बेमेल ब्याह और तलाक के हजार बहाने

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भारतीय संविधान में जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति होने के कारण राज्य के लोगों को भारतीय नागरिकता के साथ स्थायी निवास प्रमाण पत्र भी दिया जाता है. ये प्रमाण पत्र सिर्फ उन लोगों को दिया जाता है जिन्हें जम्मू कश्मीर के संविधान का अनुच्छेद छह स्टेट सब्जेक्ट कहता है. स्टेट सब्जेक्ट होना एक तरह से राज्य की नागरिकता का काम करता है. इसके अभाव में ये लोग राज्य में किसी तरह की जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकते और न इन्हें सरकारी नौकरी मिल सकती है. भाजपा लंबे समय से इन लोगों को स्टेट सब्जेक्ट का दर्जा देने की मांग करती आई है लेकिन गठबंधन सरकार चलाने के लिए बने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम से ये वादा भी गायब है.

भाजपा का यह सख्त रवैया रहा है कि कश्मीर विवाद से जुड़ी किसी भी चर्चा में वह राज्य के पृथकतावादियों को शामिल नहीं करेगी. पाकिस्तान के राजदूत ने कश्मीरी पृथकतावादियों को कुछ महीने पहले जब बातचीत के लिए बुलाया तो भाजपा की इसी नीति के तहत मोदी सरकार ने पाकिस्तान की सचिव स्तरीय वार्ता रद्द कर दी थी. भाजपा सरकार मानती है कि पृथकतावादी कश्मीर के प्रतिनिधि नहीं हैं. लेकिन न्यूनतम साझा कार्यक्रम के माध्यम से हुर्रियत समेत उन सभी संगठनों से बातचीत की बात पार्टी ने स्वीकारी है जिनकी प्रदेश में भूमिका है. भले उनकी राजनीतिक विचारधारा जो भी हो.

भाजपा के विचारों में बदलाव का सिलसिला यहीं नहीं थमा. पार्टी जिस पूर्व पृथकतावादी नेता सज्जाद लोन को कुछ समय पहले तक देश का गद्दार और पाकिस्तानी एजेंट कहा करती थी उस सज्जाद लोन को सरकार में मंत्री बनवाने के लिए भाजपा ने पीडीपी पर दबाव डाला. पीडीपी लोन को मंत्री नहीं बनाना चाहती थी. भाजपा ने लोन को अपने कोटे से मंत्री बनाया. चुनावों से पहले खुद नरेंद्र मोदी ने लोन से प्रधानमंत्री आवास में मुलाकात की थी.

ऐसा नहीं है कि समझौता सिर्फ भाजपा ने किया है. पीडीपी की बात करें तो उसके लिए विचारधारा को कुछ समय तक ठंडे बस्ते में डालने का सबसे बड़ा प्रमाण उसका भाजपा से गठबंधन करना ही है. पीडीपी जिस भाजपा को सांप्रदायिक मानती रही है उसके साथ उसने सरकार बना ली. एक ऐसी पार्टी जिसके बारे में पीडीपी को पता है कि उसे अल्पसंख्यक संदेह की नजर से देखते हैं, उससे दूरी बरतते हैं, उसकी छवि मुस्लिम विरोधी पार्टी की है, वो पार्टी जम्मू कश्मीर के किसी तरह के विशेषाधिकार के खिलाफ है, जो धारा 370 को खत्म करना चाहती है. बावजूद इसके पीडीपी ने भाजपा से गठबंधन किया.

इस समझौते के साथ ही जो बड़ा समझौता पीडीपी ने किया वो है आफ्स्पा को लेकर. पीडीपी हमेशा से आफ्स्पा के विरोध में रही है और इसे हटाने की मांग करती रही है. पार्टी ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि अगर वो सत्ता में आई तो आफ्स्पा को हटाया जाएगा. लेकिन दोनों दलों के बीच बने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम ने इस मुद्दे को भी मिनिमाइज कर दिया.

