहेगी. अब यहां  मोदी जी सीएम के उम्मीदवार तो होंगे नहीं. इस बार का चुनाव राष्ट्रपति पद्धति वाले चुनाव सरीखा था सो वहां पार्टी को कुछ सपोर्ट मिला है.’

भले ही भाजपा की इन राज्यों में जीत छोटी हो लेकिन उसने पार्टी को इतना हौसला जरूर दिया है कि वह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अपना झंडा फहराने का सपना देख सके. रशीद कहते हैं, इसमें कोई शक नहीं है कि भाजपा की 100 फीसदी राष्ट्रीय छवि बन गई है. अब वह लगभग हर क्षेत्र में पहुंच चुकी है. ये बडी बात है. मोदी को जरूर इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने वो काम कर दिखाया है जो अटल जी नहीं कर पाए.’

जानकार यह भी कहते हैं कि अब इस मामले में सबकुछ इस पर निर्भर करेगा कि अगले पांच सालों में मोदी कैसी सरकार चलाते हैं. उसमें ही ऊपर के सभी सवालों के जवाब छिपे हैं. क्योंकि पांच साल बाद वोट मांगते वक्त वे इस बार की तरह गुजरात मॉडल का उदाहरण नहीं दे पाएंगे.

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