माओवादी और काॅरपोरेट ने पिछले 15 सालों में झारखंड को तिजोरी की तरह ही देखा

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मतलब?

मतलब यह कि आॅस्ट्रेलिया में आपने सुना होगा कि क्या हुआ. धीरे-धीरे वहां माइनिंग के काम बंद हो रहे हैं, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मांग घट रही है. वहां अभी 30 हजार कामगार काम से हटाए गए हैं. हमारे आपके हिसाब से यह संख्या ज्यादा नहीं लग सकती लेकिन आॅस्ट्रेलिया के लिए यह काफी है क्योंकि वहां का माइनिंग जाॅब पूरी तरह से तकनीक संचालित है. लोग कम काम करते हैं. खदानों में ट्रक तक बिना ड्राइवर चलते हैं.  झारखंड में भी वही होगा, वह मुझे दिख रहा है. आप सोचिए कि कोयले की डिमांड कम हो गई, जो होना ही है क्योंकि दुनिया के विकसित देश कोयले को ब्लैक लिस्ट में डाल रहे हैं. जो कोयले का कारोबार करते हैं, उन्हें अब यूरोपीय यूनियन से पैसा नहीं मिलता. ऊर्जा के लिए भी सौर से लेकर परमाणु तक के विकल्प पर तेजी से काम चल रहा है. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जब कोयले की मांग कम होगी तो झारखंड पर उसका सीधा असर पड़ेगा. तब धनबाद, हजारीबाग जैसे शहरों की कल्पना कीजिए कि वहां क्या होगा. इसी तरह आयरन ओर की मांग में भी कमी आई है. टाटा कंपनी घाटे में है. अगर टाटा ने अपने दस प्रतिशत कर्मचारियों को भी हटा दिया तो सोचिए कि क्या होगा जमशेदपुर का ? यह अमेरिका का डेट्रायट शहर बन जाएगा. डेट्रायट का हाल तो जानते ही होंगे कि फोर्ड से लेकर तमाम दूसरी बड़ी कार कंपनियां वहां ही थी और वह सबसे गुलजार शहर था लेकिन अब वहां कोई नहीं रहना चाहता. जो हैं, उनके घरों में पानी नहीं. गैस नहीं. ऐसे में झारखंड का हाल और बुरा होगा, क्योंकि राज्य बनने के बाद तो सब कुछ सिर्फ माइनिंग जाॅब के भरोसे ही रह गया. कोई और फैक्ट्री वगैरह तो लगी नहीं. खेती, जो मूल कर्म था, उस पर तो कोई काम नहीं हुआ. लेकिन अफसोस की बात है कि झारखंड के जो साथी हैं, उनके आंदोलन में ये सब मसले अभी शामिल नहीं हैं. राज्य बनने के बाद से झारखंड के भविष्य के लिए जो आंदोलन चलना था, वह चला ही नहीं. सब सत्ता के लिए आंदोलन चलाने में सिमट गए.

झारखंड जैसे राज्य में माओवादी काॅरपोरेट के सिक्योरिटी एजेंट बनकर काम करते रहे हैं और अपना बचाव करने के लिए क्रांति वगैरह का नाम देते रहे हैं. सरकार और काॅरपोरेट, दोनों को यहां माओवादी सूट करते हैं

टाटा के बाद जिंदल और दूसरी कई कंपनियां भी राज्य में आईं. और कई को तो आने नहीं दिया गया यहां?

एक-दो कंपनी के आने से क्या होगा. और यह भी तो देखना होगा कि किस प्रकृति की कंपनी आई. देखिए मार्क्सवाद में एक धारणा है कि जब तक स्थानीय बुर्जुआ नहीं होंगे, तब तक उस इलाके का विकास नहीं होगा. झारखंड में स्थानीय बुर्जुआ ही नहीं रहे. जो बाहरी बुर्जुआ होते हंै, उन्हें आपके विकास से लेना देना नहीं होता. वे सिर्फ अपने लाभ को देखते हैं और पैसे को बाहर भेजते हैं. टाटा को तो हमने देखा है. 1972 के पहले तक टाटा ने झारखंड के लिए क्या किया. वह तो 1972 में टाटा का शताब्दी समारोह था तो टीआरटीसी जैसा एक फंड बनाकर कर्मचारियों के लिए कुछ किया गया, नहीं तो उसके पहले एक अस्पताल था तो उसमें स्थानीय लोगों को इलाज के लिए भर्ती तक नहीं किया जाता था. टाटा हो या कोल इंडिया या कोई और कंपनी, मैं एक की बात नहीं कर रहा. ये बाहरी कंपनियां हैं. झारखंड में किसी का मुख्यालय तक नहीं. सब पैसे बाहर जाते हैं. विकास के नाम पर आजकल ये युवाओं को टूजी, थ्रीजी मोबाइल पकड़वाते हैं. वह भी सोची समझी चाल है. ऐसा करने से आने वाली पीढ़ी उसी की खुमारी में डूबी रहेगी.

