नया सफरः शुरू के दिन

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एक सामान्य व्यक्ति की तरह एक सांसद क्यों नहीं रह सकता? यह सवाल भी मेरे मन में उसी दिन शुरू हुआ, जिस दिन मुझे यह सूचना मिली कि मैं राज्यसभा जानेवाला हूं. इसलिए जब पटना में नामांकन दाखिल करने गया, तो अकेले गया. एक सांसद मित्र ने मजाक में ही कहा कि लेफ्टिस्ट (वामपंथी) की तरह सोचिए, बात करिए, सिद्धांत रखिए. पर जीवन राइटिस्ट (दक्षिणपंथी) की तरह जीयें. यानी एक सांसद के तौर पर आपको जो सरकारी या व्यवस्थागत सुख-सुविधाएं मिलती हैं, उनका पूरी तरह उपयोग करें. और बात सामान्य लोगों की करें. मुझे लगा कि एक सांसद को जहाज में एक्जिक्यूटिव क्लास में यात्रा करने की अनुमति है. पर अगर सामान्य स्थिति में सामान्य श्रेणी में यात्रा कर सकता हूं, अब तक करता रहा हूं, तो क्यों करूं, बिजनेस क्लास में? यह देश का पैसा है, टैक्स देनेवालों का पैसा है. इसलिए तब से आज तक सिर्फ एक -दो बार, खास परिस्थितियों के कारण एक्जिक्यूटिव क्लास में हवाई यात्रा किया. शेष लगभग 99 फीसदी यात्रा सामान्य क्लास में. सबसे सस्ता विमान टिकट लेकर यात्रा करने की कोशिश की.

Paliament

एयरपोर्ट पर आगे बढ़कर अपने सांसद होने का या खास होने का परिचय नहीं बताना. आमतौर से स्थिति यह रहती है कि सांसदों के पास जो दो चार लोग रहते हैं, वे उनके पहुंचते ही वीवीआइपी रूम खुलवाते हैं, उनके अलग से बैठने की व्यवस्था करते हैं. उनकी विशिष्टता के बारे में आसपास के लोगों को बताते हैं. वहां के अधिकारियों को एहसास कराते हैं. इस तरह से लोगों से अपने बारे में कहना वल्गर लगता है. गांधी, लोहिया, जेपी की परंपरा में कहूं, तो अश्लीलता जैसी. इसलिए अब तक इससे बचता रहा. कुछ खास होने का एहसास कराना, यह राजनीति में दिखाई देती है. उससे बचना. एयरपोर्ट पर भी आम लोगों के बीच बैठना, उसी तरह चेकिंग कराना, साथ खड़े लोगों को यह एहसास तक नहीं होने देना कि हम समाज के आम लोगों से अलग हैं. लगभग आठ महीने बाद आवास आबंटित हुआ. उसमें थोड़ा बहुत काम हुआ. आबंटन के समय मैंने कहा था कि जो मामूली काम है, उसे आप करा दें, ताकि रहने लायक हो जाये. मेरी कोई खास पसंद नहीं है. स्पष्ट कर दूं, ऐसा जीने-करनेवालों में मैं अकेले नहीं हूं. अनेक सांसद-विधायक हैं. खासतौर से साम्यवादी-समाजवादी पृष्ठभूमि के. पहले के चाहे कांग्रेसी हों या जनसंघी या अन्य, अधिसंख्य गांधीवादी जीवन शैली में रहते-जीते थे.

