‘हिंदी साहित्यिक समाज, भय और लालच से संचालित होता है’

आपके उपन्यास  ‘कठगुलाब’  में जितने भी प्रमुख पुरुष पात्र हैं, सभी स्त्रियों के प्रति लोलुप और यौन हिंसा करने वाले  हैं. क्या सभी पुरुष ऐसे ही होते हैं? कोई अच्छा नहीं होता?
सभी नहीं पर अधिकांश पुरुष ऐसे ही होते हैं. किंतु आप देखिए कि उस उपन्यास में बिपिन नाम का पुरुष पात्र भी है. बिपिन एक तरह से सभी बुरे पुरुष पात्रों का  जवाब है. उसमें अर्द्ध  नारीश्वर का तत्व है. उसमें पुरुष और स्त्री दोनों की संवेदनाओं का मिश्रण है. अगर पुरुष बिपिन की तरह होने की कोशिश करें तो स्त्रियों को कोई समस्या नहीं होगी. मारियन का पिता भी एक उदात्त चरित्र है.

‘मेरे साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह में कोई स्त्री रचनाकार नहीं आईं. यहां तक कि मुझे बधाई देने या मेरे घर चाय पीने तक भी कोई नहीं आया’

 इस उपन्यास में असीमा सर्वाधिक विरोधी पात्र है. शुरू में अन्य स्त्री पात्रों की तुलना में उसकी स्थिति ठीक है. किंतु अंत में वह एक असफल पात्र में तब्दील हो जाती है. क्या आपकी नजर में पितृसत्ता से समझौता किए बिना स्त्री का कोई भविष्य नहीं है?
देखिए, असीमा ने कुछ भी बदलने की कोशिश नहीं की बल्कि अपने अंदर की संवेदनाओं को मारने का प्रयास किया. जो भी प्रकृति के विरुद्ध चलेगा वह हारेगा ही. इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है. रास्ता किसी तरह के अतिवाद में नहीं है बल्कि वह नकार और स्वीकार के बीच से है. पुरुष के नकार से कोई समाधान नहीं निकलेगा. कहीं न कहीं सामंजस्य तो आवश्यक है. यह समझौता नहीं है बल्कि जीवन के लिए अनिवार्यता है. जिसे आप समझौता कहते हैं उसे मैं जीवन कहती हूं. समाधान स्त्री-पुरुष मिलकर ही कर सकते हैं, विरोध या मुकाबले से नहीं.

आप स्त्री मन और पुरुष मन जैसी किसी चीज को नहीं मानती हैं. इसी कारण लेखन के क्षेत्र में स्त्री-पुरुष विभाजन को भी अस्वीकार करती हैं?
मैं स्त्री का अनुभव, स्त्री दृष्टि आदि जैसी किसी चीज को नहीं मानती हूं. इसके बरक्स मैं लेखकीय अनुभव और लेखकीय दृष्टि को महत्व देती हूं. मेरा स्पष्ट मानना है कि स्त्री-पुरुष का विभाजन सिर्फ जैविक विभाजन है और स्त्री-पुरुष के बीच अंतर भी सिर्फ जैविक है, बाकी जो अंतर दिखता है वह संस्कारगत है जिसे खत्म किया जा सकता है. इसलिए मैं कहती हूं कि रचनाकार सिर्फ रचनाकार होता है उसे स्त्री और पुरुष में विभाजित करना ठीक नहीं है. रही बात अनुभव की तो प्रत्येक के अनुभव की एक सीमा होती है. बहुतों को बहुत सारे अनुभव नहीं होते. कोई भी लेखक हर विषय पर नहीं लिख सकता. दूसरी बात यह है कि केवल अनुभव होने मात्र से न तो कोई लेखक बन सकता और न ही कोई रचना लिखी जा सकती है. एक और बात समझने की है कि रचनाकार के लिए परकाया प्रवेश अति आवश्यक है. वही रचनाकार महान होता है जो अपनी संवेदना का अधिक से अधिक विस्तार कर पाता है. मेरा मानना है कि असल सवाल जेंडर का नहीं, संवेदनशीलता का है, परकाया प्रवेश का है, रचनात्मकता का है और अहं के विसर्जन का है.

