कोका कोला की प्यास से बंजर होता बनारस

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ग्राम पंचायतों का समर्थन कर रहे कैलिफोर्निया स्थित इंडियन रिसोर्स सेंटर के अमित श्रीवास्तव ने कहा, ‘ग्राम प्रधानों की शिकायत से साफ है कि कोका कोला कंपनी मेहदीगंज के लिए समस्याएं पैदा कर रही है. कोका कोला को अब यहां से लौट जाना चाहिए. मेहदीगंज खेती योग्य इलाका है और यहां लोग अपनी जरूरतों के लिए भूमिगत जल पर ही निर्भर हैं. सिंचाई, मवेशियों के लिए, पीने और बाकी कामों के लिए भूमिगत जल ही उनका सहारा है. जबकि कोका कोला इसी पानी का उपयोग अपने उत्पाद यानी मुनाफा कमाने के लिए करती है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोका कोला कंपनी पानी का प्रयोग जिम्मेदारी से करने का दावा करती है लेकिन भारत में उसकी असलियत कुछ और ही है. यहां कंपनी अनुचित रूप से भूजल का दोहन कर रही है. जिसके चलते स्थानीय लोगों को पानी की कमी झेलनी पड़ रही है. साथ ही वे प्रदूषित पानी के साथ जिंदगी बसर करने को मजबूर हैं. इस इलाके की खेती पूरी तरह से बर्बाद हो रही है. जलस्तर नीचे जाने से किसानों के ट्यूबवेल से पर्याप्त पानी नहीं आता है. हर किसान के पास इतना पैसा नहीं है कि वह अपनी पानी की बोरिंग को नीचे तक ले जा पाए. इसलिए फसलें सूख जा रही हैं.’

हालांकि अमित श्रीवास्तव सीजीडब्लूए द्वारा भूजल इस्तेमाल को लेकर 16 नवंबर 2015 को लाई गई गाइडलाइन से खासे उत्साहित हैं. इसके तहत अधिक दोहित इलाके में भूमिगत जल का इस्तेमाल कर रहे संयंत्रों को अब सीजीडब्लूए की मंजूरी लेनी होगी. पहले सिर्फ उन्हें क्षमता विस्तार करने के लिए मंजूरी की जरूरत पड़ती थी. उनका कहना है कि इस गाइडलाइन से उनके आंदोलन को मदद मिलेगी.

 परेशानी का सबब बना प्लांट

स्थानीय निवासी दीपक चौबे का कहना है, ‘जब से कोका कोला कंपनी आई है तब से जलस्तर बहुत नीचे चला गया है. जो पानी पीने के लिए मिलता है वह भी बहुत गंदा है.’ ऐसा ही मानना ग्रामसभा देउरा के प्रधान राजेश वर्मा का है. वह कहते हैं, ‘कोका कोला प्लांट ने इतना पानी निकाल लिया है कि जलस्तर काफी नीचे चला गया है. गांव के लोग पानी की समस्या को लेकर हमारे पास आते हैं, तो हमारे सामने भी कोई विकल्प नहीं होता है. नए हैंडपंप और ट्यूबवेल के लिए आपको अनुमति लेनी पड़ती है, पुरानों से पानी नहीं आ रहा है. कुल मिलाकर हालात बद से बदतर हैं.’

कोका कोला एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहती है कि भले ही इन गांवों के तालाब, कुएं और हैंडपंप सूख चुके हैं लेकिन इस बात के सबूत नहीं मिले हैं कि इसके लिए उनका संयंत्र जिम्मेदार है

