सम्राट अशोक ‘कुशवाहा’

ब्राह्मणों द्वारा चाणक्य पर दावेदारी सब जानते हैं और भूमिहारों द्वारा परशुराम से लेकर स्वामी सहजानंद को अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश के बाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और दिनकर जैसे कवि को अपने खेमे में लेने का अभियान चलता रहता है. डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के जमाने में भी उनके और बिहार विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा के बीच जाति के आधार पर चलने वाली लड़ाई का किस्सा सुनाया जाता है. बिहार में अब फणीश्वर नाथ रेणु जैसे महान लेखक को भी धानुक जाति से होने के कारण कुर्मी जाति का बताने का अभियान कुछ सालों से चल रहा है तो आर्यभट्ट को भट्ट ब्राह्मण बनाने का अभियान भी शुरू हो चुका है. जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बनने के बाद दीना-भदरी जैसे मिथकीय नायकों का और माता सबरी के नायकत्व को उभारने की नए सिरे से कोशिश जारी है. एक जाति को दूसरी जाति की श्रेणी में लाने की होड़ भी बिहार की राजनीति का पुराना अभियान रहा है. भूमिहार द्वारा खुद को भूमिहार ब्राह्मण कहना और कुर्मी और कुशवाहा द्वारा खुद को क्षत्रिय कहना उसी अभियान का हिस्सा रहा है. और अब एक संगठन के बारे में यह सूचना है कि जल्द ही बुद्ध की जाति की तलाश कर उनके नाम पर जाति सम्मेलन की तैयारी पटना में चल रही है. पिछले दिनों महाराणा प्रताप को भी अपने खेमे में करने के लिए क्षत्रियों का एक समूह पटना में आयोजन कराने की कोशिश में था. यादवों की राजनीति के प्रतीक कृष्ण रहे हैं और उनका इस्तेमाल लालू प्रसाद यादव से लेकर नरेंद्र मोदी तक करते रहे हैं. लालू प्रसाद के आवास में कृष्ण की तस्वीरों की भरमार मिलेगी तो पिछले साल जब नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव के समय बिहार आए तो यादवों की ओर इशारा करते हुए कहा था कि लालूजी के जेल जाने से यदुवंशी भाई परेशान न हों. उनका भी यदुवंशियों से पुराना नाता रहा है, क्योंकि वे गुजरात से आए हैं और गुजरात में ही द्वारका है. उस वक्त पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा था कि मोदी के कहने से यादव उनकी ओर नहीं जाएंगे. यादव हमारे साथ हैं. यदुवंशी जानते हैं सब सच.

बहरहाल इन प्रसंगों को बताने का आशय सिर्फ इतना है कि बिहार में शायद ही कोई मिथकीय या ऐतिहासिक नायक हो, जिसका इस्तेमाल राजनीति में अपना हित साधने के लिए न किया गया हो. अभी नरेंद्र मोदी द्वारा रामधारी सिंह दिनकर के नाम पर दिल्ली में आयोजन करके भले ही यह कहा गया कि बिहार जाति की राजनीति की वजह से बर्बाद हो रहा है. लेकिन मोदी के उस आयोजन का एक बड़ा मतलब बिहार के भूमिहारों को साधना था. सूत्र बताते हैं कि जल्द ही बिहार में बनारस की दुकानों से प्रेरणा लेकर महान लेखक जयशंकर प्रसाद को भी जाति के खाके में बांधने की तैयारी चल रही है. हलवाइयों की एक सभा कर जयशंकर प्रसाद की तस्वीरें बांटने का अभियान चलने वाला है.

बिहार में जाति की राजनीति का क्या रंग है और कौन-कौन से  रंग सामने आने वाले हैं, इसे पटना के इनकम टैक्स गोलंबर के इर्द-गिर्द लगने वाले पोस्टरों व होर्डिंग के जरिये जाना-समझा जा सकता है. यहां पर रोजाना नए पोस्टर लगते हैं. रातोरात पोस्टर बदले जाते हैं. एक लगाता है, दूसरा हटा देता है. वहां पल भर में पोस्टर को चुपके से हटाकर अपना पोस्टर लगा देने का अभियान चलता है. दिन में दिखता है कि भूमिहार और ब्राह्मण एक होकर नया एकता परिषद बना रहे हैं तो शाम तक दिखता है कि भूमिहार अकेले चलकर परशुराम की जयंती मना रहे हैं. ब्राह्मण समाज अलग से परशुराम पर दावेदारी करने के लिए पोस्टर लगा रहा है.