झारखंड के साथ ही बने उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में स्थितियां दूसरी रहीं. आप क्या सोचते हैं ?

झारखंड के साथ ही बने छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड की स्थितियों को देखना होगा. दोनों राज्यों के बनने के आधार को और उसके बाद की स्थितियों को भी. सिर्फ झारखंड ही लंबे सामाजिक आंदोलन के बाद राज्य पर बना. छत्तीसगढ़ के लिए तो कोई आंदोलन ही नहीं था और उत्तराखंड के लिए चार-पांच सालों तक सक्रिय आंदोलन चला होगा. राज्य बन जाने के बाद उन दोनों राज्यों के लिए सुखद यह रहा कि वहां स्थानीय बुर्जुआ भी थे, जिन्होंने राज्य का विकास किया. झारखंड में स्थानीय  बुर्जुआ नहीं रहे. जिसका मकसद सिर्फ लूटना होगा, वह विकास कैसे करेगा. झारखंड में लुटेरे ज्यादा रहे.

शुरू में बात हुई कि आदिवासी नेतृत्व रहते हुए भी इन सवालों को नहीं समझा गया.  तो क्या अब माना जाए कि एक गैर आदिवासी को जब राज्य की कमान मिली है तो वो समझेगा ? क्योंकि मुख्यमंत्री भाजपा से हैं और भाजपा राज्य में आदिवासियों की सियासत भी करती रही है.

दो बातें साफ कर दूं. आप जब-जब आदिवासी नेतृत्व और उनकी विफलताओं पर बात करेंगे तब-तब मेरे जैसा आदमी चार बार के राष्ट्रपति शासन में हुए कामों का हिसाब मांगेगा कि अगर आदिवासी नेतृत्व अक्षम था तो केंद्र सरकार को राज्य का विकास कर दिखाना चाहिए था, लेकिन वह नहीं हुआ. रही बात गैर आदिवासी के मुख्यमंत्री बनने की तो इससे मैं सहमत नहीं हूं. यह आगे के लिए और खतरनाक है. एक बार गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बन गया तो अब आगे आदिवासी मुख्यमंत्री बनने में परेशानी ही होगी. यह झारखंड से आदिवासियों को बेदखल करने की दिशा में बढ़ाया गया एक मजबूत कदम है. इसका असर दिखेगा. ब्यूरोक्रेसी और रूलिंग क्लास को आदिवासी पसंद नहीं. झारखंड का दुर्भाग्य है कि यहां जो आदिवासी नेतृत्व है, नेता हैं, आंदोलनकारी हैं, वे बहुत कमजोर हैं या बिखराव के शिकार हैं. रही बात भाजपा और आदिवासियों के रिश्ते की तो अब भ्रम में रहने की जरूरत नहीं. आपने देखा होगा कि कुछ दिनों पहले यहां आरएसएस की राष्ट्रीय बैठक हुई. तब आदिवासियों ने मोहन भागवत के पुतले जलाए थे. सार्वजनिक तौर पर. आप देखिए कि सिंहभूम जैसे इलाके में भाजपा अब जीत नहीं पाती, जो आदिवासियों का गढ़ है. भाजपा से आदिवासियों का तेजी से मोहभंग हुआ है.

झारखंड जैसे राज्य में एक मजबूत धारा तो नक्सलियों की भी रही. पिछले 15 सालों में यह रेडजोन बना रहा. उन्होंने शोषण या लूट रोकने के लिए कुछ सार्थक किया?