एक एयरपोर्ट पर, एक दिन मैंने बहुत रोचक दृश्य देखा. केंद्र सरकार (यूपीए) के मंत्री रहे एक व्यक्ति को मैंने देखा. पहले जेपी भक्त थे. जनता पार्टी में थे. बाद में कांग्रेसी हो गये. वह जहाज से उतर कर टर्मिनल तक बस से नहीं गये. सबके साथ वे जहाज से उतरे. एक दूसरे मंत्री (एनडीए) भी उतरे, वह अपना सूटकेश लेकर जा रहे थे. लेकिन पूर्वमंत्री तब तक वहां खड़े रहे, जब तक वीआइपी गाड़ी उन्हें लेने नहीं आ गयी. दिल्ली एयरपोर्ट पर भी ऐसा एक और दृश्य देखा. एक सज्जन, जो आज के छह साल पहले केंद्र में मंत्री रहे थे, यूपीए- एक में. जिस एयरलाइंस से हम सब आ रहे थे, एयरपोर्ट से प्लेन पकड़ने के लिए वह कॉमन बस से नहीं आये. उनके लिए अलग वीआइपी गाड़ी की व्यवस्था की गयी. ऐसे अनेक दृश्य रोज दिखते हैं.

दरअसल, गुजरे महीनों में यह सारा जो जद्दोजहद रहा, वह इस मानस के कारण कि सांसद बनकर सामान्य नागरिक की तरह क्यों नहीं रहा जा सकता? देखता हूं कि भाजपा के बड़े नेता दीनदयालजी की बातें करते हैं. उन्हें योजनाओं के द्वारा अमर बनाने की कोशिश करते हैं. हम सब तो लोहिया, जेपी की बात करते रहे हैं. पर आज सार्वजनिक जीवन में सादगी के प्रति आदर है? आप राजनीति में मामूली विधायक या जिला परिषद के सदस्य या मुखिया हैं, तो आप खास हैं, यह एहसास सामनेवाले को कराना जरूरी हो गया है. यह है, नये दौर की राजनीति. अगर राजनीति को सचमुच बदलना है, तो सोचने का तरीका बदलना होगा. यह याद दिलाना होगा कि यह देश कामराज का है, लालबहादुर शास्त्री जैसे नेताओं का है, यह लोहिया जैसे नेताओं का है, जो दो जोड़ी कुरता-धोती लेकर रेल में यात्रा करते रहे. ऐसे लोगों की बड़ी जमात है. रामसुभग सिंह, रामसेवक यादव,भोला पासवान शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी जैसे लोग आज स्मृति में हैं? समाज की प्रेरणा के स्रोत हैं.

