मध्ययुगीनप्रदेश

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दरअसल यह केवल गाडरवारा तहसील का मसला नहीं है. मध्य प्रदेश में जातिगत भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी है इसका अंदाजा 2010 में मुरैना जिले के मलीकपुर गांव में हुई एक घटना से लगाया जा सकता है. वहां एक दलित महिला ने सवर्ण जाति के व्यक्ति के कुत्ते को रोटी खिला दी, जिस पर कुत्ते के मालिक ने पंचायत में कहा कि एक दलित द्वारा रोटी खिलाए जाने के कारण उसका कुत्ता अपवित्र हो गया है और गांव की पंचायत ने दलित महिला कोे इस ‘जुर्म’ के लिए 15000 रुपये के दंड का फरमान सुनाया. इन उत्पीड़नों के कई रूप हैं, जैसे नाई द्वारा बाल काटने से मना कर देना, चाय के दुकानदार द्वारा चाय देने से पहले जाति पूछना और दलित बताने पर चाय देने से मना कर देना या अलग गिलास में चाय देना, दलित पंच/सरपंच को मारने-पीटने, शादी में दलित दूल्हे के घोड़े पर बैठने पर रास्ता रोकना और मारपीट करना, मरे हुए मवेशियों को जबरदस्ती उठाने को मजबूर करना, मना करने पर सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार कर देना, सावर्जनिक नल से पानी भरने पर रोक लगा देना जैसी घटनाएं उदाहरण मात्र ही हैं जो अब भी यहां के अनुसूचित जाति के लोगों की आम दिनचर्या का हिस्सा हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 15.6 प्रतिशत है. पिछले पांच साल के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2009 से 2012 के बीच दलित उत्पीड़न के दर्ज किए गए मामलों में मध्य प्रदेश का स्थान पांचवां बना रहा है. 2013 में यह एक पायदान ऊपर चढ़कर चौथे स्थान पर पहुंच गया.

डॉ. सूर्यवंशी कहते हैं कि पूरे मध्य प्रदेश में इस तरह की घटनाएं कम होने की बजाय बढ़ रही हैं और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है. वे दावा करते हैं कि राज्य के 99 प्रतिशत गांवों में दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता है, 75 प्रतिशत से अधिक गांवों में दलित सावर्जनिक शमशान घाट में क्रियाकर्म नहीं कर सकते हैं और मजबूरन उन्होंने अलग शमशान घाट बना रखे हैं. 25 प्रतिशत से अधिक गांवों में सावर्जनिक नल या हैंडपंप से दलित समुदाय के लोगों को पानी पीने नहीं दिया जाता, 50 प्रतिशत से अधिक मामलों में मध्याह्न भोजन के समय दलित बच्चों को अलग बैठाकर भोजन कराया जाता है.

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छुआछूत में सबसे आगे

• नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड की तरफ से इसी साल आई एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 27 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में छुआछूत को मानते हैं और इस मामले में मध्य प्रदेश 53 प्रतिशत के साथ देश में पहले नंबर पर है.

• स्थानीय संगठन दलित अधिकार अभियान द्वारा 2014 में जारी रिपोर्ट ‘जीने के अधिकार पर काबिज छुआछूत’ के अनुसार मध्य प्रदेश के 10 जिलों के 30 गांवों में किए गए सर्वेक्षण के दौरान निकल कर आया है कि इन सभी गांवों में लगभग सत्तर प्रकार के छुआछूत का प्रचलन है. इसी तरह केे भेदभाव के कारण लगभग 31 प्रतिशत दलित बच्चे स्कूल में अनुपस्थित रहते हैं.

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आखिर क्या वजह है कि प्रदेश में लगातार इतने बड़े पैमाने पर दलितों के साथ अत्याचार के मामले सामने आ रहे हैं. इसके बावजूद मध्य प्रदेश की राजनीति में दलित उत्पीड़न कोई मुद्दा नहीं बन पा रहा है? इसका जवाब यह है कि प्रदेश के ज्यादातर प्रमुख राजनीतिक दलों के एजेंडे में दलितों के सवाल सिरे से ही गायब हैं. तभी तो मड़गुला की घटना पर बयान देते हुए गाडरवारा से भाजपा विधायक गोविंद पटेल कहते हैं, ‘ऐसे झगड़े तो होते रहते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. पाकिस्तान का भी भारत से झगड़ा चल रहा है. जो घटना हुई है वह किसी भी तरह से जातिवाद की लड़ाई नहीं है.’ अब यह केवल इत्तेफाक तो नहीं हो सकता कि मध्य प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष रामेश्वर नीखरा भी कहते हैं, ‘यह जातीय संघर्ष नहीं है इसे कुछ लोग जबरदस्ती जातीय संघर्ष बना रहे हैं. नरसिंहपुर तो बड़ा समरसता वाला जिला रहा है. वहां तो पहली बार इस तरह की कोई घटना घटी है.’ इन सब पर वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया कहते हैं, ‘हमारा अनुभव यह है कि मध्य प्रदेश में दलितों को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर संवेदनहीनता व्याप्त है और ये लोग दलितों की समस्या को समस्या ही नहीं मानते हैं.’

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इस साल की प्रमुख घटनाएं

• जनवरी में दमोह जिले के अचलपुरा गांव में दबंगों द्वारा दलित समुदाय के लोगों को पीटा गया. इसके बाद प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों की मौजूदगी में 12 दलित परिवार गांव छोड़कर चले गए क्योंकि उन्हें पुलिस और प्रशासन पर अपनी सुरक्षा का भरोसा नहीं था.

• मई में अलीराजपुर जिले के घटवानी गांव के 200 दलितों ने खुलासा किया कि वे एक कुएं से गंदा पानी पीने को मजबूर हैं क्योंकि छुआछूत की वजह से उन्हें गांव के इकलौते सार्वजनिक हैंडपंप से पानी नहीं लेने दिया जाता है, जबकि जानवर वहां से पानी पी सकते हैं.

• 10 मई को रतलाम जिले के नेगरुन गांव में दबंगों ने दलितों की एक बारात पर इसलिए पथराव किया क्योंकि दूल्हा घोड़ी पर सवार था.

इसके बाद बारात को पुलिस सुरक्षा में, दूल्हे को हेलमेट पहनाकर निकलना पड़ा.

• शिवपुरी जिले के कुंअरपुर गांव में इस साल हुए पंचायत चुनाव में एक दलित महिला गांव की उपसरपंच चुनी गई थीं, जिनसे गांव के सरपंच और कुछ दबंगों ने मिलकर मारपीट की और उनके मुंह में गोबर भर दिया.

•13 जून को छतरपुर जिले के गणेशपुरा में दलित समुदाय की एक 11 वर्षीय लड़की हैंडपंप से पानी भरने जा रही थी. इसी दौरान एक दबंग व्यक्ति ने लड़की की पिटाई कर दी क्योंकि उसके खाने पर लड़की की परछाई पड़ गई थी.

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