महंत महिमा का अंत

उधर, महंत जी-जान से कोशिश कर रहे हैं कि स्थिति संभल जाए. पार्टी छोड़ चुके नेताओं को मनाने के लिए कोशिशें हो रही हैं. उनसे कई दौर की बातचीत भी हुई है. गुवाहाटी में पत्रकारों से बात करते हुए महंत का कहना था, ‘सुधार होंगे. हम मानते हैं कि पिछले एक दशक के दौरान हमने सिर्फ असफलता देखी है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम सफलता के लिए कोशिशें करना छोड़ दें.’ हालांकि पार्टी नेताओं को मनाने की उनकी कवायद का नतीजा अब तक सिफर ही रहा है.

वैसे अतीत में कई बार ऐसा हुआ है जब महंत की नैया डूबती हुई लगी लेकिन वे उसे उबार लाए. 2001 में सचिवालय में कार्यरत एक सहायक भाषा अधिकारी संघमित्रा भराली ने आरोप लगाया था कि महंत ने उनसे शादी कर ली है. महंत पहले से ही शादीशुदा थे और इस आरोप के बाद राज्य की राजनीति में भूकंप आ गया. महंत की छवि पर ग्रहण लग गया और इतना हंगामा हुआ कि उन्हें पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी पड़ी. यह आरोप महंत के पतन की शुरुआत था. बतौर मुख्यमंत्री अपने दूसरे कार्यकाल में उन पर कुछ गुप्त हत्याएं करवाने के आरोप भी लगे. इन आरोपों ने उनका और उनकी पार्टी का भट्ठा बैठा दिया. संघमित्रा विवाद पर महंत का पार्टी के दूसरे नेताओं से टकराव हुआ था जिसके बाद पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में उनकी सदस्यता खत्म कर दी गई.

लोगों को लगा कि अब उनका करियर खत्म हो गया. लेकिन 2005 में महंत ने असम गण परिषद (प्रोग्रेसिव) के नाम से एक नई पार्टी बना ली. हालांकि 2008 में इसका अतुल बोरा की अगुवाई वाले पार्टी के दूसरे धड़े के साथ विलय हो गया. 2011 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद पार्टी नेताओं के एक वर्ग को लगा कि महंत को फिर से पार्टी का चेहरा बनाना चाहिए. 27 अप्रैल, 2012 को महंत एक बार फिर पार्टी अध्यक्ष बन गए. लेकिन पार्टी की हालत सुधरना तो दूर, और बिगड़ती चली गई.

असम गण परिषद महंत ने बनाई थी. 32 साल की उम्र में वे मुख्यमंत्री बन गए थे जो आज भी एक रिकॉर्ड है. लेकिन आज हाल यह है कि लोग तो क्या पार्टी भी उन्हें बर्दाश्त करने को तैयार नहीं. सवाल यह है कि क्या वे इतनी आसानी से कमान किसी और के हाथ में देने को तैयार होंगे.

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