‘मेरी अच्छी किताब को साहित्य अकादमी मिला ही नहीं’

दुनिया सुलूक करती है हलवाई की तरह, तुम भी उतारे जाओगे बालाई की तरह या मोहब्बत को ज़बरदस्ती तो लादा जा नहीं सकता कहीं खिड़की से मेरी जान अल्मारी निकलती है…इस तरह के आपके कई शेर हैं जिनकी तरकीबें, लफ्ज़ियात, काफिया-रदीफ और लबो-लहजा आलोचकों को सख़्त नागवार गुज़रता है, उनके मुताबिक़ ये शेर हैं ही नहीं, क्योंकि ये ग़ज़ल के मिज़ाज से मेल नहीं खाते. इन शेरों पर आप क्या कहेंगे ?
बने बनाए रास्तों पर तो हम कभी नहीं चले. हम ग़ज़ल में नई राह निकालते हैं. यही नयापन हमारी पहचान है. मीर ने अपने शेरों में ‘लौंडा’ लफ्ज़ का इस्तेमाल किया है, ग़ालिब ने अपने शेर में ‘बलगमी’ लफ्ज़ इस्तेमाल किया है, उनसे पूछिए कि क्या ये ‘बलगम’ और ‘लौंडा’ ग़ज़ल  में अच्छा लगता है, और तो और यगाना चंगेज़ी ने अपने बहुत से शेरों में ऐसे लफ्ज़ इस्तेमाल किए जो उस वक्त तक ग़ज़ल के लिए अछूत समझे जाते थे. लखनऊवालों ने उनके ख़िलाफ़ हंगामा कर दिया था. ये लोग नयेपन और बदलाव को स्वीकार करना नहीं जानते. जिस पारंपरिक ग़ज़ल की वो बात कर रहे हैं उसके शेर आप घरवालों के सामने नहीं पढ़ सकते थे- दुपट्टे को आगे से दोहरा न ओढ़ो, नमूदार चीज़ें छुपाने से हासिल. अगर इस परंपरा को तोड़ा न गया होता तो ग़ज़ल दरबारों और कोठों में ही रहती. आम लोगों तक कभी नहीं पहुंचती. उसमें मां की ममता कभी नज़र नहीं आती. मेरी शाइरी आम आदमी की शाइरी है. उसमें मां दिखाई देती है, बहन दिखाई देती है, बच्चे दिखाई देते हैं. गांव और कस्बा दिखाई देता है, घर दिखाई देता है, गरीब की ज़िंदगी दिखाई देती है. प्रो. वारिस अल्वी ने लिखा है कि मुनव्वर राना की शाइरी पढ़ते हुए मुझे धान के खेतों की हमवारी का अहसास होता है.

आपकी मां से जुड़ी शाइरी पर भी एक सवाल है, हमारी अहलिया तो आ गईं मां छूट गई आख़िर, कि हम पीतल उठा लाएं हैं सोना छोड़ आए हैं. क्या किसी हद तक ये सामंती और पितृसत्तात्मक सोच से उपजा शेर नहीं है ? क्या मां को ग्लोरीफाई करने के चक्कर में आपने बीवी की भूमिका के साथ अन्याय नहीं किया है ?
ये एक ऐसा आदमी कह रहा है जो बंटवारे में अपनी बीवी को तो ले आया, लेकिन मां उधर छोड़ आया है. सरहद पार उसकी मां बहुत मुश्किलों में है और फिर एक दिन मर जाती है, तो उस बेटे पर क्या गुज़रेगी. बंटवारे के आदमी की कैफियत को, उसके रंज और अफसोस को, दूर बैठकर इतने सपाट तरीके से नहीं समझा जा सकता. और फिर इसमें बीवी के साथ अन्याय किया गया है, उसे कमतर बताया गया है ऐसा वही लोग कह सकते ह,ैं जो सोचते हैं कि बीवी कभी मां नहीं बनेगी. सच ये है कि मां पर मंैने जो शाइरी की है, उसे उर्दू अदब को मेरे योगदान के रूप में लोग हमेशा याद रखेगें.

मजमे की डिमांड पर तो हमने कभी शेर नहीं कहे. कहा वही जो खुद महसूस किया. ऐसा वो करते हैं जिनके लिए मुशायरा पैसा कमाने का ज़रिया होता है

पुराने लोग कहते हैं कि मुनव्वर राना को मुशायरों ने बिगाड़ दिया. देखा भी गया है कि मुशायरों में जानेवाले शायर मजमे की डिमांड के मुताबिक शेर करने लगते हैं, चाहे वो डिमांड कितनी ही छिछली क्यों न हो, इससे शाइरी का स्तर गिरता है. इस पर आप क्या कहेंगे ?
मजमे की डिमांड पर तो हमने कभी शेर नहीं कहे. कहा वही जो खुद महसूस किया. डिमांड पर सप्लाई वो लोग करते हैं जिनके लिए मुशायरा पैसा कमाने का ज़रिया होता है, जिनका घर मुशायरे की पेमेंट से चलता है. उन्हंे डर होता है कि वो अगर मजमे की डिमांड पूरी नहीं करेंग, तो अगले मुशायरे में बुलाए नहीं जाएंगे. हमारा अपना ट्रांसपोर्ट का बिजनेस है जिसका सालाना टर्नओवर करोड़ों में है. हम पैसा कमाने के लिए मुशायरे नहीं पढ़ते. हम जितने मुशायरे पढ़ते हैं उससे कहीं ज़्यादा पढ़ने से इंकार कर देते हैं.

