‘नामवर सिंह सुविधानुसार आलोचना कर्म करते हैं’

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क्यों इतने सालों बाद भी हिंदी लेखन में यह स्थिति नहीं बन सकी कि पूर्णकालिक लेखक बनकर ही जीवन गुजारा जा सके.
ऐसे लेखक हुए हैं लेकिन उनके अनुभव भी बहुत अच्छे नहीं रहे. हिंदी साहित्य की स्थिति यह है कि पाठक ही नहीं है और जो प्रकाशक हैं, वे लेखक को ब्रांड बनने ही नहीं देना चाहते. प्रकाशक लेखक को बंधुआ मजदूर मानते हैं. वे तो कहते ही हैं कि लेखक की वजह से किताब नहीं बिकती. इसलिए वे लेखक को भाव देने की बजाय रात के अंधेरे में लिफाफा और बुके लेकर साहब लोगों से मिलने पहुंचते हैं. लेकिन यह स्थिति अब ज्यादा दिनों तक नहीं रहने वाली. प्रकाशकों का वर्चस्व टूटेगा और लेखक पाठकों तक अपनी रचनाएं पहुंचाने के लिए दूसरे माध्यम की तलाश कर लेगा.

लेकिन प्रकाशकों की एक शिकायत सही भी तो है कि हिंदी समाज में साहित्य पढ़ने को लेकर उस तरह की परंपरा भी नहीं है. ऐसा क्यों, जबकि हिंदी इलाके की आबादी बड़ी है, समृद्धि भी अब कोई कम नहीं.
इस परंपरा अथवा संस्कृति के अभाव की शुरुआत किताबों की अनुपलब्धता से ही हुई. हम 1963-64 में गांव में ही थे, आठवीं क्लास के छात्र थे. तब हर गांव में छोटी-बड़ी लाइब्रेरी हुआ करती थी. हम उस समय गांव में ही धर्मयुग से लेकर नवनीत जैसी पत्रिकाएं पढ़ते थे. हमारे पुरखे यह काम करते थे. वे किताबों का महत्व समझते थे लेकिन हमारी पीढ़ी ने उस दायित्व से मुंह मोड़ लिया. हम दूसरे की बात क्यों करें, मैं भी अपने बच्चे को अधिक से अधिक दो-तीन बार किताब खरीदकर दिया हूं, इससे ज्यादा नहीं जबकि हमारी जिम्मेदारी बनती है कि बाहर जा रहे हैं तो किताबें लाकर दें. जब पूरे संस्कार में ही दरिद्रता आ गई तो ऐसा माहौल तो बनेगा ही.

इतने विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में भी तो हिंदी की पढ़ाई हो रही है, लाखों बच्चे पढ़ रहे हैं हिंदी साहित्य, फिर भी हिंदी साहित्य इतनी दरिद्रता में क्यों है?
वहां जो पढ़ाते हैं, उन्हें ही नहीं पता कि क्या लिखा जा रहा है. कौन सी रचनाएं आ रही हैं. वे अपने छात्र-छात्राओं से, हम जैसे लेखकों से पूछते हैं कि इधर कौन सी रचनाएं आई हैं. उन्हें खुद पूछने में भी शर्म आती है. जो शिक्षक हैं, उनकी जांच कर लीजिए, वे खुद शुद्ध हिंदी तक नहीं लिख सकते, वही पढ़ा रहे हैं. मैंने तो जांच की है.

हिंदी पर एक आरोप यह भी है कि जिन बोलियों ने हिंदी को मजबूत किया, बाद में हिंदी ने उन्हीं के रचना संसार को ही हाशिए पर डाल दिया.
अपने यहां बोलियों को लेकर एक अजीब सी भावना भी तो रही है. रेणु ने जब मैला आंचल लिखा तो उस समय के महान आलोचक रामविलास शर्मा ने कह दिया कि रेणु तो भाषा को ही भ्रष्ट कर रहे हैं. अब रामविलास शर्मा ने उस समय ऐसा कहा होगा तो क्या रेणु को दुख नहीं हुआ होगा. कई वजहें रही होंगी रामविलास शर्मा द्वारा ऐसा कहने के पीछे. हो सकता है वे रेणु को दबाना चाहते हों, अपने फंदे के नीचे रखना चाहते हों.

