‘जब न्याय मिलेगा तभी भाइयों के शव दफनाएंगे’

आदिवासी संगठनों के मुताबिक संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए तीन बिलों- प्रोटेक्शन ऑफ मणिपुर पीपुल बिल, मणिपुर लैंड रेवेन्यू एंड लैंड रिफॉर्म्स (सातवां संशोधन) बिल, (एमएलआर एंड एलआर) मणिपुर शॉप्स एंड इस्टेब्लिशमेंट (द्वितीय संशोधन) बिल पास कर दिए गए. दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्री लैम खान पिअांग के मुताबिक, ‘संविधान के अनुच्छेद 371 सी में वर्णित ‘प्रेसीडेंट मणिपुर विधानसभा आदेश, 1972’ के मुताबिक, जो कानून आदिवासियों की आजीविका और जमीन को प्रभावित करे उसे बनाने से पहले ‘हिल एरिया कमेटी’ (एचएसी) की सहमति लेनी जरूरी है जो सभी आदिवासी विधायकों की आधिकारिक संस्था है. लेकिन कई मौकों पर अपने बहुमत के कारण हिल एरिया कमेटी के निर्णयों को सत्तारूढ़ पार्टियों ने प्रभावित किया है. लेकिन इस मामले में तो इन बिलों पर कमेटी से चर्चा भी नहीं की गई.’

‘अभी तक मणिपुर सरकार ने उन पुलिस कमांडो को तलाशकर उनके खिलाफ कार्रवाई भी शुरू नहीं की है जिन्होंने हमारे लोगों को मारा’

यहां ये जानना महत्वपूर्ण है कि मणिपुर के आदिवासी क्षेत्र देश के दूसरे आदिवासी क्षेत्रों की तरह संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में शामिल नहीं हैं. संविधान का अनुच्छेद 371 सी ही इनका एकमात्र संरक्षक है.

पिअांग कहते हैं, ‘संघर्ष की शुरुआत गैर-आदिवासी बहुसंख्यक मेइतेई समुदाय द्वारा ज्वाइंट कमेटी फॉर इनर लाइन परमिट (जेसीएफआईएलपी) स्थापित करने के बाद हुई, जिसे बाहरी लोगों के मणिपुर राज्य में प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था. इस कदम के पीछे गैर-आदिवासियों की मंशा आदिवासियों के निवास पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन के लेन-देन को सुगम बनाना था. लेकिन वे राज्य में मणिपुरी और गैर-मणिपुरी की कल्पना में आदिवासियों और उनकी जमीन के हस्तांतरण जैसे गंभीर सवालों को दरकिनार कर रहे थे. जेसीएफआईएलपी आंदोलन के जवाब में राज्य सरकार तीन बिल ले आई, जिससे जमीन के हस्तांतरण में तेजी और आदिवासियों के वजूद पर ही संकट मंडरा सकता है.’

एमटीएफडी के संयोजक रोमियो हमर के मुताबिक, ‘मेइतेई समुदाय बहुल कांग्रेस सरकार के गंदे खेल का खुलासा मणिपुर लैंड रेवेन्यू एंड लैंड रिफाॅर्म्स बिल के विश्लेषण से हो जाता है. बहुसंख्यक समुदाय के निवास मणिपुर घाटी में जमीन को लेकर बढ़ता दबाव संशोधन के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारण रहा है. संशोधित बिल में भ्रमित करने वाले कई वाक्य हैं, जिन्हें आदिवासियों के खिलाफ तोड़-मरोड़कर इस्तेमाल किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, ‘मणिपुर के मूल निवासी’ को सही तरीके से परिभाषित नहीं किया गया है. इन भ्रमों को असंवेदनशील नौकरशाही द्वारा अपने तरीके से इस्तेमाल करने के चलते पारंपरिक आदिवासी भूमि प्रशासन के तरीके पर गंभीर संकट आ जाएगा. इन सबसे सरकार की सच्ची मंशा जमीन हड़पने की लगती है.’ हालांकि मणिपुर सरकार ने कई प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से सफाई देकर जमीन हड़पने के आरोपों का खंडन किया है.

