‘मेरी लड़ाई किसी मजहब या मर्द जाति से नहीं, एक व्यक्ति से है’

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सीबीआई जांच की भी बात थी, वह भी नहीं हुई. राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था.
हां, लेकिन कह रहे हैं कि अगली सुनवाई तक तय हो जाएगा. राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि हो जाएगा छह-सात दिनों में. केंद्रवाले कह रहे हैं कि राज्य ने भेजा नहीं. राज्यवाले कह रहे हैं कि भेज दिया गया है. दोनों के बीच क्या मामला लटका है, क्यों लटकाया गया है, क्या कहें.

आप को राजनीति में भी ले जाने की बात की जा रही थी, कई राजनीतिक दल पहुंचे भी थे आपके पास.
वह तो इलेक्शन का टाइम था तो बातें हुईं. कई लोगों ने कहा कि आपको भाजपा ने चुनाव से पहले खड़ा किया है कि बवाल मचाओ. कुछ लोग कह रहे थे कि क्या चुनाव के पहले भाजपा ने आपको सामने लाकर राजनीति की है. मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि मेरे साथ जिंदगी में बुरा हो रहा है और लोग कैसे-कैसे सवाल पूछ रहे हैं. वैसे मेरी तो उम्र ही अभी 22 है तो मैं चुनाव में कैसे जा सकती हूं.

इतने तनाव में शूटिंग की प्रैक्टिस कैसे कर रही हैं. शूटिंग के लिए तो बहुत एकाग्रचित होना पड़ता है.
मैं रोजाना सुबह नौ बजे शूटिंग रेंज में जाती हूं, घर का सारा काम करके. सात बजे शाम तक वहीं रहती हूं. उसके बाद वकील के पास जाती हूं. तनाव तो रहता है, लेकिन मैं सब भूलकर हिम्मत जुटा रही हूं. लेकिन जब घर से निकलती हूं तो पहले की तरह फ्री होकर नहीं निकलती. अब वैसी बात तो रही नहीं. अब तो शाम सात बजे से ज्यादा समय हुआ तो घर से फोन आने लगते हैं. भाई हमेशा रहता है मेरे साथ.

एकाग्रचित: बिखरी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में तारा शाहदेव. फोटो: अमित
एकाग्रचित: बिखरी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में तारा शाहदेव. फोटो: अमित

आपके साथ दो तरह का छल हुआ है. एक तो आपके पति ने ही आपको धोखा दिया, दूसरा आपके साथ मजहब को भी जोड़ दिया गया यानी लव जेहाद. दोनों के बारे में आप क्या राय रखती हैं?
सच कहूं तो मुझे किसी से भी नफरत नहीं है. उस इंसान ने बेवजह मजहब को बीच में घसीटा. मजहब का इससे क्या लेना-देना था. मुझे ईद की सेवईं आज भी पसंद है. अगर वह खुद इस्लाम मानता और मुझे फोर्स नहीं करता तो भी मुझे कोई समस्या नहीं थी. धर्म को मानना न मानना तो आप पर निर्भर करता है. मेरे साथ जब यह सब चल रहा था और इस्लाम और लव जेहाद की बातें आ रही थीं, तो मेरे पास कई मुसलमान दोस्त आए और कहने लगे कि दीदी अब तो आप बात नहीं करोगी हमसे. तब मैंने उनसे यही कहा कि मुझे किसी व्यक्ति ने दगा दिया है, प्रताड़ना दी है, इसका मजहब से क्या लेना-देना.

हिंदू संगठन वाले भी आए थे? उन्होंने धरना-प्रदर्शन भी किया था.
उस समय विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और पता नहीं क्या-क्या नाम होता है, सब कह रहे थे कि आप हिंदू हैं, इसलिए इस्लाम कबूल न करके अच्छा किया.

कुछ लोगों ने आप पर यह कहकर सवाल उठाया था कि खुद को हिंदू कह रही हैं और लव जेहाद का शिकार बता रही हैं, लेकिन अपनी मां के गुजरने के तुरंत बाद आपने शादी कर ली थी.
बहुत सामान्य बात थी. मां का देहांत अचानक हुआ था. पिताजी की भी तबीयत खराब थी. लड़कियों को समाज में बोझ माना जाता है. लड़का 40 साल तक कुंवारा रहे तो कोई बुरा नहीं मानता, लड़की ने 22 पार किया तो बोझ बनने लगती है. पिता भी गुजर जाते तो कौन होता मेरा मालिक. इसलिए मैंने शादी कर ली.

इस पूरे प्रकरण में सबसे बुरा क्या लगता है आज आपको.
सबसे बुरा यही लगा कि लड़कियों को बोझ समझकर जल्दी शादी करने का दबाव रहता है. परिवार ने अपनी तरफ से जांच-परख कर ही शादी की थी. यह मेरी बदकिस्मती थी कि मेरा जीवन बर्बाद हो गया. लड़कियों की शादी करने में जल्दबाजी क्यों? बेटी होने की सजा भुगतनी पड़ी मुझे.

सबक क्या रहा?
सबक यह रहा कि सपना आपने देखा है, तो खुद पूरा करना होगा. किसी पर सपने को पूरा करने का विश्वास नहीं करना है.

अब तक पता नहीं चला कि शादी का प्रस्ताव कैसे आया था?
रंजीत के यहां से प्रस्ताव आया था. मुश्ताक अहमद नाम के विजिलेंस ऑफिसर आते थे रेंज में. उन्होंने ही भाई से बात की कि रंजीत शादी करना चाहता है. फिर घर पर बात चली तो यह राय बनी कि कहीं न कहीं तो करनी ही है.

इतनी कम उम्र में शादी करते वक्त करियर का खयाल नहीं आया?
मुझे नेशनल चैंपियनशिप खेलकर शादी करनी थी, लेकिन रंजीत की मां ने दबाव बनाना शुरू किया कि बेटा पता नहीं कब मेरे साथ क्या हो जाए. इस तरह सात जुलाई 2014 को शादी हो गई.

यह पता नहीं चला पाया है कि रंजीत का धंधा क्या था?
मुझे या मेरे घरवालों को इतना ही पता था कि वह कौशल बायोटेक में सीएमडी है, लेकिन अब तो पता चल चुका है कि वह लड़कियों का सेक्स रैकेट चलाता था. उसके यहां मिनिस्टर आते थे, बड़े लोग आते थे. बोरे में भरकर नोट आते थे. 19 अगस्त को जब मैं वहां से निकली, तब तक पूरा नहीं समझ सकी थी कि उसके क्या-क्या धंधे हैं.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आपकी मदद का आश्वासन दिया था.
उन्होंने कुछ नहीं किया, सिर्फ इतना ही कहा कि कोई परेशानी हो तो बताना.

अगर अब जीवनसाथी की तलाश करेंगी तो क्या ध्यान रखेंगी?
अब तो शादी का सवाल ही नहीं उठता. मैं अकेले जिंदगी गुजार लूंगी. मुझे बस शूटिंग करनी है. मुश्किलें बहुत हैं. दिल्ली में एक माह की ट्रेनिंग फीस ही 40 हजार रुपये है, रहने का खर्च अलग से. मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं, लेकिन मैं खुद के बूते शूटिंग में ही अपनी पहचान बनाऊंगी.

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