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kn_govindacharya‘पीडीपी लाभ उठा रही है, भाजपा पत्तल उठा रही है’

भाजपा को जम्मू कश्मीर में सरकार बनानी ही नहीं चाहिए थी. मैं इसे सत्ता के लिए समझौता करने के रूप में देखता हूं. भाजपा ने सत्ता के लिए अपने सिद्धांत से समझौता किया है. व्यवहारिकता और अवसरवादिता में फर्क होता है. जहां व्यवहारिकता सिद्धांत के विपरीत हो वो अवसरवाद में बदल जाती है. व्यवहारिकता सिद्दांतों के लिए पोषक होनी चाहिए न कि विनाशक. हमें दिख रहा है कि कैसे जम्मू कश्मीर में पीडीपी अवसर का लाभ उठा रही है और भाजपा वहां पत्तल उठा रही है. अब आप डैमेज कंट्रोल करते रहिए. भाजपा को पता होना चाहिए कि उसका जो कैडर है वो व्यवहारवाद पर तो बना ही नहीं. वो तो भावनात्मक राष्ट्रवाद और निस्वार्थ मनोभाव की परिणति है. उसके काडर को सत्ता राजनीति की ऐसी अवसरवादी चालें हजम नहीं होतीं. मुझे लगता है आगे स्थिति और खराब होगी. आगे ये मांग जरूर उठेगी की पार्टी सरकार से समर्थन वापस ले. समय गुजरने के साथ भाजपा का सरकार में बने रहना देश के लिए घाटे का सौदा साबित होगा. पार्टी और नेताओं की बात छोड़िए. इनको सरकार बनानी ही नहीं चाहिए थी. भाजपा दिल्ली में इससे बेहतर स्थिति में थी लेकिन उसने दिल्ली में सरकार बनाने में इतना समय क्यों लगाया था. अब दिल्ली से तो ज्यादा संवेदनशील मामला कश्मीर का है. तो फिर उसे इतनी जल्दी क्या पड़ी थी सरकार बनाने की. सरकार बनाना स्वंय में कोई लक्ष्य तो है नहीं. सरकार बनाना साधन होता है खासकर भाजपा सरीखी पार्टी के लिए. भाजपा कश्मीर में सिद्धांतचित हुई है.

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सरकार बनने के अगले दिन मीडिया से बातचीत में भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के उप मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने कहा, ‘हमने कश्मीर में असंभव को संभव बना दिया है. हम चाहते हैं कि प्रदेश में तरक्की हो. हमारा उद्देश्य है कि जम्मू और कश्मीर का जो धार्मिक विभाजन है वो खत्म हो. यही हमारे न्यूनतम साझा कार्यक्रम की आत्मा है. जम्मू कश्मीर की जनता सुशासन चाहती है. वो चाहती है कि सरकार काम करे. वो पारदर्शी हो, भ्रष्टाचार मुक्त हो. मुफ्ती मोहम्मद सईद को असंभव को संभव बनाने का श्रेय दिया जाना चाहिए.’

भाजपा नेताओं ने इस गठबंधन सरकार को ऐतिहासिक बताया तो पीडीपी प्रवक्ता नईम अख्तर का भी बयान आ गया. उन्होंने गठबंधन सरकार को एक नई सकारात्मक राजनीति की शुरुआत बताया. बकौल नईम, जम्मू कश्मीर ही नहीं बल्कि इसने पूरे देश के लिए एक नया मानक स्थापित किया है. लोकतंत्र को जम्मू कश्मीर में नया जीवन मिला है.

ये सही है कि पीडीपी और भाजपा का मिलना तेल और पानी के मिलन जैसा है. ये आपस में घुल मिल नहीं सकते. लेकिन फिर भी यह माना जा रहा है कि दोनों पार्टियां, जो इतनी मुश्किलों के बाद साथ आई हैं वो इस ऐतिहासिक संबंध को बनाए रखने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेंगी. तो फिर क्या कारण है कि महज एक महीने के भीतर ही मामला तलाक के पास पहुंचता दिखाई दे रहा है.