इसी तरह नागेपुर के प्रधान मुकेश कुमार ने बताया, ‘इलाके के ज्यादातर गांवों में पानी की व्यवस्था का बुरा हाल है. 2005 के करीब जब मैं पहली बार प्रधान बना तो हाल खराब होना शुरू हो गया था. शुरुआत में हमारी समझ में नहीं आया, लेकिन धीरे-धीरे पता चला कि इसके पीछे कोका कोला प्लांट है. स्थिति ज्यादा खराब तब हो गई जब 2009 में हमारे इलाके को ओवर एक्सप्लाॅयटेड घोषित कर दिया गया. इसके बाद सारे ग्राम पंचायतों के प्रमुखों ने मिलकर इसका विरोध करना शुरू किया. कंपनी ने जब अपने संयंत्र का विस्तार करने के लिए आवेदन किया तो हम सारे प्रधानों ने भी सभी विभागों को पत्र लिखा, जिसके बाद संयंत्र तो बंद नहीं हुआ, लेकिन विस्तार रुक गया. यह हमारी बड़ी जीत थी. अब हमने फिर से पत्र लिखकर इस प्लांट को बंद करवाने की मांग की है.’

 प्रशासन को परवाह नहीं

ग्राम प्रधानों ने मामले को लेकर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जल संसाधन मंत्रालय, केंद्रीय भूजल प्राधिकरण, केंद्रीय भूजल बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, ग्राम विकास मंत्रालय, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी और वाराणसी के जिलाधिकारी को पत्र लिखे हैं. 15 नवंबर को लिखे इस पत्र का महीने भर बाद भी कहीं से जवाब नहीं आया है और न ही किसी तरह की कार्रवाई की बात मीडिया के जरिये सामने आई है. जब इस मामले पर वाराणसी के जिलाधिकारी राजमणि यादव से बात की गई तो उन्होंने बताया, ‘पर्यावरण और भूगर्भ जल संरक्षण विभाग से इस मामले पर रिपोर्ट मांगी गई है. उनका जवाब आने के बाद नियमानुसार कदम उठाए जाएंगे.’ उन्होंने कहा, ‘ग्राम प्रधानों की शिकायत हमें डाक के जरिये मिली थी, इसलिए मामले को लेकर उठाए गए कदमों से प्रधानों को अवगत नहीं कराया गया है.’

वहीं नंदलाल मास्टर कहते हैं, ‘यह आंदोलन काफी लंबे समय से चल रहा है. जब भी किसी राजनीतिक पार्टी के नेता विपक्ष में होते हैं, तब वे हमारे समर्थन में होते हैं, हमारे साथ प्रदर्शन करते हैं, लेकिन जैसे ही उनकी सरकार आती है, उन्हें हमारी परेशानी दिखनी बंद हो जाती है. बॉटलिंग प्लांट को लेकर साल 2004 से 2009 तक लगातार आंदोलन भी होते रहे. इसमें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय और समाज सेवी मेधा पाटकर जैसे लोगों ने भी भाग लिया था. कई विधायकों ने हमारे साथ प्रदर्शन किया है, लेकिन यह प्लांट आज भी चल रहा है.’

 कंपनी का आरोपों से इंकार

ग्राम प्रधानों द्वारा जलस्तर नीचे जाने को लेकर कोका कोला संयंत्र को जिम्मेदार ठहराए जाने से कंपनी साफ इंकार करती है. कंपनी केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा वर्ष 2012 में हुए एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहती है कि भले ही इन गांवों के तालाब, कुएं और हैंडपंप सूख चुके हैं, लेकिन इस बात के सबूत कहीं नहीं मिले हैं कि इसके लिए मेहदीगंज स्थित संयंत्र जिम्मेदार है. रिपोर्ट के हवाले से कोका कोला कंपनी कहती है कि संयंत्र आराजी लाइन ब्लॉक के भूमिगत जल का सिर्फ 0.06 प्रतिशत ही इस्तेमाल करता है, जबकि खेती के लिए 85.5 प्रतिशत जल का इस्तेमाल होता है. कंपनी का कहना है कि वह भूमिगत जल की कमी से खुद भी चिंतित है और जलस्तर ऊपर उठाने के लिए कई गैर सरकारी संगठनों के साथ काम भी कर रही है. भूमिगत जलस्तर घटने के चलते ही कंपनी ने अपने विस्तार की योजना को भी रद्द कर दिया है.