सतलुज-यमुना लिंक नहर सींच रही राजनीति की फसल

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All Photos : Raman Gill
पटियाला में चंडीगढ़ रोड पर बसे बनूर गांव में एसवाईएल कैनाल को पाटती जेसीबी मशीन.
All Photos : Raman Gill

पंजाब विधानसभा चुनावों में साल भर से भी कम का समय रह गया है. राज्य भर में फैली सत्ता विरोधी लहर और सरकार के प्रति गुस्से के बीच से निकलने के लिए सतलुज-यमुना लिंक कैनाल (मालिकाना हकों का स्थानांतरण) विधेयक, 2016 को पारित करना सरकार के लिए जनता के खोए हुए विश्वास को पाने का बड़ा अवसर है. मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के इस कदम से न सिर्फ विपक्ष चिंता में आ गया है बल्कि पड़ोसी राज्य हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी परेशानी में डाल दिया है जो पहले ही 14 मार्च, 2016 को पंजाब सरकार द्वारा दिए गए डीनोटिफिकेशन के फैसले के खिलाफ खड़े हैं.
सुप्रीम कोर्ट के सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) मामले पर यथास्थिति रखने के आदेश के बावजूद पंजाब से हरियाणा को पानी भेजने के लिए बनी इस नहर को पाटने का काम शुरू हो चुका है. सरकार की मौन सहमति के साथ पंजाब के किसान इस नहर के बड़े हिस्से को पाट भी चुके हैं. इस विधेयक के अनुसार दशकों पहले एसवाईएल नहर के नाम पर सरकार द्वारा अधिगृहित की गई किसानों की जमीन उन्हें बिना कोई मूल्य चुकाए वापस की जाएगी. इस विधेयक को लाने का राजनीतिक उद्देश्य राज्य में विपक्ष को कमजोर करना है. खबर यह भी आ रही है कि शायद मुख्यमंत्री समय से पहले ही चुनाव करा सकते हैं.

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वर्तमान सरकार के इस विधेयक को लाने के फैसले का असर पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की छवि पर भी पड़ेगा. 2004 में पंजाब टर्मिनेशन ऑफ अग्रीमेंट्स एेक्ट लाने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब का पानी बचाने वाले के रूप में देखा जाने लगा था. इस कदम से एसवाईएल संबंधी किसी भी मुद्दे में सुप्रीम कोर्ट की कोई भूमिका नहीं रह गई थी. सूत्रों की मानें तो 3 मार्च, 2016 को हुई पंजाब कांग्रेस घोषणापत्र कमेटी की बैठक में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किसानों द्वारा नहर पाटने के विचार को सामने रखा था. हालांकि कैप्टन इस योजना पर आगे बढ़ते इसके पहले ही मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब विधानसभा में यह विधेयक लाकर इसका श्रेय अपने नाम कर लिया. इस विधेयक के अनुसार नहर बनाने के लिए अधिगृहित की गई 3,928 एकड़ जमीन उनके असली मालिकों को बिना कोई मुआवजा लिए वापस लौटा दी जाएगी. सदन में यह विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ है.