आप पहले उन्हें नक्सली मत कहिए. नक्सल आंदोलन से निकले नक्सलियों में तो एक सार्थक भावना थी. उद्देश्य था लेकिन अब तो भाकपा माओवादी हैं और उसके साथ ही सरकार द्वारा पोषित कई संगठन. झारखंड बनने के बाद यहां माओवादी भी काॅरपोरेट की तरह आए. बंगाल, बिहार , आंध्र प्रदेश से,  क्योंकि उनकी नजर भी यहां की तिजोरी पर थी. वे भी काॅरपोरेट की तरह लूटने आए. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि माओवादियों का एक आंदोलन तो दिखता जो आदिवासियों के हित में होता. कहां कोई एमओयू वाले इलाके में माओवादियों ने कुछ किया. आदिवासियों की जमीन न जाए, इसके लिए कभी काम करते हुए माओवादी दिखे ? माओवादी कहते हैं कि मजदूर और किसान के लिए काम करते हैं. मजदूर के लिए पिछले 15 सालों में माओवादियों ने झारखंड में क्या किया ? रही बात किसान की तो झारखंड के किसान आदिवासी नहीं हैं. वे खेती करते हैं. खेती करने वाले और किसान में फर्क होता है. अगर इनकी जमीन बचाने के लिए ही पिछले 15 सालों में माओवादियों ने कुछ किया होता तो एक बात होती. मैं दो साल पहले चाईबासा जेल में बंद था. माओवादी भी साथ थे. उनसे पूछता था कि क्या कर रहे हो. वे ख्वाबों की दुनिया में थे. लांग मार्च करेंगे, दिल्ली पर कब्जा करेंगे. हथियारों के सहारे अपनी सत्ता लाएंगे. अब उन्हें कौन समझाए कि पंजाब, कश्मीर से लेकर श्रीलंका तक में तो हथियारबंद आंदोलन खत्म हो गए, आप क्या कर लोगे. और क्या माओवादी भारतीय सेना जितनी फौज बना लेंगे. झारखंड जैसे राज्य में माओवादी काॅरपोरेट के सिक्योरिटी एजेंट बनकर काम करते रहे हैं और अपना बचाव करने के लिए क्रांति वगैरह का नाम देते रहे हैं. सरकार और काॅरपोरेट, दोनों को यहां माओवादी सूट करते हैं.

आदिवासियों का तेजी से भाजपा से मोहभंग हुआ है, झारखंड के दल दूसरे ही दुष्चक्र में फंस जाते हैं, कांग्रेस ने इतने सालों तक शासन ही किया और वाम दल, जिनके लिए यहां हमेशा संभावना थी, वे 15 सालों में अपनी जमीन नहीं बना सके तो फिर राजनीतिक तौर पर रास्ता कहां दिखता है?

आदिवासियों के लिए भाजपा का विकल्प कांग्रेस तो कभी नहीं हो सकती. भाजपा ने तो कम से आदिवासियों को अपने पाले में करने के लिए या अपनी पार्टी से जोड़ने के लिए अपना रंग-ढंग वेश भी बदला लेकिन कांग्रेस ने तो कभी वह भी नहीं किया. वाम दलों की तो बात ही मत कीजिए. केरल में उनका शासन रहा है, वहां अब आदिवासियों की आबादी सिर्फ चार लाख है. वाम दलों को अब बताना चाहिए कि कहां गए वहां के आदिवासी. वाम दलों को पहले बताना चाहिए कि इतने सालों तक केरल में सत्ता में रहे तो आदिवासियों और उनकी जमीन बचाने के लिए कोई विशेष कानून वगैरह क्यों नहीं बनाया? वाम दलों को आदिवासियों से कोई लेना-देना नहीं. उनके पोलित ब्यूरो या केंद्रीय कमेटी में देखिए, आदिवासी नदारद मिलेंगे. केरल छोिड़ए, बगल के बंगाल में क्या किया वामपंथियों ने. मैं खुद वामपंथी धारा से सरोकार रखता हूं, इसलिए यह बात अधिकार के साथ कह रहा हूं.

15 साल हो गए राज्य बने, झारखंड के लिए क्या रास्ता है ?

रास्ते  बहुत हैं लेकिन फिलहाल यही समझ लें लोग कि झारखंड और आदिवासियों को बचाना, इस देश ही नहीं दुनिया को बचाने जैसा है. देश अमेरिका के पदचिह्नों पर चल रहा है. उस अमेरिका के रास्ते पर जहां पिछले दो माह में सैैकड़ों लोग पुलिस की गोलियों से मारे गए हैं. उस अमेरिका के रास्ते पर जहां हर साल तीन हजार से ज्यादा नौजवान और किशोर आपसी खूनखराबे में मारे जाते हैं. उस अमेरिका के रास्ते, जहां एक डेट्रायट शहर बना तो दिख रहा है लेकिन कई डेट्रायट और भी बनने वाले हैं. जल्द ही वह समय आएगा, जब दुनिया उस माॅडल से तंग आएगी. तब मनुष्यता का बोध होगा. तब मनुष्यता की राह दिखाने के लिए आदिवासियों की जरूरत होगी, जिनका अपना समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, कलाशास्त्र, मनोविज्ञान रहा है. दुनिया तलाशेगी कि आदिवासियों से सीखा जाए कि अभाव में भी कैसे खुश रहा जाता है. धरती, जंगल और  नदी को कैसे बचाया जाता है. समुदाय बोध के साथ कैसे रहा जाता है, यह जाना जाए. लेकिन तब तक आदिवासी बचेंगे नहीं. रूलिंग क्लास, काॅरपोरेट, राजनीतिक पार्टियां, माओवादी, सब मिलकर उन्हें खत्म कर चुके होंगे.

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