‘जन’ से दूर ‘औषधि’

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, देश में 3.2 प्रतिशत भारतीय दवाओं पर होने वाले क्षमता से अधिक खर्च के कारण हर साल गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं. भारत में स्वास्थ्य खर्च का 80 प्रतिशत हिस्सा जेब पर दबाव डालकर होता है. इसमें भी मरीज के इलाज के दौरान स्वास्थ्य खर्च का 70 प्रतिशत दवाओं की खरीद में जाता है. देश में दवाओं की कीमत और उपलब्धता ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर 1995 (डीपीसीओ) के तहत निर्धारित की जाती है. इसके बाद डीपीसीओ के तहत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) 1997 में गठित किया गया था जो औषधि विभाग के तहत आता है.

हैरान करने वाली बात ये है कि सरकार डीपीसीओ के अंतर्गत दवा निर्माण में जरूरी सिर्फ 74 तत्वों से निर्मित दवाओं की कीमत ही नियंत्रित करती है. बाकी की कीमतें दवा निर्माता निर्धारित करते हैं. वे दवाएं जो इन 74 दवा सामग्रियों के मिश्रण से बनती हैं सूचीबद्ध दवाएंकही जाती हैं. इन दवाओं की कीमत जिनमें कुछ बेहद ही जरूरी दवाएं भी शामिल हैं, प्राय: कम रखी जाती हैं. बाकी गैर-सूचीबद्ध दवाओं की कीमत दवा निर्माता ही निर्धारित करते हैं. अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और मूल्य के रूप में छपी अंतिम राशि का निर्धारण, खुदरा और थोक व्यापारियों को दिया जाने वाला लाभ आदि सभी पर निर्णय दवा निर्माताओं द्वारा ही लिया जाता है. आखिर में निर्माता दवा की कीमत एनपीपीए से पंजीकृत करा लेता है. मूल्य निर्धारण प्राधिकरण केवल यह निगरानी करता है कि गैर-सूचीबद्ध दवाओं की कीमत साल भर में दस प्रतिशत से अधिक न बढ़े. दवा निर्माताओं को एमआरपी निर्धारित करने का अधिकार देने का उद्देश्य दवाओं के एक मुक्त बाजार का निर्माण करना है जिससे कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा हो और दवाओं की कीमतें नीचे लाने में मदद मिले. हालांकि यह दवा नीति अब तक ऐसा करने में सफल नहीं हो सकी.

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कोटवानी अपने एक शोधपत्र में लिखती हैं, ‘दवा विक्रेता उन दवाओं को स्टॉक कर लेते हैं जो ज्यादा बिकती हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि डॉक्टर कुछ चुनिंदा ब्रांडेड दवाएं ही मरीजों के लिए लिखते हैं. वैध रूप से औषधि विक्रेताओं को जेनरिक और ब्रांडेड दवाओं के बीच विकल्प देने की अनुमति नहीं है. डॉक्टर द्वारा लिखे गए किसी दवा के व्यापारिक नाम को किसी अन्य दवा से बदला नहीं सकता है.वहीं मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के नियमों के मुताबिक, डॉक्टरों से उम्मीद की जाती है कि वह कम कीमत वाले जेनरिक संस्करण या ब्रांडेड जेनरिक दवाएं ही मरीजों को लिखें, ताकि लोग आसानी से उसे खरीद सकें.

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आंकड़ों के आईने में

  • भारतीय दवा उद्योग वैश्विक उत्पादन के दस प्रतिशत हिस्से की आपूर्ति करता है. आपूर्ति की मात्रा के लिहाज से यह विश्व में  तीसरे स्थान और मूल्य के लिहाज से 14वें स्थान पर आता है
  • एंटी एचआईवी दवाओं की वैश्विक जरूरत का 30 प्रतिशत हिस्सा भारत में बनता है
  • वैश्विक बाजार में भारतीय दवा उद्योग की हिस्सेदारी 2.4 प्रतिशत है
  • भारतीय दवाएं अमेरिकारूसजर्मनी जैसे तकरीबन 200 देशों में निर्यात की जाती हैं. इसका लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ अमेरिका को निर्यात किया जाता है

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अपने शोध में शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि दवा निर्माता ब्रांडेड जेनरिक दवाओं को उनके समकक्ष पेटेंट दवाओं की तुलना में ऊंचे अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर बेच रहे हैं. इसमें इंजेक्शन भी शामिल हैं जो गंभीर रूप से बीमार मरीजों को लगाए जाते हैं. सरकारी अस्पतालों के पास बने निजी मेडिकल स्टोर इन महंगी दवाओं का स्टॉक रखते हैं और ऊंचे दामों पर मरीज के संबंधियों को बेच देते हैं. जैसा कि सरकार गरीब आबादी तक जरूरी दवाओं की पहुंच की प्रक्रिया में सुधार के लिए जन औषधि योजना को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है, ऐसे में दवा निर्माताओं, खुदरा विक्रेताओं और डॉक्टरों की भूमिका पर भी ध्यान देने की जरूरत है.

सरकार को सबसे पहले अपनी मूल्य निर्धारण पद्धति को लोगों के अनुकूल और दक्ष बनाना होगा. हाल ही में रसायन और उर्वरक मंत्री अनंत कुमार ने फार्मा प्राइस डाटा बैंकका शुभारंभ किया है. यह एकीकृत औषध डाटाबेस प्रबंधन प्रणाली है. इसका प्रयोग दवा निर्माण/क्रय-विक्रय/आयात/वितरण कंपनियां ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर 2013 के तहत बताई गईं जरूरी जानकारियां ऑनलाइन सबमिट करने के लिए इस्तेमाल कर सकेंगी. इसका प्रबंधन एवं संचालन राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा. हालांकि, इससे मरीजों को राहत तब तक नहीं मिलेगी जब तक सरकार मूल्य निर्धारण प्रणाली में कोई बदलाव नहीं लाती. इसके लिए सरकार को किसी दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) तय करने में निर्माताओं की तुलना में ज्यादा भागीदारी रखनी चाहिए. दूसरा, सरकारी फार्मेसी और जन औषधि केंद्र पर आपूर्ति प्रबंधन को मजबूत करना होगा.

रियाज़ वानी के सहयोग से

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