एक लव जेहाद चाहिए

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ऐसे भयानक प्रेम विरोधी माहौल में, जब अपने कल्पित लव जेहाद के खिलाफ जेहाद छेड़ने वाले डंडा लेकर निकलेंगे तो इसकी सबसे ज्यादा मार उन लड़कियों पर पड़ेगी जो घर की दहलीज लांघ कर निकलने की कोशिश करती हैं. अभी से इन तथाकथित जेहादियों का यह मशविरा शुरू हो गया है कि अपनी बहनों-बेटियों को संभालिए, उन पर नजर रखिए. जाहिर है,  इससे बेकार और बेमकसद भटकने वाले बेरोजगार भाइयों और रिश्तेदारों को एक काम और मकसद मिल गया है जिसे वे अपनी पूरी प्रतिभा के साथ अंजाम देंगे. लड़के पिटेंगे, लड़कियां चोटी पकड़ कर घर पर लाई जाएंगी, अगर नहीं मानेंगी तो उन्हें भूखा रखा जाएगा और इस पर भी नहीं मानेंगी तो ऐसी ‘कुलच्छनियों’ को मार दिया जाएगा.

जाहिर है, लव जेहाद का यह शिगूफा भी एक थकी और चिढ़ी हुई पितृसत्तात्मक व्यवस्था अपने को बचाए रखने की आखिरी कोशिश के तौर पर छोड़ रही है. उसे मालूम है, वह तभी बची रहेगी जब समाज में पहले से चले आ रहे पूर्वाग्रह बचे रहेंगे, सांप्रदायिकता का भूत बचा रहेगा और लड़कियों में अच्छी लड़की बने रहने का डर बचा रहेगा. लेकिन दुर्भाग्य से लगता नहीं कि अब वह व्यवस्था इतिहास का चक्का वापस उलटी तरफ मोड़ पाएगी. देश के हजारों स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ने वाले लाखों-करोड़ों लड़के-लड़कियां अंततः धीरे-धीरे अपने जीवन के फैसले करना सीख रहे हैं. बेशक, उनके बीच भी कई तरह की कट्टरताएं मौजूद हैं, ऊंच-नीच के फर्क भी हैं और अलग-अलग वर्गों का फासला भी है, लेकिन इन सबके बीच एक बात साझा है- अगर उन्हें कोई चीज बदल और जोड़ रही है तो वे किताबों में दिए जाने वाले आदर्शवादी वाक्य नहीं हैं, पिताओं की नसीहतें नहीं हैं, बल्कि वह प्रेम है जो बता रहा है कि सब बराबर हैं और एक जैसे हैं. इस ढंग से सोचें तो हिंदुस्तान को वाकई एक लव जेहाद की जरूरत है- मोहब्बत के ऐसे चलन की, जो कई तरह की बाड़ेबंदियों को अंगूठा दिखा सके और तमाम मुश्किलों के बीच और बावजूद अपना घर बसा सके. निस्संदेह ऐसी दुनिया आज से ज्यादा न्यायप्रिय और इसलिए सुंदर भी होगी.

लेकिन यह बाद का सपना है, ताजा हकीकत और जरूरत यह है कि लव जेहाद के झूठे प्रचार की कलई खोली जाए.

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