प्रतिरोध के कवि ‘डॉ. डैंग’

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60 प्वाइंट, काली चीख

‘इतने मरे’

यह थी सबसे आम, सबसे खास खबर

छापी भी जाती थी

सबसे चाव से

जितना खून सोखता था

उतना ही भारी होता था अखबार

जीवन

किन्तु बाहर था

मृत्यु की महानता की उस साठ प्वाइंट काली

चीख के बाहर था जीवन

वेगवान नदी हहराता

काटता तटबंध

तटबंध जो अगर चट्टान था

तब भी रेत ही था

अगर समझ सको, तो महोदय पत्रकार

पांच अगस्त 1947 को टिहरी गढ़वाल के कीर्तिनगर में पैदा हुए वीरेन डंगवाल ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में डीफिल किया. 1971 में बरेली काॅलेज के हिन्दी विभाग में प्रवक्ता बन गए. बाद में विभागाध्यक्ष भी रहे. वीरेन दा का पहला कविता संग्रह 43 की उम्र में ‘इसी दुनिया में’ नाम से आया. दूसरा संकलन ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ नाम से 2002 में आया, जिसके लिए 2004 में उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान मिला. कुछ दुर्लभ अनुवाद भी उनके खाते में दर्ज हैं, जिनमें पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, नाजिम हिकमत के अनुवाद काफी चर्चित हुए. अमर उजाला, बरेली और कानपुर संस्करण के संपादक रहे. 2010 में बरेली काॅलेज से नौकरी पूरी करने बाद ‘डाॅ. डैंग’ (उनके कुछ दोस्तों का दिया नाम), जब विदा ले रहे थे तो उनको काॅलेज प्रबंधन की ओर से शाॅल और गीता भेंट की गई. गीता लेने से उन्होंने बड़ी सहजता से मना कर दिया. बोले, ‘गीता रहने दीजिए. अभी मैं मोह माया से मुक्त नहीं होना चाहता हूं. अभी भरपूर जीवन जीना है.’ लेखक सुधीर विद्यार्थी कहते हैं, ‘यह उनकी जिजीविषा ही थी कि बीमारी के दौरान उन्होंने अपनी सबसे सुंदर कविताएं लिखीं.’

ऐसे ‘डाॅ. डैंग’ को सलाम.

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