पार्टी नेताओं से बातचीत में संकेत मिल जाता है कि दोनों दलों ने भले एक-दूसरे के साथ गठबंधन कर सरकार बना ली है लेकिन दोनों को इस बात का एहसास है कि दोनों दलों का वोटर दूसरी पार्टी का घोर विरोधी है. गठबंधन के कारण पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों की नाराजगी का भी डर बना हुआ था. पीडीपी के एक विधायक कहते हैं, ‘मुफ्ती साहब को भी पता है कि कश्मीर की जनता भाजपा के बारे में क्या सोचती है. लेकिन पार्टी ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई. इसका चाहे जो फायदा वो कश्मीर की जनता को बताएं लेकिन एक सवाल तो खड़ा होता ही है कि पार्टी ने भाजपा और मोदी से क्यों हाथ मिलाया.’

जानकार बताते हैं कि समर्थकों के इसी वर्ग को संतुष्ट करने के लिए कि पार्टी ने अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया है मुफ्ती ने अपने तरीके से लोगों को संबोधित करना शुरू किया. कहा जा रहा है कि इसी के तहत शपथ ग्रहण के घंटे-भर के भीतर ही मुफ्ती मोहम्मद सईद ने उस पार के लोगों, आतंकियों और पृथकतावादियों की तारीफ करनेवाला बयान दिया. कश्मीर की राजनीति को समझनेवाले मानते हैं कि अफजल गुरु के मामले में कुछ होना जाना नहीं है लेकिन सिर्फ एक तबके को संतुष्ट करने और भाजपा से गठबंधन करने के कारण उपजी नाराजगी और संदेह को कम करने के लिए पार्टी ने अपने आठ विधायकों से अफजल गुरु संबंधी पत्र लिखवाया.

पीडीपी के सूत्र बताते हैं कि उसी सोच के तहत मसर्रत की रिहाई मुफ्ती सरकार द्वारा किए जाने कि बात प्रचारित की गई. सच यह है कि मसर्रत को पहले ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने बरी करने का आदेश दे रखा था. उसे सभी मामलों में जमानत मिल गई थी. लेकिन सरकारी लापरवाही के कारण वो जेल से बाहर नहीं आ पाया था. इस मसले पर सबसे ज्यादा फजीहत भाजपा समेत केंद्र सरकार की हुई है. जनता के मन में सवाल है कि वो कौन वजह सी थी जिसने राष्ट्रपति शासन के दौरान सरकार को मर्सरत के खिलाफ कार्रवाई करने से रोका था. वहीं यह कैसे हो सकता है कि केंद्र सरकार को इस मामले में कुछ मालूम न हो. सरकार इतनी मासूम तो नहीं. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मीर इमरान कहते हैं, ‘देखिए इन तीनों मामलों के माध्यम से पीडीपी उस जनता की नाराजगी दूर करना चाहती है जो भाजपा से गठबंधन के चलते नाराज है. पार्टी ये बताना चाहती है कि भाजपा से उसका गठबंधन उसकी शर्तों पर हुआ है और उसने कोई समझौता नहीं किया है. ऐसा तो नहीं है कि ये आखिरी बार है और इसके बाद पार्टी कश्मीर में चुनाव नहीं लड़ेगी. मुफ्ती को पता है कि अगले चुनाव में उनका भाजपा के साथ जाना ही नेशनल कॉन्फ्रेंस का चुनावी मुद्दा रहनेवाला है.’ भाजपा की परेशानी और गठबंधन में गांठ का जन्म यहीं से होता है. उसे पता है कि राजनीतिक रूप से जो पीडीपी का फायदा है वही भाजपा का नुकसान है. यानी जो कुछ भी मुफ्ती सईद और उनकी सरकार ने पिछले दिनों में कहा और किया वो सारी चीजें भाजपा की जम्मू केंद्रित राजनीति के लिए नुकसानदेह है. भाजपा का एक धड़ा पीडीपी से गठबंधन के खिलाफ था. ऐसे में पीडीपी के बयानों और मसर्रत की रिहाई ने कोढ़ में खाज का काम किया.

