चिराग तले अंधेरा | Page 2 of 2 | Tehelka Hindi

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चिराग तले अंधेरा

अमानवीय परिस्थितियों और तमाम तरह के दबावों के बीच काम कर रहे पत्रकारों से सच का झंडाबरदार बनने की उम्मीद कैसे की जा सकती है..? हाल ये है कि समाज को सच की नई रोशनी दिखाने वालों पत्रकारों की जिंदगी में ही भयावह अंधेरा पसरा हुआ है

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वरिष्ठ पत्रकार और निजी हिंदी समाचार चैनलों की पहली द्विभाषी एंकर सुधा सदानंद बताती हैं, ‘टीवी समाचारों के संदर्भ में ‘विश्वसनीय मीडिया’ कहना ही एक विरोधाभास है, ठीक उसी तरह जैसे ‘दयालु तानाशाह’ कहना. वैसे दिलचस्प बात ये है कि चैनलों के एडिटर-इन-चीफ बिलकुल ऐसे ही व्यवहार करते हैं. कई बार खबरें इकट्ठी करके उनका प्रसारण करना एक गिरोह की कार्य-पद्धति जैसा होता है, जहां ‘मुखिया डॉन’ किसी नेता/अभिनेता/एनजीओ/फिल्म के खिलाफ सुपारी दे देता है और एंकर बिना कोई शोध किए, बिना पृष्ठभूमि जाने चिल्ला-चिल्लाकर उस बात को सनसनीखेज खबर में बदल देता है.’

काटजू की मीडिया पर टिप्पणी पर जहां टीवी मीडिया पूरे जोर-शोर से उनके खिलाफ दलीलें दे रहा था, वहीं अगर सोशल मीडिया की मानें तो लोग जस्टिस काटजू की बात से सहमत लग रहे थे. मीडिया की उस आक्रामक प्रतिक्रिया ने मीडिया के प्रति आम लोगों के दृष्टिकोण को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया था. अब दर्शक और पाठक मीडिया के लोगों की विश्वसनीयता पर प्रश्न करने लगे थे. मीडिया आलोचक सुदीप दत्ता कहते हैं, ‘जस्टिस काटजू का बयान पत्रकारिता की गंभीरता के प्रति उनकी जागरूकता का परिणाम था, मीडिया यहां इसे अपनी कमजोरियों को सुधारने के लिए प्रयोग कर सकता था पर उन्होंने नाराज होकर असल संदेश को ही कुचल दिया.’

जिन लोगों ने समाचार चैनलों, खासकर हिंदी समाचार चैनलों के लिए काम किया है वे अच्छी तरह जानते हैं कि नौकरी या प्रमोशन का मिलना आपकी शैक्षणिक योग्यता और पत्रकारिता कौशल के इतर कई अन्य बातों पर निर्भर करता है. एक राष्ट्रीय हिंदी समाचार चैनल के असिस्टेंट आउटपुट एडिटर बताते हैं, ‘जब संपादक किसी को नौकरी पर रखते हैं तो क्षेत्रवाद और किसी विशेष के लिए तरफदारी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और फिर ऐसे पत्रकार से आप कैसे काम की उम्मीद रखेंगे जो अपनी योग्यता नहीं बल्कि किसी के प्रभाव के बलबूते चैनल में आया है?’ पर फिर अब योग्य पत्रकारों की आवश्यकता ही किसे है?

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संदर्भ में देखें तो एक रिपोर्टर की भूमिका अब बस एक ‘साउंड-बाईट’ एकत्र करने वाले की हो गई है. संपादकों को अमूमन न्यूज रूम में रिपोर्टरों को धमकाते हुए सुना जा सकता है, ‘मैं एक कैमरामैन को ही किसी नेता की साउंड-बाईट लाने को भेज सकता हूं तो मुझे तनख्वाह देकर रिपोर्टर रखने की क्या जरूरत है?’