आपका कहना है कि आत्मकथा लिखने की जरूरत उनको पड़ती है जो रचना में अपने आत्म को खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं. इसी कारण आपने स्वयं आत्मकथा लिखने से इंकार किया है. तो क्या आपके लेखन को विशुद्ध आत्मकथात्मक माना जाए?
मैंने लेखन में अपने आत्म को खुलकार अभिव्यक्त किया है. उसमें मेरी आकांक्षाओं और सपनों की अभिव्यक्ति है. उसमें मेरी जीवन की घटनाएं नहीं हैं. दरअसल, मैंने अनेक रचनाकारों की आत्मकथाएं पढ़ी हैं. वे मुझे निहायत उबाऊ लगीं. मुझे एक लेखक के लिए आत्मकथा लिखने का कोई तर्क समझ में नहीं आता है. लेखक का जो अनुभूत होता है, उसे वह रचनात्मक रूप देता है. जिन्हें लगता है कि उन्होंने नहीं दिया है, उन्हें लिखना चाहिए. इसी संदर्भ में मैं कहना चाहूंगी कि दलित आत्मकथाओं की बात दूसरी है. अधिकांश दलित रचनाकारों ने पहले-पहल आत्मकथा ही लिखी है. वह उनके लिए एक तरह से उपन्यास कहानी लिखने की पूर्व तैयारी की तरह है. पर, बीस-तीस साल लिख चुकने के बाद कोई आत्मकथा लिखता है तो समझ से परे है.

आपको हमेशा शिकायत रही कि आपका मूल्यांकन ठीक से नहीं हुआ. क्या कारण मानती हैं आप?
मनोहर श्याम जोशी ने मुझसे कहा था कि तुम्हारा कभी ठीक से मूल्यांकन नहीं हो सकता, क्योंकि तुम न तो किसी का कुछ बुरा कर सकती हो और न भला. मुझे यह बात सौ फीसदी सच लगती है. हिंदी का साहित्यिक समाज भय और लालच, मुख्यतः दो ही चीजों से संचालित होता है.

3 COMMENTS

  1. मनोहर श्याम जोशी ने मुझसे कहा था कि तुम्हारा कभी ठीक से मूल्यांकन नहीं हो सकता, क्योंकि तुम न तो किसी का कुछ बुरा कर सकती हो और न भला. मुझे यह बात सौ फीसदी सच लगती है. हिंदी का साहित्यिक समाज भय और लालच, मुख्यतः दो ही चीजों से संचालित होता है.

    यही होता है जो किसी का बुरा कर सकें न भला बेशक भला फिर भी कर दें मगर जो किसी का बुरा नहीं कर सकते उनका एक तरह से ये समाज बहिष्कार सा कर देता है और जो चटपटी बातों से अपनी वाक क्रिया द्वारा फ़ंसा लेता है वो ही सबके सिर चढता है । ये साहित्य जगह का दुर्भाग्य है ।

  2. hindi ka sahityik samaj jativad aur rajnaitik khemebazi se bhi sanchalit hota hai.sahitya men kavi/lekhak kitni bhi pragatisheel aur adhunik vichar bodh ko vyakt karte hon lekin apne vyaktigat jeevan aur gatividhiyon men ek aam bhartiya ki tarah hi sankeerna aachran karte hain. hum log aise hi hote hain.

  3. मैंने आत्मकथा लिखी, ‘कहाँ शुरू कहाँ खत्म’ (प्रकाशक : http://www.diamondbook.in इसी वर्ष प्रकाशित हुई है। चूंकि मैं सामान्य मनुष्य हूँ, साहित्यकार होने की ख्याति नहीं है, इसलिए मुझे इसे लिखने में कोई असुविधा नहीं हुई और इसे पाठकों को दे पाने का अपूर्व सुख मिला। आत्मकथा लिखना या नहीं लिखना, पहले लिखना या बाद में लिखना > यह चर्चा कितनी ज़रूरी है, यह मेरे समझ नहीं आता, हाँ, यह समझ में आया कि जिसे लिखने में आनंदानुभूति हो और वह रचना पाठक को पढ़ने में रोचक और उपयोगी लगे तो लेखन सार्थक हो जाता है। आखिर, कहानी हो या उपन्यास > वह कहानी ही है, अपनी या किसी परिचित की।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here