प्यादों से पिटता वजीर!

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इसी दौरान राजधानी से दूर छत्तीसगढ़ के मिशनरी स्कूलों के साथ विश्व हिंदू परिषद एक नया खेल खेल रही थी. मिशनरी स्कूलों पर दबाव बनाया गया कि हर स्कूल में सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की जाए, स्कूल के प्रिंसिपल को प्राचार्य और शिक्षकों को फादर की जगह सर कहा जाए. इसी दौरान क्रिसमस को सुशासन दिवस के रूप में मनाने का विवाद भी उठा और भगवाधारियों ने आमिर खान की फिल्म पीके के खिलाफ खूब उत्पात मचाया. विरोध करने वालों का कहना था कि मुस्लिम आमिर खान ने हिंदू देवी देवताओं और गुरुओं का अपमान किया है. पूरे देश में रामदेव समर्थकों और संघ कार्यकर्ताओं ने फिल्म के पोस्टर फाड़े और फिल्म को कई जगहों पर प्रदर्शित करने से रोका. यह सब होता रहा और मोदीजी खामोश रहे.

इन्हीं सात महीनों में पहली बार बहुत खुलकर देश और दुनिया को बताने की कोशिश की गई कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने एक बयान में कहा, ‘हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है. हिंदुत्व हमारे राष्ट्र की पहचान है और यह अन्य (धर्मों) को स्वयं में समाहित कर सकता है. सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश के वर्तमान निवासी इसी महान संस्कृति की संतान हैं.’

आरएसएस के घर वापसी कार्यक्रम की काफी आलोचना हुई, लेकिन तमाम बवाल के बावजूद प्रधानमंत्री ने न तो संसद में इस पर बयान दिया, न ही घर वापसी का कार्यक्रम रुका

भागवत के हिंदू राष्ट्र संबंधी बयान देने के बाद तो भाजपा और संघ से जुड़े लोगों में भारत को हिंदू राष्ट्र साबित करने की होड़ लग गई. भारतीय जनता पार्टी की गोवा सरकार में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूजा ने भी कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है. उनके मुताबिक, ‘यह हिंदुस्तान है. हिंदुस्तान में सभी भारतीय हिंदू हैं. मैं भी एक ईसाई हिंदू हूं.’

डिसूजा के बयान का गोवा सरकार में मंत्री दीपक धवलीकर ने और विस्तार किया. दीपक का कहना था, ‘बहुत जल्द पीएम नरेंद्र मोदी भारत को एक हिंदू राष्ट्र के तौर पर विकसित करेंगे. मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत जल्द पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत एक हिंदू राष्ट्र बनेगा’. हिंदू राष्ट्र को लेकर मचे बवाल पर भी मोदी ने चुप्पी जारी रखी.

एक तरफ यह सब चल रहा था, तो दूसरी तरफ देश में एक नए किस्म के विज्ञान का सृजन हो रहा था. जनवरी के पहले हफ्ते में मुंबई में संपन्न विज्ञान कांग्रेस में वैज्ञानिक कैप्टन आनंद जे बोडास ने कहा कि हवाई जहाज की खोज हमने वैदिक काल में ही कर ली थी. भारत में 7,000 साल पहले विमान बना लिए गए थे और हम एक देश से दूसरे देश तथा एक ग्रह से दूसरे ग्रह उन विमानों के माध्यम से ही जाया करते थे. बोडास के इस व्याख्यान के बाद उनकी आलोचना भी शुरू हो गई. लेकिन सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि प्राचीन भारत का विज्ञान तर्कसंगत है, इसलिए इसे सम्मान से देखा जाना चाहिए.

उसी विज्ञान कांग्रेस में एक और खास शोध पत्र में कहा गया कि भारतीयों ने सर्जरी के लिए 20 तरह के उन्नत यंत्र और 100 प्रकार के सर्जरी उपकरण बना लिए थे, जो दिखने में बिलकुल आजकल के सर्जिकल उपकरणों की तरह ही थे.

भारतीय विज्ञान कांग्रेस में इस तरह के चर्चे और पर्चे पहले कभी नहीं देखे-सुने गए. जाहिर सी बात है आलोचकों ने इसके पीछे संघ की भूमिका बताना शुरू कर दिया.