हालिया विवादों पर अगर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि ये विधेयक पहाड़ी क्षेत्रों में अल्पसंख्यक समुदाय के साथ गहरे संरचनात्मक भेदभाव के प्रतीक हैं. घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों में सरकार के खर्च में स्पष्ट अंतर है. एमटीएफडी के सह-संयोजक मैवियो जे. वोबा कहते हैं, ‘महत्वपूर्ण सामाजिक ढांचे जैसे कृषि विश्वविद्यालय, मणिपुर विश्वविद्यालय, दो मेडिकल इंस्टीट्यूट, आईआईटी, नेशनल गेम्स काॅम्प्लेक्स और राज्य स्तरीय प्रशासनिक भवन सभी घाटी में स्थित हैं. यहां तक कि प्रस्तावित खेल विश्वविद्यालय भी घाटी में ही बनेगा.’

इसके अलावा राज्य की विधानसभा में प्रतिनिधित्व का मामला भी विवादास्पद है. वर्तमान में राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 20 ही आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. वोबा कहते हैं, ‘राज्य की जनसंख्या में आदिवासी 40 से 45 प्रतिशत हैं. औसतन हर आदिवासी विधानसभा क्षेत्र की जनसंख्या 37 हजार है लेकिन मेइतेई बहुल घाटी में ये 27 हजार है. परिसीमन आयोग ने आदिवासी क्षेत्रों में विधानसभा सीटें बढ़ाने का सुझाव दिया था लेकिन निहित स्वार्थों के चलते उस पर अमल नहीं हुआ.’

जंतर मंतर पर मृतकों की याद में मोमबत्ती जलाते हुए सैम नगैहते कहते हैं, ‘हमारी आदिवासी संस्कृति में हम उन लोगों को बहुत आदर देते हैं जो मर चुके हैं. लेकिन इस मामले में हमने अपने मर चुके भाइयों को अभी तक दफनाया भी नहीं है जो तकरीबन तीन महीने पहले मारे गए थे. उनके शव चूराचांदपुर जिला अस्पताल के मुर्दाघर में सड़ रहे हैं, जहां शवों को रखने के लिए एक फ्रीजर तक का प्रबंध नहीं है. हम उन शवों को तब तक नहीं लेंगे जब तक हमें न्याय नहीं मिल जाता. हमें उम्मीद है कि एक दिन केंद्र सरकार हमारे इस दुख भरे विरोध को जरूर सुनेगी.’

यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि विभिन्न आदिवासी समुदायों में व्याप्त असंतोष को देखते हुए मणिपुर सरकार ने 2 नवंबर को ‘हियाम खम’ (आदिवासी प्रथागत कानून में हियाम खम का मतलब आरोपी द्वारा गलती को स्वीकार कर लेना होता है) की तामील की यानी इस तरह राज्य सरकार ने स्वीकारा कि हत्याएं अन्यायपूर्ण थीं.

सैम के मुताबिक, ‘सरकार द्वारा किया गया हियाम खम सच्चा नहीं था. प्रथागत कानून के तहत एक सच्चे हियाम खम का मतलब उन अपराधियों द्वारा सार्वजनिक रूप से माफी मांगना होता है लेकिन अभी तक राज्य सरकार ने उन पुलिस कमांडो को तलाशकर उनके खिलाफ कार्रवाई भी शुरू नहीं की है जिन्होंने हमारे लोगों को मारा.’

आदिवासी इस ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि मणिपुर में अब आदिवासियों द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के दौरान भी उन पर अंधाधुंध गोलियां चलाई जाती हैं. सैम कहते हैं, ‘अगर बहुसंख्यक समुदाय प्रदर्शन कर रहा है तो उत्पात चरम पर पहुंचने पर भी पुलिसवाले गोली नहीं चलाते. वे सिर्फ आंसू गैस और रबड़ की गोलियों का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए हमारा ये संघर्ष राज्य में बढ़ते क्रूर नस्लवाद के खिलाफ भी है.’

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