उत्तर के पैंतरे में दक्षिण का टोका

दरअसल, जद (एस) की संभावना सिद्धारमैया और मोदी की छवि की चमक घटने के साथ बढ़ने की है. सिद्धारमैया बेशक विवादरहित और साफ छवि वाले मुख्यमंत्री हैं, लेकिन बतौर मुख्यमंत्री बहुत लोकप्रियता  हासिल नहीं कर पाएं हैं. ऐसे में भाजपा को टक्कर देते हुए जद (एस) राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करती है तो जनता परिवार में उसकी हिस्सेदारी बढ़ेगी. दूसरी ओर बिहार चुनाव में जनता परिवार का प्रदर्शन अगर बेहतर होता है तो कर्नाटक में जद (एस) को जरूर फायदा मिल सकता है. राष्ट्रीय नेताओं का हमेशा कर्नाटक की जनता पर प्रभाव रहा है, जद (एस) के सबसे बड़े आदर्श जयप्रकाश नारायण हैं, और इसे लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता से भी समझा जा सकता है जब विधानसभा चुनाव हार जाने के बावजूद मोदी की छवि के कारण भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा.

वैसे, जद (एस) भले जनता पार्टी के गठन को लेकर सकारात्मक हो लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस-भाजपा इसे अपने लिए चुनौती नहीं मान रहे हैं. कांग्रेस को सिद्धारमैया के शासन पर भरोसा है, कर्नाटक कांग्रेस प्रवक्ता दिनेश गुंडु राव पार्टी की प्रतिक्रिया बताते हुए कहते हैं, अगर सचमुच विचारधारा के आधार पर धर्मनिरपेक्ष दल एक साथ आ रहे हैं तो हम उनका स्वागत करते हैं. लेकिन जद (एस) ने कर्नाटक में अवसरवादिता की राजनीति की है और भाजपा विरोध की बात करते समय भूल रहे हैं उन्होंने भाजपा के साथ राज्य में सरकार बनाई है. कांग्रेस के लिए यही देखना दिलचस्प होगा कि जिस जद (एस) में कई मसलों पर पिता-पुत्र की राय और बयान एक-दूसरे से अलग होते हैं, वहां अलग दलों के साथ इनका कितना और कितने समय तक सामंजस्य बैठ पाता है.

जबकि भाजपा खुद के विरुद्ध ही लामबंद हो रहे जनता परिवार को लेकर कर्नाटक में चिंतित क्यों नहीं दिख रही नहीं? इसका जवाब देते हुए कर्नाटक विधानपरिषद में नेता विपक्ष के. ईश्वरप्पा कहते हैं, कर्नाटक में सिर्फ जद (एस) है, कोई और पार्टी यहां आकर उसके साथ चुनाव नहीं लड़नेवाली. भाजपा को न तो राज्य में इस गठबंधन से खतरा है न ही राष्ट्रीय स्तर पर, क्योंकि भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ रही है, अल्पसंख्यक  भी पार्टी से जुड़ रहे हैं इसलिए गोवा में भाजपा की सरकार बनी. पहले जिसे केवल ब्राह्मणों, फिर बनियों और केवल उत्तर भारत की पार्टी कहा गया आज उसकी मौजूदगी पूरे देश में है. दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक सभी उससे जुड़े हैं, जबकि जद (एस) धर्मनिरपेक्षता का दिखावा करनेवाली एक जातिवादी पार्टी है. भाजपा को  अगर खतरा है तो अपने ही दल के कुछ कट्टर हिंदुवादियों से, पार्टी इसे समझ रही है. मोदी भी लगातार संदेश दे रहे हैं कि उदारवादी राजनीति ही भाजपा की असली राजनीति है. भाजपा से अलग हुए येदुरप्पा और श्रीरामलू जैसे नेता पार्टी में वापस आ गए, इसलिए विधानसभा चुनावों में हार के बावजूद लोकसभा चुनाव में भाजपा को 38 में से 17 सीटें मिलीं. कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष प्रहलाद जोशी भी जनता परिवार की चुनौती को सिरे से नकारते हुए कहते हैं, नीतीश कुमार हमारे साथ थे, लोकसभा चुनाव में भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ने पर बिहार की जनता का  समर्थन उन्हें नहीं मिला ऐसे में वो कैसी संभावना पर विचार कर रहे हैं? और जहां तक देवगौड़ा जी की बात है तो अपने कैरियर के लिए ये उनका राजनीतिक प्रयोग भी हो सकता है, क्योंकि कर्नाटक में तो मुकाबला कांग्रेस भाजपा के बीच ही है.

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