कुछ दिन पहले ही स्वयं प्रधानमंत्री ने भी कुछ इसी तरह की बात मुंबई में एक अस्पताल के उद्घाटन के मौके पर कही थी, ‘महाभारत का कहना है कि कर्ण मां की गोद से पैदा नहीं हुआ था. इसका मतलब यह हुआ कि उस समय जेनेटिक साइंस मौजूद था. तभी तो मां की गोद के बिना उसका जन्म हुआ होगा. हम गणेश जी की पूजा करते हैं. कोई तो प्लास्टिक सर्जन होगा उस जमाने में, जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सिर रखकर प्लास्टिक सर्जरी का आरंभ किया होगा.’

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में उपजी अधिकांश समस्याओं का संबंध उनके वैचारिक परिवार के सदस्यों और सहयोगियों से ही रहा है

विज्ञान से जुड़े अवैज्ञानिक बयानों का सिलसिला आगे संसद भवन में भी सुनने को मिला. उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद रमेश पोखरियाल निशंक ने संसद में बयान दिया कि भारत का ज्ञान और विज्ञान किसी से भी पीछे नहीं है. बकौल निशंक, आज सभी परमाणु परीक्षण की बात करते हैं, लेकिन सालों पहले दूसरी सदी में ही संत कणाद ने परमाणु परीक्षण कर लिया था. निशंक ने कहा कि प्लास्टिक सर्जरी और जेनेटिक साइंस भी भारत में बहुत पुराने समय से मौजूद हैं.

जाहिर है इन बयानों की आलोचना होनी ही थी. जानकारों के मुताबिक एक साथ इतने मोर्चों पर हो रही ये कारगुजारियां धीरे-धीरे संघ के एजेंडे को मजबूत करने की कोशिश है. भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर रंजन मलिक कहते हैं, ‘यह तो संघ का सालों से एजेंडा रहा है. वह हमेशा विज्ञान में पुराण को मिलाता रहा है. उसके हिसाब से विश्व में जो कुछ हो रहा है या आगे होगा, वह सब भारतीय शास्त्रों में पहले से हो चुका है. समस्या यह है कि यह सब उस पीएम के कार्यकाल में हो रहा है, जो मंगल और चांद पर जाने की बात करता है, विज्ञान में भारत को विश्व में नंबर एक बनाने की बात करता है. एक तरफ सरकार आगे बढ़ने की बात कर रही है, लेकिन उसी समय वह पुरातनपंथी मान्यताओं और गल्पों को भी विज्ञान का चोला पहनाना चाहती है.’

एक जरूरी सवाल उठता है कि यह सब कुछ उस व्यक्ति के कार्यकाल में कैसे हो रहा है, जिसका चुनावों में एकमात्र एजेंडा था विकास, जिसके बारे में चर्चित था कि अपनी सरकार में अपने अलावा किसी और की नहीं सुनता, जिसका दावा था कि वह विकास और सुशासन के माध्यम से ही श्रेष्ठ भारत बनाएगा, जो अभी भी सार्वजनिक सभाओं में विकास और सुशासन के इतर अपना और कोई एजेंडा नहीं बताता. ऐसे व्यक्ति के कार्यकाल में विकास और सुशासन को मुंह चिढ़ानेवाले बयानों और गतिविधियों की बाढ़ क्यों आई हुई है? ऐसा क्यों दिख रहा है कि मोदी के एजेंडे पर संघ का एजेंडा भारी पड़ गया है. मोदी सरकार संघ सरकार की भांति दिख रही है. यह सही है कि उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल में उपजी अधिकांश समस्याओं का संबंध मोदी के वैचारिक परिवार के सदस्यों से रहा है, लेकिन ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि अगर मोदी इन सभी चीजों को गलत मानते हैं, तो इनके खिलाफ बोलते क्यों नहीं हैं, इसे रोकते हुए क्यों नजर नहीं आते?

इन सवालों के दो जवाब हो सकते हैं– या तो मोदी इन तत्वों को रोक नहीं पा रहे या वह इन्हें रोकना नहीं चाहते.

