भुरभुरी दिल्ली में सब रामभरोसे चल रहा है

इन सब तरह की समस्याओं के बीच भूकंप के लिहाज से शहर को देखना भी जरूरी है. भगवान न करे कि ऐसा कोई भी दिन हमारी दिल्ली पर आए. लेकिन आए तो हमारी कोई तैयारी नहीं है यह कह देना ज्यादा सरल है. अवैध मानी जानेवाली बस्तियों में वैध तरीके से मकान खड़ा करने की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती है. अपनी मेहनत-मजूरी से पैसे बचाकर एक-एक, दो-दो ईंट जोड़कर एक कमरा डाल लेते हैं, उसके ऊपर एक और कमरा ऐसा ही कुछ-कुछ करके डाल लेते हैं ताकि उसमें से कुछ किराया मिलने लगे. इस प्रयास में तीन-चार मंजिल का निर्माण तो हो ही जाता है. इन बस्तियों में ऐसे मकान भी होते हैं, केवल झुग्गियां ही नहीं होती हैं. इन मकानों में सबसे सस्ती और कमजोर सामग्री लगाई जाती है. एक तरफ तो यह है और दूसरी तरफ बड़े-बड़े बिल्डर हैं. उनके राजनीतिक संपर्क हैं. जमीनें भी उनमें से बहुतों ने अवैध तरीके से ली हैं लेकिन वो सब वैध बनती चली जाती हैं. उनके द्वारा बनाई गई बिल्डिंगों में किस स्तर की सामग्री लगी है, यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता. हालांकि जिस तरह से तुरंत पैसा कमाने की प्रवृत्ति दिखती है, उसके चलते उनकी बसाई बस्तियों के बारे में भी बहुत भरोसा नहीं जमता है. भगवान न करे कि ऐसा दिन आए कि वैध बस्तियों को शक्ति परीक्षण के दौर से गुजरना पड़े. संभव है कि हमारी दोनों ही बस्तियां प्रकृति के शक्ति परीक्षण में असफल हो जाएं. इन दो बसावटों के बीच दिल्ली की एक तीसरी बसावट वो है जिसे सरकारी माध्यमों से बनाकर खड़ा किया गया है. सरकारी बस्तियां हैं, सरकारी इमारतें हैं. दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के 10-20 साल पुराने मकानों की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं है. इन इमारतों में से कुछ की हालत तो इतनी बुरी है कि बिना भूकंप आए ही कोई छू दे तो यह भरभरा के गिर जाएं. ये तो उन इमारतों में रहने वालों ने किसी तरह बस उसे टिकाए रखा है. इस तरह देखा जाए तो पूरी दिल्ली पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं.

चाहे वह वैध बस्तियां हों या अवैध-दोनों जगहों पर नगरपालिका पानी की मांग पूरी करने लायक बची नहीं है. दोनों ही जगहों को अपने-अपने ढंग से पानी जमीन के नीचे से खींचना पड़ता है. हर जगह पंप, बोरिंग और हैंडपंप लगे हैं. ये पानी पीने लायक हैं या नहीं, यह एक अलग विषय है लेकिन इन दोनों ही इलाकों में से पानी रोज-रोज निकाला जाता है. भूजल स्तर के कम होने के साथ-साथ जो दबाव है, वह धीरे-धीरे कम होता जाता है. पानी के सोखे जाने से जमीन में एक खोखलेपन के वातावरण का भी निर्माण होता जाता है. इस साल से पहले इस बात का इतना खतरा नहीं था क्योंकि हर साल इतनी बरसात हो जाती थी कि एक तरफ जमीन से हम पानी निकालते हैं तो दूसरी ओर प्रकृति भरपूर पानी गिरा देती थी. हम कुछ बूंद जमीन से निकालते थे, प्रकृति कुछ बूंद ऊपर से गिरा देती थी. अब हमने प्रकृति के पानी डालने के रास्ते सड़कें बनाकर, मकान बनाकर, पार्क में टाइल्स लगाकर बंद कर दिए. हमने अपनी सार्थक भूमिका तो निभाई नहीं लेकिन प्रकृति के सार्थक भूमिका को भी बाधित कर दिया. अब ऐसे में खोखली होती जमीन को लेकर प्रकृति अपनी छोटी-मोटी हलचल में कितना नुकसान करेगी, इसका कोई वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है. यहां सबकुछ रामभरोसे ही चल रहा है.

(स्वतंत्र मिश्र से बातचीत पर अाधारित)

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