चैनलों में सुबह-सुबह होने वाली संपादकीय मीटिंग्स में दिनभर की खबरों के लिए जो एजेंडा बनाया जाता है वो मूलतः उस दिन के अखबार की खबरों पर आधारित होता है. रिपोर्टर्स को किसी मुद्दे विशेष पर किसी नेता की बाईट (मुख्यतः उनकी प्रतिक्रिया) लाने की जिम्मेदारी दी जाती है और ओबी वैन से कुछ लाइव फीड देने को कहा जाता है. अब खबरें फील्ड में नहीं बल्कि न्यूज रूम में बनती हैं. चैनल को गेस्ट-कोऑर्डिनेटर को कुछ ‘विशेषज्ञों’ को बुलाने को कहा जाता है. हर चैनल के पास अपने चुनिंदा विशेषज्ञ होते हैं. खबरें भले ही बदलती रहें पर ये विशेषज्ञ शायद ही कभी बदलते हैं. इन विशेषज्ञों में बेकार नेता, कुछ वरिष्ठ पत्रकार और कुछ समाजसेवी होते हैं. सुबह से ही इन बहसों के प्रोमो चैनल पर दिखते हैं और फिर घिसे-पिटे छह से आठ खिड़कीनुमा ग्राफिक में प्राइम टाइम पर इस मनोरंजक बहस को खबर के रूप में पेश किया जाता है. सुधा कहती हैं, ‘रिपोर्टर्स अब बेकार हो चुके हैं और डेस्क पर वो लोग हैं जिनमें बाहर यानी फील्ड में जाकर काम करने की कूवत ही नहीं है. महज तस्वीरों के लिए स्क्रिप्ट लिखना! क्या कोई बताएगा ये क्या मूर्खता है? खैर मुझे इस बारे में नहीं जानना कि किस खूबी के आधार पर प्राइम टाइम के लिए एंकर चुना जाता है. मुझे एक ऐसा चैनल बता दीजिये जहां पर एंकर शीर्ष पद का न हो, या ऐसा कोई खूबसूरत चेहरे का मालिक जिसे साधारण प्रश्न भी प्रोडक्शन कंट्रोल रूम से बताए जाते हों. हां अपवाद हैं पर वो बहुत ही कम हैं.’

मीडिया में ऐसी बातें इसलिए भी देखी जाती हैं क्योंकि अच्छी खोजी रिपोर्ट्स और सामाजिक रिपोर्ट्स के लिए निवेश की भारी कमी है. अधिकांश चैनल घाटे में चल रहे हैं तो ऐसे में उनका फोकस बस यही रहता है कि कैसे रिपोर्टर को बिना फील्ड में भेजे, दफ्तर में बैठे-बैठे ही ज्यादा से ज्यादा खबरें इकट्ठी कर ली जाएं- इस अभ्यास को सामान्यतया ‘आर्मचेयर जर्नलिज्म’ यानी कुर्सी पर बैठ कर की जाने वाली पत्रकारिता के रूप में जाना जाता है. और साफ सी बात है कि इस तरह बिना जमीनी विश्लेषण के की गई इस रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना लाजिमी है. जमीनी रिपोर्टिंग की कमी की भरपाई स्टूडियो में होने वाली डिबेट या बहस से की जाती है, जो या तो निरुद्देश्य होती है या वही पुरानी बातें दोहराती हैं.

एक नामी हिंदी चैनल के संपादक बताते हैं, ‘ये सब टीआरपी का खेल है. हम वही दिखाते हैं जो ज्यादा बिकता है और हमें टीआरपी के चार्ट में ऊपर ले जा सकता है. लोग यही देखना चाहते हैं. कितने दर्शकों में किसी सामाजिक मुद्दे पर तीस मिनट लंबी डाक्यूमेंट्री देखने का धैर्य होता है?’ संयोग की बात ये है कि ये संपादक चैनल में दोहरी भूमिका निभाते हैं. पहली तो खबरों को देखना और दूसरा चैनल में रेवेन्यू जनरेशन यानी धन की आवाजाही का भी ध्यान रखना. ये संपादक आगे बताते हैं, ‘रिपोर्टर्स की महत्ता धीरे-धीरे कम होती जा रही है. मैं एजेंसीज द्वारा दी गई साउंड-बाईट के आधार पर 24 घंटे का एक समाचार चैनल चला सकता हूं. तो ऐसे में उसी नेता की वही साउंड बाईट लाने के लिए रिपोर्टर रखना सिर्फ फिजूलखर्ची होगी!’

क्या पत्रकारिता के बाहर की दुनिया न्यूजरूम, पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के प्रबंधन के बीच में होने वाली इन घटनाओं से वाकिफ है? शायद हां, क्योंकि जिस तरह की खबरों और विचारों को इकठ्ठा किया जाता है, इनका प्रसारण होता है उससे लोग प्रभावित होते हैं. न्यूज चैनलों के माध्यम से ही वो अपने आस-पास से लेकर दुनियाभर की गतिविधियों को जान पाते हैं और बेशक समाचारों का ये बदलता स्तर उनके जीवन को प्रभावित करता है.