रामविलास शर्मा की बात कही आपने. अब तो हिंदी में यह बात भी कही जा रही है कि जिस तरह का आलोचना कर्म चल रहा है, उसमें आलोचक की जरूरत ही क्या है?
आलोचक की जरूरत हमेशा रहेगी लेकिन आलोचक यदि अपना काम सही तरीके से करे तब. जो कठिन कृतित्व है, उसकी सहज व्याख्या कर पाठकों को समझाए लेकिन आलोचक तो लकड़हारे की भूमिका में आ गए हैं, माली बने ही नहीं रहना चाहते. वे गॉडफादर बनना चाहते हैं. यह आज की बात नहीं है. रामविलास शर्मा की ही बात कीजिए. वे जितनी भाषाएं जानते थे, उतने से ही सबको नापते थे. मैं तो बार-बार सोचता हूं कि कैसे उन्होंने रेणु की रचना पर कह दिया होगा कि वे तो भाषा भ्रष्ट कर रहे हैं. रामविलास जी आंखों पर कौन सा चश्मा लगाते थे. हिंदी में कोई अभी है क्या ऐसा जो रेणु की तरह लिख दे. मैला आंचल में जितनी बातें उन्होंने हर अध्याय में, चार-चार पन्ने में लिख दी हैं, उतनी ही बातें लिखने के लिए आज के लेखकों को चौदह पन्ने चाहिए. कुछ माह पहले नामवर जी बोलने आए. कथाकार संजीव पर पाखी का एक अंक निकला था. नामवर जी आए तो कहने लगे कि वे माफी चाहते हैं और उन्हें अफसोस है कि उन्होंने संजीव को पढ़ा ही नहीं. संजीव चार दशक से लिख रहे हैं और चार दशक से नामवर जी भी कहानी आलोचना के शीर्षस्थ बने हुए हैं. उन्होंने क्यों जरूरत नहीं समझी संजीव जैसे कथाकार की कहानी पढ़ने की. उस पर लिखने और बोलने की तो बात ही दूर. और अब कह रहे हैं कि अफसोस है. दरअसल किसी को नहीं पढ़ने की भी वजह होती है. जिसकी चार कहानियां छपती हैं, उसको तो वह पढ़ लेते हैं, उस पर लिखते भी हैं, बोलते भी हैं लेकिन जिसने 200 कहानियां लिखी, उसको एक बार पढ़ते तक नहीं. नामवर सिंह सुविधानुसार आलोचना कर्म करते हैं. ऐसी वजहों से ही आलोचकों की साख खत्म हो गई है.

इस समय देश के सामने सबसे बड़ा संकट क्या है?
देश के सामने यही संकट है कि जो बौद्धिक हैं, वे अपनी भूमिका नहीं निभा रहे. वे सिर्फ चिल्लाते रहते हैं कि बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, झांसे में नहीं आना है और एक-एक कर उसमें फंसते भी जाते हैं. फंसने के बाद भी चिल्लाते रहते हैं वही राग. कभी अध्यक्ष का पद लेकर फंसते हैं, कभी वीसी बनकर फंसते हैं. जिन्हें समाज को राह दिखानी चाहिए, वे ही जाल में फंसकर चिल्ला रहे हैं, उनका कितना असर होगा. राजनीति में वाम दलों से अपेक्षा की जाती है लेकिन वे भी बार-बार सत्ता के फेर में शासक दलों का साथ देते हैं और हर बार कहते हैं कि अब नहीं. जब इन दोनों वर्गों की हालत यह है तो देश में दूसरे की क्या स्थिति होगी, समझ सकते हैं.

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