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अब तक का घटनाक्रम

Indira at SYLweb

01.11.1966: पंजाब रिआॅर्गेनाइजेशन एेक्ट, 1966 के अंतर्गत पंजाब को दो हिस्सों में बांटकर हरियाणा नाम का दूसरा राज्य बना.
24.03.1976: सरकार ने सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर के निर्माण की योजना बनाई और पंजाब-हरियाणा को रावी-व्यास के अतिरिक्त पानी के आवंटन की अधिसूचना जारी की.
31.12.1981: हरियाणा क्षेत्र में आने वाले एसवाईएल के हिस्से का निर्माण पूरा हुआ.
08.04.1982: तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पटियाला के कपूरी गांव में एसवाईएल नहर की नींव रखी.
05.11.1985: पंजाब विधानसभा में दिसंबर, 1981 में हुई वाटर ट्रीटी के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया.
30.01.1987: नेशनल वाटर ट्रिब्यूनल ने पंजाब सरकार को उसके क्षेत्र में एसवाईएल का निर्माण जल्द से जल्द पूरा करने का आदेश दिया. उस समय लगभग 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था.
12.07.2004: पंजाब में कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार ने विधानसभा में प्रस्ताव पारित करते हुए ‘पंजाब टर्मिनेशन ऑफ अग्रीमेंट्स एेक्ट, 2004’ लागू किया.
14.03.2016: पंजाब विधानसभा में सर्वसम्मति से सतलुज-यमुना लिंक कैनाल (मालिकाना हकों का स्थानांतरण) विधेयक, 2016 पास किया गया, जिसके अनुसार सरकार एसवाईएल नहर के निर्माण के लिए अधिगृहित की गई किसानों की 3,928 एकड़ जमीन बिना उनसे मुआवजा लिए उन्हें वापस करेगी. [/symple_box]

विधेयक के अनुसार सरकार इससे संबंधी नियम व शर्तें बाद में जारी करेगी साथ ही जमीन संबंधी अधिकार राजस्व विभाग द्वारा स्वत: पूरी कर दी जाएंगी. विधेयक में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा जमीन मालिकों के सभी दावों का निस्तारण करने के लिए उचित माध्यमों को भी अधिसूचित किया जाएगा. इसके अनुसार विधेयक के बारे में पंजाब सरकार या किसी व्यक्ति के बारे में कोई भी वाद, अभियोजन या कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकेगी और न ही विधेयक के संदर्भ में कोई वाद या कार्रवाई करना किसी भी सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में होगा.

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इस विधेयक के अनुसार यह 3,928 एकड़ जमीन किसानों को लौटने के लिए एसवाईएल को भरने का काम शुरू हो चुका है. रिकॉर्ड के अनुसार एसवाईएल के लिए 5,376 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी, जिसमें 3,928 एकड़ जमीन 121 किलोमीटर लंबे एसवाईएल नहर के लिए थी और बाकी नहर से विभिन्न क्षेत्रों में पानी के वितरण के लिए उपशाखाएं यानी डिस्ट्रीब्यूट्रीज बनाने के लिए. ऐसे में रोपड़, साहिबजादा अजित सिंह नगर, फतेहगढ़ साहिब और पटियाला के वे किसान असमंजस की स्थिति में हैं जिनकी जमीन एसवाईएल की डिस्ट्रीब्यूट्रीज बनाने के लिए ली गई थी क्योंकि सतलुज-यमुना लिंक कैनाल (मालिकाना हकों का स्थानांतरण) विधेयक, 2016 के अनुसार सिर्फ उन्हीं जमीनों का जिक्र है जिन पर हरियाणा सरकार ने मुआवजा दिया था, बाकी 1/5 भाग जिसके लिए पंजाब सरकार ने भुगतान किया था, उसका कोई जिक्र इस विधेयक में नहीं है. गौरतलब है कि पंजाब सरकार हरियाणा सरकार द्वारा एसवाईएल नहर बनाने के लिए जारी किए गए 191 करोड़ रुपये का चेक भी लौटा चुकी है.

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पहले ही दिन से एसवाईएल नहर योजना के साथ बदकिस्मती जुड़ गई थी. 31 अक्टूबर, 1984 को इसने तत्कालीन इंदिरा गांधी की जान ली, इसके बाद 20 अगस्त, 1985 को अकाली दल के अध्यक्ष हरचंद सिंह लोंगोवाल की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई. इन दोनों ही से नदी का पानी बांटने को लेकर शिकायत थी. 1982 में इंदिरा गांधी ने ही पटियाला के कपूरी में एसवाईएल नहर की नींव रखी थी. फिर 1988 में माजत गांव में 32 मजदूरों को उग्रवादियों द्वारा गोली मार दी गई थी, जिसके बाद नहर का निर्माण कार्य, जो उस समय 70 से 80 फीसदी तक पूरा हो गया था, बंद हो गया. इसके बाद 1990 में भी उग्रवादियों ने एसवाईएल नहर पर काम कर रहे एक चीफ इंजीनियर और सुप््रिटेंडेंट इंजीनियर की हत्या कर दी थी.[/symple_box]

