मुर्गा लड़ाई से अवैध कमाई

सुनकर बड़ी हैरत होती है कि आखिर एक मुर्गे के लिए इतनी बड़ी रकम कौन लगाता होगा और क्यों. जवाब तलाशने के लिए हम रांची के आस पास के इलाके में होने वाले मुर्गा लड़ाई में पहुंचते हैं. लड़ाई का दिन तय है. सोमवार और शुक्रवार को अनीटोला, बुधवार और गुरुवार को कटहल मोड़, शनिवार को रातू बगीचा… यहां और कई जानकारियां मिलती हैं. ओरमांझी के कुच्चू गांव के रहने वाले मनराज बताते हैं,  ‘मुर्गे के पैरों में जो अंग्रेजी के यू आकार का हथियार देख रही हैं, उसे चाकू-तलवार नहीं कत्थी कहा जाता है और उसे हर कोई भी नहीं बांध सकता. उसे बांधने की भी एक कला है. जो बांधना जानते हैं उन्हें कातकीर कहा जाता है. एक कातकीर एक मुर्गे के पैर में कत्थी बांधने का तीन सौ रुपये लेता है और अगर वह मुर्गा जीत गया तो दो सौ रुपये ऊपर  से भी उसे मिल जाते हैं.’ मनराज के मुताबिक कत्थी भी कई तरह की होती है.

वे बताते हैं, ‘बांकी, बांकड़ी, सुल्फी, छुरिया चार तरह के हथियारों का इस्तेमाल मुर्गे के पांव में बांधने के लिए होता है, जिसमें बांकड़ी सबसे खतरनाक होती है. ये सब ठोस इस्पात के बने होते हैं, जिसे बनाने वाले कारीगर भी अलग होते हैं. अलग-अलग नामों वाले हथियारों का इस्तेमाल भी अलग-अलग मौके के हिसाब से किया जाता है. यानी खतरनाक तरीके से लड़ना है तो खतरनाक हथियार, सामान्य से लड़ना है तो सामान्य हथियार.’
यह जानकारी भी मिलती है कि यह खेल पूरे झारखंड में खेला जाता है. कटहल मोड़ पर मुर्गा लड़ाने वाले विजय बताते हैं कि यह खेल पहले राजा-महाराजाओं के सौजन्य से लगने वाले हाट-मेले में होता था जहां गांव के

आदिवासी लोग अपने-अपने मुर्गे को लेकर पहुंचते थे और फिर मनोरंजन के लिए ग्रामीण पसंद के मुर्गे पर कभी-कभार कुछ बोली भी लगा देते थे. लेकिन अधिकांशतः बार बाजी सिर्फ मुर्गे की जीत-हार पर लगती थी. यानी जो मुर्गा हार जाएगा उस मुर्गे को जीतने वाले मुर्गे का मालिक लेकर चला जाएगा. अब उसकी मर्जी पर है कि वह उस मुर्गे को पाले-पोसे या फिर खा जाए.

मुर्गा लड़ाई में दिलचस्पी रखने वाले विजय टेटे हमें इस लड़ाई के आर्थिक समीकरण समझाने की कोशिश करते हैं. विजय कहते हैं, ‘गांव से तो मुर्गा पालने वाले अब भी मुर्गा लड़ाई के दौरान अपने-अपने मुर्गे को लेकर आते हैं लेकिन मैदान में पहुंचने के पहले ही उस पर सट्टेबाजों का कब्जा हो जाता है. जिसके पास हाजरा मुर्गा (मुर्गे का एक प्रकार) होता है, उसके पीछे सट्टेबाज सबसे ज्यादा चलते हैं.’ टेटे आगे कहते हैं, ‘पहले हो सकता है यह खेल मनोरंजन के लिए होता होगा और घंटे-दो घंटे में सब समाप्त हो जाता होगा लेकिन अब तो सिर्फ रांची में ही हर रोज किसी न किसी इलाके में यह खेल होता है और एक-एक दिन में 40-50 लड़ाइयां हो जाती हैं. एक लड़ाई पर 20-25 हजार से लेकर लाख-दो लाख तक की बोली लगती है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ सट्टेबाज ही इसमें कमाई करते हैं.

सट्टेबाज तो खैर लाखों में खेलते हैं लेकिन मुर्गा लड़ाई का यह खेल एक धंधे की तरह होता है. आप सोचिए कि एक बार हथियार बांधने वाला कम से कम 300 रुपये लेता है. अगर उसने दिन भर में 20-30 के हथियार भी बांध दिए तो पांच-छह हजार तो उसकी जेब में आ ही जाते हैं.’ इसी तरह मुर्गों के डॉक्टर अलग होते हैं, जो मौके पर इलाज भी करते हैं. उनकी कमाई भी अलग होती है और गांव के जो लोग अपने घरों में मुर्गा पालते हैं उनकी आमदनी भी अब इतनी होने लगी है कि वे घर बना लें, गाड़ी खरीद लें. कई मुर्गेबाज अब इस स्थिति में दिखते हैं. मुर्गे के खेल का समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र कम लोग समझाते हैं, उसके अर्थशास्त्र को समझाने वाले बहुतेरे मिलते हैं. बहरहाल, हमें उसका एक अपराधशास्त्र भी दिखाई पड़ता है.

प्राय: जहां मुर्गा लड़ाई का खेल होता है वहां दारू के अड्डे भी चोरी-छिपे चलाए जाते हैं और मटके का खेल यानी लोकल लॉटरी (जुआ) भी जमकर होता है. मशहूर पत्रकार पी साईनाथ अपनी पुस्तक तीसरी फसल में मलकानगिरी की मुर्गे की लड़ाई पर लिखते हैं, ‘जब से हथियारों का इस्तेमाल मुर्गे के पैर में होने लगा है, तब से यह परंपरागत खेल खतरनाक हो गया है और पहले जो खेल आनंद के लिए घंटों चलता था, वह चंद मिनटों में खत्म हो जाता है, क्योंकि इतनी ही देर में बिजली की तरह झपटकर एक-दूसरे पर वार करने वाले दो मुर्गों में से कोई एक घायल हो जाता है.’

साफ है कि हथियारों का चलन भी सट्टेबाजों ने ही बढ़ाया होगा क्योंकि मुर्गे हथियार से लड़ेंगे तो खेल जल्द खत्म होगा. अगर एक खेल जल्द खत्म होगा तब तो दूसरे, तीसरे, चौथे… यानी एक दिन में 40-50 लड़ाइयों की गुंजाइश बनेगी. और जितनी ज्यादा लड़ाइयां, उतना ही ज्यादा दांव पर लगने वाला पैसा.

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