खबरों के बनने और उन्हें प्रसारित करने में दूसरा प्रभावी पहलू किसी विशेष दृष्टिकोण की ओर झुकाव भी है. कोई भी दर्शक बहुत ही आसानी से बता सकता है कि कौन-सा चैनल किस पार्टी या विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है. ऐसे मुद्दे जहां पर घोर असहमति होती है वहां कई बार केवल एक ही पक्ष के हित की बात की जाती है और ईमानदारी से सच और असल तथ्यों को जानने की कोशिश नहीं होती. ऐसे में भ्रामक खबरों का प्रसार बढ़ता है. उदाहरण के लिए, अन्ना हजारे को या तो ‘दूसरा गांधी’ कहा जाता है या बदमाशों के दल का नेता! सामान्य रूप से गंभीर खबरों के गिरते स्तर के पीछे गैर-जरूरी समाचार चैनलों का लगातार मुख्यधारा में बने रहना भी है. उलटे-सीधे, निरर्थक नाईट ऑपरेशनों ने भी मीडिया का खासा नुकसान किया है. ऐसे कई चैनल किसी चुनाव के समय की अंधी दौड़ में शुरू होते हैं. ये किसी पार्टी विशेष का प्रचार करते हैं, विज्ञापनों से अपने हिस्से का धन बटोरते हैं और फिर काम खत्म होते ही रातोंरात चैनल बंद करके, सैकड़ों कर्मचारियों को बेरोजगार करते हुए निकल जाते हैं. ऐसा ही केस ‘जिया न्यूज चैनल’ का है जो 2014 के लोकसभा चुनावों के समय बड़े जोर-शोर से शुरू हुआ और चुनाव परिणाम आने के कुछ ही महीनों के अंदर बोरिया-बिस्तर समेटकर चलता बना.

मीडिया पर कम होते भरोसे के पीछे चिट-फंड कंपनियों का चैनल मालिक होना है. राष्ट्रीय चैनल न्यूज एक्सप्रेस का उदाहरण देखिए. इस चैनल की मालिक एक चिट-फंड कंपनी है और चैनल की संपादकीय नीतियां मालिक की जरूरतों के हिसाब से निर्धारित की जाती हैं.

ढेरों मुश्किलों और धमकियों से जूझ रहा मीडिया अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहा है, लोकतंत्र में तो मीडिया का महत्त्व और बढ़ जाता है, ऐसे में वर्तमान भारतीय मीडिया एक दोराहे पर खड़ा हुआ है. आज इनके द्वारा लिया गया कोई भी कदम भले ही सही हो या गलत, सोशल मीडिया पर उसका गहरा विश्लेषण किया जाता है. ये सारी जिम्मेदारियां उस पत्रकार की समझी जाती हैं जो किसी हलवाई की दुकान के मजदूर जितनी असुरक्षा में जी रहा है, जिसके ऊपर काम संबंधी सारे उत्तरदायित्व हैं पर उसके अधिकारों के बारे में कोई बात नहीं है. ये शायद इनकी नियति बन गई है पर क्या ये उचित है?

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5 Comments

  • प्रिंट मीडिया में भी ऐसे संपादक – प्रकाशक हैं जो बड़ी शान से पत्रकारों – लेखकों के मेहनत से कमाए पैसे मारने में गौरवान्वित होते हैं | एक तो ये पैसे ही इतने कम देते हैं कि इनके संस्थानों में कार्यरत पत्रकार किसी प्रकार अपना परिवार चला पाते हैं , दूसरे ये पैसे मारने में भी एक्सपर्ट होते हैं | पैसे मारने का ये शर्मनाक खेल सभी जगह चल रहा है |

  • मीडिया जगत में इस हालत का जिम्मेदार आखिर कौन है ? निकट भविष्य में वर्तमान स्थिति मेें सुधार के कोई संकेत भी नहीं दिख रहा ?

  • आखिरकार बाज़ार आँगन में घुस ही गया !
    मालिक संपादक बन बैठे हैं और संपादक…

  • माननीय महोदय, आपके दवारा किया गया कार्य बहुत ही उम्दा है, निरंतर प्रगतिशील रहे ! धन्यवाद!!!
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