पिछले एक महीने में प्रदेश भाजपा के नेताओं ने ही अपनी पार्टी की गठबंधन सरकार के खिलाफ कई प्रदर्शन किए हैं. भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक शुरू में इस गठबंधन को लेकर खासे उत्साहित थे क्योंकि कश्मीर में पहली बार उनकी सरकार बनने जा रही थी, लेकिन अब वही कार्यकर्ता पीडीपी से चिढ़े बैठे हैं. पार्टी के एक कार्यकर्ता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘कश्मीर में सरकार बनाना हम सभी के लिए गर्व की बात है. श्यामा प्रसाद ने कश्मीर के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. ये  ऐतिहासिक मौका है. मैं अपनी पार्टी के नेताओं और लोगों के बारे में कह सकता हूं कि सभी चाहते हैं कि ये गठबंधन सफल हो. लेकिन पीडीपी अपनी हरकतों से इसकी हत्या करने पर तुली है. वह अपनी राजनीति चमका रही है. एक सीमा से ज्यादा तो समझौता नहीं किया जा सकता. वो नहीं सुधरे तो संबंध तो टूट ही जाएगा.’

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘देखिए अब सब सामने आ चुका है, वो आदमी सभी मामलों में बरी हो चुका था. उसे छोड़ा जाना ही था. पार्टी को भी उससे आपत्ति नहीं थी लेकिन जिस तरह से उसकी रिहाई के बाद मीडिया ने मामले को रंग दिया, तथ्यों की अनदेखी की उससे पार्टी को मजबूरन उसका विरोध करना पड़ा. वो एक सामान्य न्याय व्यवस्था का मामला था. लेकिन मीडिया ने लोगों के मन में भावना डाल दी कि मसर्रत एक खुंखार आंतकी है.’ प्रधानमंत्री को मजबूर होकर इस विषय पर बयान देना पड़ा. नीतीश कुमार जैसे नेता जो शायद ही किसी राष्ट्रीय विषय पर बोलते सुनाई दिए हों, वे भी मसर्रत की रिहाई पर भाजपा को घेरते नजर आए. पूरा विपक्ष राष्ट्रवाद के आसमान पर और राष्ट्रवाद की चैंपियन भाजपा जमीन पर आ गई.

अखनूर से भाजपा विधायक राजीव शर्मा कहते हैं, ‘पीडीपी ने जो कुछ कहा और किया है उस हमारी कोई सहमति नहीं है. आगे से ऐसा होगा तो इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हमें पूरा जनादेश नहीं मिला था. जनता ने हमें विकास के लिए जनादेश दिया है. हमें वही करना है. हमने धारा 370 और अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया है.’ भाजपा चाह कर भी अपनी इस खीज को मिटा नहीं पा रही कि पीडीपी ने गठबंधन के बावजूद अपने वोटर को जो संदेश देना था,वो दे दिया है जबकि भाजपा इस मसले पर बुरी तरह पिछड़ गई है. इसके साथ नैतिक और वैचारिक हार का डर भाजपा नेताओं को लगातार दुस्वप्न दिखा रहा है.

सो, जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी का गठबंधन एक ऐसा संबंध है जिसे दोनों में से कोई भी, किसी भी वक्त तोड़ना चाहे तो उसके पास सैंकड़ों बहाने मौजूद हैं. जम्मू कश्मीर भारत का कोई अन्य प्रदेश नहीं है जहां गठबंधन की सरकार चल रही है. राजनीतिक विश्लेषक मीर इमरान कहते हैं, ‘यहां का गठबंधन एक दीर्घकालीन प्रभाव पैदा कर सकता है. वो चाहे तो जम्मू और कश्मीर, हिंदू और मुस्लिम के बीच की खाई को पाट सकता है. भारत और जम्मू कश्मीर के बीच के अंतर को कम कर सकता है. भाजपा और पीडीपी दोनों को कुछ नरम कर सकता है. लेकिन इसके लिए अल्पकालिक राजनीतिक स्वार्थ नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक दृष्टि की जरूरत है.’ मीर कहते हैं, ‘बाकी अन्य दलों को भी इस गठबंधन को मजबूत बनाने में अपना योगदान देना चाहिए. बाकी इसके तोड़ने के तो हजारों कारण दोनों दलों के पास हैं ही.’

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