इमरान प्रतापगढ़ी जैसे शायर मुशायरों में अकबरूद्दीन ओवैसी और मुख़्तार अंसारी जैसे लोगों की तारीफ़ कर रहे हैं, और लगातार लोकप्रिय हो रहे हैं, इसे आप कैसे देखते हैं ? इमरान कहते हैं कि आपके दौर में भी यही सब होता था…
सबसे पहले तो ये हमारे प्रशासन के कमज़ोर होने की निशानी है. एक आदमी खुलेआम, चौराहे पर, हज़ारों लोगों के सामने ऐसी शाइरी पढ़ रहा है और आपको इसके ख़तरे का अंदाज़ा नहीं है. प्रशासन अगर एक बार सख्ती कर दे और ऐसे लोगों को डिटेन करवा दे तो ऐसी शाइरी खत्म हो जाएगी. ये शाइरी नुकसान पहुंचा रही है. इस तरह की शाइरी से सबसे बड़ा नुकसान तो मुशायरों का ही हुआ. मुशायरों में गैर-मुस्लिमों और सेक्यूलर शरीफ़ मुसलमानों ने जाना छोड़ दिया. शाइरी का काम जोड़ना होता है, तोड़ना नहीं. हमने कभी तोड़नेवाली शाइरी नहीं की. इनके पसंद करने वाले और हमको पसंद करने वाले अलग-अलग हैं. मेरे प्रशंसकों में मुसलमानों से बहुत ज़्यादा गैर-मुस्लिम लोग हैं. सिर्फ मुसलमान प्रशंसक वाणी प्रकाशन से नागरी में छपी मेरी किताब ‘मां’ की एक लाख प्रतियां नहीं बिकवा सकते.

आख़िरी सवाल, आपने भी बहुत से राजनीतिक लोगों पर प्रशंसापूर्ण लेख और नज़्में लिखी हैं, किताबें भी समर्पित की हैं। इसे चापलूसी क्यों न माना जाए?
अगर किसी पर मैने कोई नज़्म लिखने के बाद उससे बदले में कोई लाभ लिया हो, तो आप भरी सड़क पर मेरा गिरेबान पकड़कर मुझे चापलूस कह सकते हैं. मैं रायबरेली का रहने वाला हूं. सोनिया गांधी हमारी सांसद हैं, मैंने उनपर नज़्म कही है, क्योंकि मैं उनसे प्रभावित हुआ था. मैं आज तक उनसे मिलने नहीं गया. अगर मैं उनसे मिलने चला जाता तो मुमकिन है कि ये अवॉर्ड मुझे आज से 10 साल पहले मिल जाता. दूसरे भी लोग जिनपर मैने नज़्में कहीं हैं या समर्पण किए हैं वो मेरे दोस्त या शुभचिंतक हैं. वो मेरी बीमारी में अस्पताल में मेरे साथ खड़े रहे हैं. अगर मैं उनको किताब नहीं समर्पित करूंगा तो क्या अपने दुश्मनों को समर्पित करूंगा.

5 COMMENTS

  1. तहलका पहले अपने खोयी प्रमाणिकता को तो हासिल करे।। सच को सच कहना ही इमरान की शायरी है…..

  2. तहलका पहले अपने खोयी प्रमाणिकता को तो हासिल करे।। सच को सच कहना ही इमरान प्रतापगढ़ई की शायरी है…..

  3. बहुत अच्छा राना साहब वेलडन !!

    सेकेंड लास्ट क्यूस्चन और उसके जबाब पर मुझे आपत्ती हैं! मैं उससे सहमत नहीं हूँ… इमरान बहुत अच्छा शायर हैं
    अगर पूरा जबाब राना साहब का ही है उसमे कोई मिलावट नहीं है तो राना साहब से नाराज हूँ… और अगर उसमे कुछ मिलावट की गई हैं हाईलाइट में रहने के लिये… तो यह साहित्य और खुद तहलका के लिये सही नहीं है!.. तहलका पर प्रतिबंध लगना चाहिये!!
    मैं आपनी आपत्ती अपने एक दोहे के माध्यम से दर्ज करता हूँ!

    अगर चर्चित होना है तो करो कुछ बवाल।
    कुछ मशहूर लोगों पर उठा दो तुम सवाल।।

    अमन चाँदपुरी
    09721869421
    [email protected]

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