राज्यसभा में आने के बाद अनेक लोगों ने संपर्क करना शुरू किया कि मेरे बच्चे का नामांकन करा दें. आमतौर से मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि सिस्टम ऐसा हो कि बच्चा जन्म ले या बच्ची जन्म ले, तो आसपास स्थित स्कूलों में स्वतः उसका दाखिला हो जाये. चीन में यह व्यवस्था है. जिस मुहल्ले में आप रहते हैं, उस मुहल्ले के स्कूल में ही आपके बच्चे पढ़ सकते हैं. साम्यवादी देश चीन में ही सिर्फ यह व्यवस्था नहीं है. ऐसी ही व्यवस्था पूंजीवादी देश, अमेरिका में भी है. पर गांधी के देश में एकसमान शिक्षा की व्यवस्था महज सपना रह गया. बहरहाल, मुझे पता चला कि सांसद के पास यह कोटा है कि एक सांसद होने के नाते वह छह बच्चों के नामांकन के लिए सेंट्रल स्कूल में अनुमोदन कर सकता है. इसके तहत सबसे पहले मुख्यमंत्री के निवास पर एक चपरासी मिला था. तब सांसद बना भी नहीं था, पेपर भरने जा रहा था कि उसने अपने दो बच्चों के नाम एडमिशन के लिए दिये. तब तक मुझे अपने कोटे की उपलब्धता के बारे में जानकारी नहीं थी. मुझे लगा कि उसने कहा कि जब आप सांसद हो जायेंगे, तो सांसद होने के प्रभाव के तहत यह दाखिला करायेंगे. पर बाद में पता चला कि नहीं एक सांसद को सेंट्रल स्कूल में नामंकन कराने के लिए कोटा है. सही रूप में आप पूछें तो किसी भी तरह के सांसदों के ऐसे कोटे या विशेषाधिकारों के खिलाफ हूं. एक सांसद को प्राथमिकता के आधार पर किसी को टेलीफोन या गैस देने-दिलाने की बात पहले हुआ करती थी. बजाज स्कूटर या और भी कई चीजों के आबंटन के विशेषाधिकार होते थे. निजी दृष्टि में ये चीजें गलत हैं. पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी, क्यों सांसद-मंत्री बांटे? हमारे समाज में स्पष्ट नीति होनी चाहिए, ताकि गैस हो, टेलीफोन हो, गाड़ी या स्कूटर हो … ये सब चीजें उस नीति के तहत लोगों तक पहुंचे. नीतियां बनाने का काम जरूर राजनीति के हाथ है. पर अपने हाथ में विशेषाधिकार रखना, तो एक गैर बराबरी वाले समाज को जन्म देना है. पर भारत के शासक या राजनेता, चाहे वह किसी पंथ या विचारधारा के रहे हों, पिछले साठ वर्षों में, अपने अधिकार कम करने की ओर कम उन्मुख हुए. गांधी के सपनों के तहत. अभी यह यात्रा पूरी होनी बाकी है. यह सही है कि अब टेलीफोन या गैस देने का वह विशेषाधिकार नहीं रहा, क्योंकि बाजार में यह प्रचुरता से उपलब्ध होने लगा है. अब ऐसी चीजें आप देने भी जायें, तो कोई लेनेवाला नहीं मिलेगा? इसलिए जो चीजें हम सबको दे सकते हैं, उनके लिए नियम या नीति बनाकर हमें चलना चाहिए. सांसद होने की वजह से या ताकतवर राजनीतिज्ञ होने की वहज से कोई किसी मनपसंद या खास का भला करे, व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए. फिर भी जब यह अधिकार था, तो इस अधिकार के तहत उस चपरासी के एक बेटे को एडमिशन के लिए रिकमेंड किया. मेरे गांव के एक अध्यापक हुआ करते थे. वह थे, तो किसी और जगह के. बाद में उनकी हत्या हो गयी थी, उनके बेटे के बेटे यानी पौत्र को, जो कक्षा चार में होगा, पढ़ने में अच्छा था, लेकिन गांव में पढ़ रहा था, उसे चुना. गुरुऋण. तीसरा एक मेरे परिचित व्यक्ति के ड्राइवर के बेटे को, जिसे बड़ी इच्छा थी कि वह कहीं अच्छा स्कूल में पढ़े, उसका दाखिला कराया. हालांकि उस ड्राइवर से मेरा निजी परिचय या मिलन नहीं हुआ है. एक पार्टी कार्यकर्ता, जो पार्टी में बहुत दिनों से काम कर रहे हैं, उन्होंने एप्रोच किया. सीतामढ़ी के एक गांव के एक किसान परिवार के बच्चे को करवाया. इस तरह ऐसे लोगों के बच्चों के बीच अपना एक-एक कोटा बांट दिया. इसके लिए संबंधित कार्यालयों को लिखा. लिखने के बाद भी मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि क्या हम कोई ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जहां पूरे देश में एक समान, एक स्तर के स्कूल हों. नीतीश कुमार ने बड़ी पहल की थी, जब वह पहली बार बिहार में, सत्ता में आये थे. समान शिक्षा की नीति. जहां तक मुझे ज्ञात है, पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे इस समिति के अध्यक्ष थे. उन्होंने रिपोर्ट भी तैयार की थी. पर बाद में अनेक राजनीतिक कारणों में उलझने के बाद शायद रिपोर्ट पीछे छूट गयी. पर एक राज्य चाहे भी, तो यह बड़ा कदम नहीं उठा सकता है. यह कदम नयी राजनीति का एजेंडा होना चाहिए. साथ ही यह कदम पूरे देश में एकसाथ उठना चाहिए. ऐसे सारे बुनियादी सवालों से नयी राजनीति शुरू हो, तो शायद संभव है. पर उस नयी राजनीति का माहौल अभी दिखायी नहीं देता. आज की राजनीति सत्ता तक सीमित हो गयी है. राजनीति का मकसद सत्ता पाना है.

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