सुनीता तोमर…

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मोदी के मन की बात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ महीनों पहले नशे की लत छोड़ने को लेकर ‘मन की बात’ की थी. इसमें उन्होंने कहा था, ‘ड्रग्स, नशा ऐसी भयंकर बीमारी है, जो अच्छे-अच्छो को हिला देती है. परिवार तबाह हो जाता है. समाज-देश सब कुछ बर्बाद हाे जाता है. ड्रग्स तीन बातों को लाता है और मैं उसको कहूंगा, एक बुराइयों वाला 3डी है. एक डी है ‘डार्कनेस’, दूसरा है ‘डिस्ट्रक्शन’ और तीसरा है ‘डीवास्टेशन’. नशा अंधेरी गली में ले जाता है. विनाश के मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है और बर्बादी का मंजर इसके सिवाय कुछ नहीं मिलता.


 

पिछले साल अगस्त में इस वीडियो की लॉन्चिंग के लिए तब के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने खासतौर पर सुनीता को परिवार के साथ दिल्ली आने का बुलावा भेजा था. 35 वर्षीय पति बृजेंद्र के अनुसार, ‘सरकार की ओर से हमें एक रुपया भी नहीं मिला. कार्यक्रम में सुनीता को सिर्फ ‘श्रीफल’ देकर सम्मानित किया गया. मुझे लगा था कि वीडियो में आने के बाद सरकार की ओर से आर्थिक मदद जरूर मिलेगी, मगर ऐसा कभी नहीं हुआ.’ उस समय कार्यक्रम के दौरान सुनीता ने लोगों से तंबाकू न खाने और तंबाकू रहित विश्व का आह्वान किया था. इस समय पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने देश में गुटका, खैनी, जर्दा जैसे तंबाकू उत्पादों के पैक पर ग्राफिक चेतावनी लागू करने की घोषणा भी की थी.

बृजेंद्र ने बताया, ‘ऑपरेशन के बाद सुनीता सामान्य जीवन जी रही थीं. कभी-कभी उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती थी. 28 मार्च की रात में सुनीता की तबीयत बिगड़ी तो मैंने उन्हें भिंड के एक अस्पताल में भर्ती कराया. यहां राहत नहीं मिली तो डॉक्टरों ने ग्वालियर रेफर कर दिया.’ यहां इलाज शुरू हुए एक-दो दिन ही हुए थे कि एक अप्रैल को जिंदगी से संघर्ष करते हुए सुनीता ने दम तोड़ दिया.

वे भाजपा सांसद और अधीनस्थ विधान संबंधी लोकसभा समिति के अध्यक्ष दिलीप गांधी के बयान से भी नाराज थीं. इसे लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री काे पत्र भी लिखा था. दिलीप गांधी ने कहा था, ‘तम्बाकू ही कैंसर की वजह नहीं है.’ इसको लेकर सुनीता काफी नाराज थी. जानकारों के मुताबिक देश में तंबाकू का सेवन ही कैंसर की बड़ी वजह है.

बृजेंद्र ने बताया, ‘सुनीता ने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि तंबाकू के पैकेटों पर तंबाकू निषेध से संबंधित चित्र बड़े आकार में बनाए जाएं, ताकि लोगों को पता चले कि ये कितने खतरनाक हैं. सुनीता के घरवालों का आरोप है कि सरकार की ओर से किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं मिली. बृजेंद्र कहते हैं, ‘सरकार अगर जरा-सा भी संवेदनशील हो जाती तो सुनीता की जान बचाई जा सकती थी. उस प्रचार अभियान के बाद हमें लगा था कि सरकार हमारी मदद करेगी, लेकिन सरकार का कोई भी नुमाइंदा हमारे परिवार का हाल तक जानने नहीं आया. मैंने सुनीता के इलाज के लिए 3.5 लाख रुपये का कर्ज ले रखा है. कर्ज के बोझ तले बच्चों का भविष्य अंधेरे में नजर आने लगा है.’ अब सवाल यह उठता है की सुनीता भारत सरकार के तंबाकू निषेध अभियान का इतना बड़ा चेहरा थीं तो उनको सरकारी सहायता क्यों नहीं मिली? क्या सरकार जनता का ऐसे ही शोषण करेगी? अगर सुनीता के साथ ये हुआ तो आम जनता के साथ क्या होता होगा. हमारे देश के नीति निर्माताओं को इस पर सोचने की जरूरत है. सुनीता की मौत सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली में लगे लापरवाही के घुन की कहानी बयां करती है.

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