जहां तक मोदी द्वारा इन तत्वों को न रोक पाने की बात है, तो जानकार इसके पीछे लोकसभा चुनावों में मोदी को जिताने के लिए संघ की ओर से की गई कड़ी मेहनत को इसका कारण मानते हैं. जानकारों के मुताबिक जिस आक्रामक तरीके से संघ के कार्यकार्ताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव में उन्हें जिताने और उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए पसीना बहाया था, उसे देखते हुए मोदी के लिए यह संभव नहीं है कि वह इन स्वयंसेवकों की बांह मरोड़ने की कोई कोशिश करें. संघ के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘मोदी भाईसाहब को यह अहसास है कि वह जहां पहुंचे हैं, वहां उन्हें पहुंचाने में लोगों ने बहुत मेहनत की है. अब जब वह पीएम बन गए हैं, तो जाहिर सी बात है कि आम स्वयंसेवक अपने मन की कुछ तो करेगा. वह अपनी विचारधारा से जुड़ी चार चीजें भी नहीं कर पाएगा, तो फिर उनको पीएम बनाने के लिए उसने इतना परिश्रम क्यों किया.’ लोकसभा के चुनावी नतीजों के बाद संघ प्रमुख भागवत ने जब कहा था कि लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत किसी एक आदमी की जीत नहीं है, तब शायद उनका आशय यही था.

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय कहते हैं, ‘देखिए लोकतंत्र में कोई प्रधानमंत्री आदेश देकर अपने समर्थकों को चुप नहीं करा सकता. आप डांट नहीं सकते. आपको उन्हें ऐसा न करने के लिए मनाना पड़ेगा. मुझे पता है कि मोदी उनको मनाने का काम कर रहे हैं.’

मोदी संघ की गतिविधियों से कितने त्रस्त हैं, यह बतानेवाली एक खबर कुछ दिन पहले सुर्खियों में थी कि कैसे मोदी ने संघ के नेताओं को बेहद सख्त लहजे में चेता दिया है कि अगर संघ ने अपने लोगों को काबू में नहीं किया, तो वह इस्तीफा दे देंगे. यह खबर मीडिया के पास कैसे आई, इसका स्रोत क्या था, आज तक किसी को पता नहीं है. एक सोच यह भी है कि यह खबर जानबूझकर प्लांट की गई. एक बड़े अखबार के राजनीतिक संवाददाता, जिन्होंने यह खबर की थी, से यह सवाल पूछने पर कि इस खबर का सोर्स क्या था, वह कहते हैं कि यह खबर मैंने नहीं निकाली, बल्कि मुझे मेरे संपादक ने करने को कहा था. उनके बताए आधार पर ही खबर की गई.

वह अगर इनकी हरकतों से असहमत हैं, तो एक ट्वीट तो कर ही सकते हैं. ऐसा लगता है कि उन्होंने एक रणनीति के तहत चुप्पी साध रखी है

इस खबर के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि मोदी रोकना चाह रहे हैं, लेकिन रोक नहीं पा रहे हैं. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘देखिए जो कुछ हो रहा है, उससे मोदी जी बहुत दुखी हैं. मैं आपको बताऊं कि संघ के नेताओं से कई बार इस बारे में बैठक हो चुकी है. मोदी जी ने उन्हें सख्त लहजे में कह दिया है कि यह सब बंद करो. भाजपा सदस्यों को भी चेता दिया गया है कि अगर उन्होंने पार्टी की फजीहत कराई, तो खैर नहीं.’

राय मोदी को क्लीन चिट देते हुए कहते हैं, ‘देखिए मोदी अपने विकास के एजेंडे से भटके नहीं हैं. उन्होंने फालतू मुद्दे नहीं उठाए हैं. वह तो अपने विकास के एजेंडे पर लगातार काम कर रहे हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि उनके समर्थक अति उत्साहित हैं. उनको लगता है कि हमारा समय आ गया है, इसलिए अपने एजेंडे को पूरा कर लेना चाहिए, लेकिन मोदी की इसमें सहमति नहीं है.’

इन घटनाओं का बुरा असर यह हुआ है कि सरकार के अच्छे कामकाज की बजाय जनता और मीडिया का सारा ध्यान इन विवादों पर केंद्रित हो गया है. बलदेव शर्मा कहते हैं, ‘इन विवादों से छवि पर बुरा असर तो पड़ता ही है. जनता में यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि मोदी इन लोगों को नहीं रोक पा रहे हैं और संघ का एजेंडा हावी हो रहा है. हालांकि ऐसे लोग चुनाव प्रचार के समय भी सक्रिय थे. आपको मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजनेवाला वह बयान याद होगा.’

मोदी के एजेंडे पर आरएसएस का एजेंडा हावी होने के आरोप को दरकिनार करते हुए उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘मैं यही कहूंगा कि हाथी चलता जाएगा और कुत्ता भौंकता जाएगा. मोदी जी की विकास के अलावा किसी और चीज पर नजर नहीं है. मैं क्या कहूं आप खुद देखें कि जिन लोगों ने अप्रासंगिक विषयों को उठाया है, उन्हें जनता ने खुद ठुकराया है.’ बाजपेयी का इशारा शायद योगी आदित्यनाथ की ओर है.