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इस बीच जब पंजाब में किसान नहर को पाट चुके हैं, हरियाणा के वो किसान जिनकी जमीन एसवाईएल के लिए अधिगृहित की गई थी, उन्होंने राज्य के किसानों से मुकदमा दायर करने की मांग की है. इसका कारण या तो पंजाब के किसानों की तरह जमीन पाने का लोभ भी हो सकता है, जहां जमीन के दाम आसमान छू रहे हैं या फिर वे इस नहर से हरियाणा में पानी आने की उम्मीद ही छोड़ चुके हैं. हरियाणा में नहर के 90 किलोमीटर हिस्सा आता है, जिसका काम 1976 में ही पूरा हो चुका है. हरियाणा में एसवाईएल का क्षेत्र अंबाला से शुरू होकर करनाल जिले के मुनक तक है. जब इसका काम शुरू हुआ था तब नहर कुरुक्षेत्र से गुजरती थी. एसवाईएल के निर्मित क्षेत्र में अब बरसात का पानी ही जमा होता है.

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कोई समाधान न देखते हुए हरियाणा सरकार ने विधानसभा में पंजाब सरकार के इस विधेयक के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है और सुप्रीम कोर्ट से पंजाब सरकार को इस विधेयक को लागू करने से रोकने का निवेदन किया है. अदालत ने हरियाणा की अर्जी पर पंजाब से 28 मार्च तक जवाब देने को कहा था. हरियाणा ने इस अर्जी में एक कोर्ट रिसीवर की नियुक्ति और इस विधेयक को राजपत्र अधिसूचना में शामिल न करने की भी मांग की है.

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नदी पर किसका अधिकार ?

नदी-तट सिद्धांतों के अनुसार अगर कोई नदी पूरी तरह से एक ही राज्य के अंतर्गत बहती है तब उस पर केवल उस राज्य का अधिकार होगा, किसी और राज्य का नहीं. यदि नदी एक राज्य से अधिक राज्यों से होकर बहती है, तो जिस भी राज्य से वह गुजर रही है, उस राज्य में आने वाले नदी के क्षेत्र पर उस राज्य का अधिकार होगा. इन नदी तट अधिकारों का आधार इस बात को माना गया है कि किसी राज्य विशेष के लोगों को नदी के राज्य में होने से उसके बहाव आदि के कारण परेशानी का सामना करना पड़ता है, तो ऐसे में नदी से होने वाले फायदे का एकमात्र लाभार्थी भी वही राज्य होगा. नदी के पानी के बंटवारे को लेकर पहला विवाद 1947 में विभाजन के बाद पाकिस्तान बनने से हुआ था, जब भारत के पंजाब राज्य और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में कई नदियां बहा करती थीं. 1960 में प्रधानमंत्री नेहरू और अयूब खान इंडस बेसिन रिवर्स वाटर्स ट्रीटी (संधि) लेकर आए, जिसके अनुसार यह निश्चित हुआ कि सतलुज, व्यास और रावी नदियों के पानी पर हिंदुस्तान का हक होगा. पाकिस्तान को वर्ल्ड बैंक और कई मित्र देशों ने सहायता दी. एसवाईएल नहर मुद्दे पर पंजाब का तर्क था कि पंजाब रिआॅर्गेनाइजेशन एेक्ट, 1966 के बाद हरियाणा सतलुज नदी के संबंध में पंजाब के साथ सह-तटवर्ती (समान नदी बांटने वाला) राज्य नहीं रहा, ठीक उसी तरह जैसे पंजाब यमुना के लिए नहीं रहा. तो ऐसे में अगर हरियाणा पंजाब की नदियों का पानी लेना चाहता है तो पंजाब को भी यमुना में उसका हिस्सा मिलना चाहिए.
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