ऐसे कई किस्से और कहानियां बिहार की राजनीति में हैं. वर्षों से चली आ रही परंपरा की तरह. बस, इस बार मजेदार ये हुआ है कि भाजपा, जो राष्ट्रवादी राजनीति करने की पैरोकारी करती रही है, वह विशुद्ध रूप से जाति की राजनीति में समाने को बेचैन दिखी और खुलकर संकीर्ण व स्थानीय राजनीति का हिस्सा बनने के लिए बेताब. बिहार चुनाव को लेकर भाजपा की यह बेचैनी स्वाभाविक है, क्योंकि यह तय हो चुका है कि इस बार का विधानसभा चुनाव सिर्फ और सिर्फ जाति के आधार पर लड़ा जाना है. जाति की राजनीति को ही साधने के लिए किसी भी कीमत पर नीतीश कुमार अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद के साथ अस्वाभाविक गठजोड़ करने के लिए दिन रात एक किए हुए हैं. जाति की राजनीति होने की संभावना की वजह से तीन दशक से राजनीति करते रहने वाले जीतन राम मांझी चुनाव की धुरी बन गए हैं.

जल्द ही बिहार में बनारस की दुकानों से प्रेरणा लेकर लेखक जयशंकर प्रसाद को भी जाति के खाके में बांधने की तैयारी है. हलवाइयों की सभा कर जयशंकर प्रसाद की फोटो बांटने का अभियान चलने वाला है

राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ‘आगे-आगे देखते तो रहिए क्या होता है. इसे विडंबना ही कहिए कि राष्ट्रवादी राजनीति का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा इस तरह खुलकर जाति की राजनीति करने पर अामादा है. हालांकि इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं क्योंकि इसके पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहते हुए खुद नरेंद्र मोदी अपने को पिछड़ा बताकर यह संकेत दे चुके थे कि भाजपा आगे किस रास्ते पर चलने वाली है.’ वह कहते हैं, ‘भाजपा राम को भी चाहती है और भारत के सबसे प्रतापी सम्राट अशोक पर भी कब्जा जमाना चाहती है. राम और अशोक पर एक साथ कब्जा करने की राजनीति उसकी विडंबना को ही दिखाता है. सबसे शर्मनाक बात ये लगी कि अशोक को कुशवाहा जाति में कैद करने और अपनी पार्टी में लाने के लिए केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह घोषणा कर दी है कि वे अशोक की मूर्ति लगाने के साथ डाक टिकट भी जारी करेंगे. जिस राजा के सिंह को भारत का चिह्न माना गया है, जिसके चक्र को राष्ट्रीय प्रतीक माना गया है, उसकी मूर्ति बनाकर उसका महत्व कम करना ही तो होगा. अशोक के जमाने में ही सिंह और चक्र की मूर्ति बनी थी. अशोक या उसके बाद के लोग चाहते तो उस समय के कुशल कारीगरों से अशोक की मूर्ति बनवा सकते थे लेकिन ऐसा नहीं किया गया. अब उस महानायक के नाम पर इस तरह की मनमानी और छेड़छाड़ ठीक नहीं.’ फिलहाल भाजपा अपनी धुन में मगन है. वह अशोक की प्रतिमा बनवाएगी. कुछ दिनों बाद चंद्रगुप्त मौर्य की प्रतिमा भी बनेगी. संभव है कि पटना में फिर एक-एक कर कई मिथकीय नायकों की प्रतिमा को स्थापित करने का दौर भी शुरू हो. संभव है कि पटना में ही मूर्तियों में आरक्षण का भी दौर शुरू हो, क्योंकि मूर्तियों की संख्या बढ़ेगी और सभी जाति व समुदाय के लोग अपने नायकों की प्रतिमा स्थापित करने की मांग करेंगे. उस पटना को देखना मजेदार होगा.

इंतजार कीजिए. कुछ दिनों बाद बुद्ध की जाति तलाश कर आयोजन होंगे. यह तय है और मजाक में कहा जाता है कि राम को राजपूत, कृष्ण को यादव, परशुराम को भूमिहार बना देने के बाद बिहार अगले एकाध चुनाव में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की जाति का भी पता लगाकर दिखा देगा. बिहार वह राज्य है, जहां जीते जी जाति की परिधि में रखने के लिए तमाम प्रयोग तो होते ही हैं, यह स्वर्गीय हो जाने के बाद भी जाति के बाहर नहीं रहने देने वाला और इस परंपरा को मजबूती से स्थापित करने वाला राज्य भी है.

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