मोदी के राज में उत्पात मचानेवालों से भाजपा कैसे निबट रही है, उसका उदाहरण देते हुए बाजपेयी कहते हैं, ‘हमारे यहां उन्नाव से सांसद हैं साक्षी महाराज. अब बताइए, इनको बोलने की क्या जरूरत थी. बहुत जल्दी उनको अपनी हैसियत का पता लग जाएगा. प्रदेश का कोई नेता अब बयानबाजी नहीं करेगा. सबको टाइट कर दिया गया है. बहुत हो चुका. अब जनता सांप्रदायिकता कतई नहीं चाहती.’

इन सबके बीच एक ऐसा समूह भी है जो मानता है कि बीते दिनों विकास और सुशासन को मुंह चिढ़ानेवाली जो भी घटनाएं और बयान सामने आए, वह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. जो कुछ हो रहा है, उसे मोदी रोकना नहीं चाहते. उसमें उनकी भी सहमति है. वह दोनों तरह की जनता को साधने में लगे हुए हैं. वह दोहरी नीति पर काम कर रहे हैं. पहली नीति के तहत सरकार और उससे जुड़े सदस्य सिर्फ विकास और गुड गर्वनेंस की बात करेंगे. इससे देश में वे लोग, जो विकास के नाम पर आकर्षित हुए हैं, उनसे जुड़ेंगे. दूसरी तरफ पार्टी और संघ परिवार रहेगा, जो उन मुद्दों को हवा देता रहेगा, जो देश के एक तबके को आकर्षित करता है और जो भाजपा और संघ का एजेंडा भी है. इससे विकास चाहने और हिंदू राष्ट्र की चाह वाले दोनों जुड़े रहेंगे. इस रणनीति से भाजपा के ही कई नेता सहमत नहीं दिखते. यूपी भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘जनता ने आपको गुड गवर्नेंस के नाम पर वोट दिया है. ये क्या कि आप लव जेहाद और घर वापसी कराने लगे. मोदी के नाम पर चुनाव जीता गया है, भागवत के नाम पर नहीं. अगर इसे ठीक नहीं किया गया, तो अगले चुनाव में जनता लात मार देगी.’

संघ पर करीबी निगाह रखने वाले वरिष्ठ चिंतक सुभाष गाताड़े कहते हैं, ‘लोगों को यह भ्रम था कि मोदी पीएम बनने के बाद बदल जाएंगे. वह बदले नहीं हैं. वह संघ के प्रचारक थे और आज भी मन-मस्तिष्क से वह उसके प्रचारक हैं. चूंकि आप प्रधानमंत्री हैं और एक मर्यादा से बंधे हैं, संविधान से बंधे हैं, इसलिए मजबूरी में आपको ‘सबका साथ सबका विकास’ कहना पड़ता है.’

गताडे बड़े दिलचस्प तरीके से इसकी व्याख्या करते हैं, ‘संघ परिवार में श्रम विभाजन बहुत स्पष्ट होता है. यह अटलजी के समय से चल रहा है. वह मौन रहते थे और आडवाणी समेत बाकी लोग कारनामे किया करते थे. इस तरह अटलजी सेक्युलर और प्रोग्रेसिव कहलाए. वही हाल आज मोदी का है. यह एक बड़े ऑरकेस्ट्रा की तरह है. सबको अपना-अपना बाजा पकड़ा दिया गया है और सब ईमानदारी से अपना-अपना बाजा बजा रहे हैं.’

मोदी की दोहरी नीति की चर्चा करते हुए वह कहते हैं, ‘जो आदमी 24 घंटे ट्विटर और फेसबुक पर सक्रिय रहता है, वह अगर इनकी हरकतों से असहमत हैं, तो एक ट्वीट तो कर ही सकते हैं. उन्होंने एक रणनीति के तहत चुप्पी साध रखी है.’

रणनीति की तरफ इशारा करते हुए वह कहते हैं, ‘आप देखिए कि जब भी सरकार अपनी किसी पॉलिसी की वजह से फंसती दिखती है, तो तुरंत कोई न कोई विवाद खड़ा हो जाता है.’

हाल ही में पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण शौरी ने भी इस पर सवाल उठाते हुए कहा था, ‘आप दिल्ली में विकास और मुजफ्फरनगर में लव जेहाद की चर्चा नहीं कर सकते.’

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