संस्थाओं को नष्ट कर रही मोदी सरकार

इन मसलों पर हम और कुछ नहीं कर सकते थे तो अपने पुरस्कार वापस करके अपना विरोध जताया. साहित्य अकादमी ऐसी संस्था बन गई जो अपने लेखकों पर अत्याचार पर चुप है. उसने इस बारे में कोई निर्णय नहीं किया, वह सरकार को पत्र लिखकर अपना विरोध जता सकती थी. उनसे कोई विरोध प्रदर्शन करने की उम्मीद नहीं करता, लेकिन बोलना तो चाहिए था. अकादमी का अध्यक्ष सामान्य परिषद द्वारा चुना जाता है न कि सरकार नियुक्त करती है. उन पर कोई दबाव भी नहीं होता. मैं जब अकादमी का अध्यक्ष था तो मकबूल फिदा हुसैन के मामले में सरकार को पत्र लिखा था और अपना विरोध दर्ज कराया था.

यह विरोध जारी रहेगा. अभी और लेखक सामने आएंगे. हम एक नवंबर को लेखकीय स्वतंत्रता पर हो रहे प्रहार को लेकर कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों का एक अधिवेशन बुला रहे हैं. हम अपना विरोध जारी रखेंगे.

(लेखक साहित्यकार हैं)

1 COMMENT

  1. मै आपके विचार से सहमत हूँ। नेता के कई चेहरे होते है।

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