कचरा-कचरा जिंदगी

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डंपिंग यार्ड को पर्यावरणीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित बने नियमों के अनुसार इन्हें 25 साल तक ही इस्तेमाल में लाना चाहिए. स्वाति बताती हैं, ‘भलस्वा डेयरी और गाजीपुर डंपिंग यार्ड को लगभग तीस साल हो चुके हैं. डंपिंग यार्ड के लिए निर्धारित अवधि के बाद उसे इस्तेमाल में लाने से कचरे के खतरनाक रसायन मिट्टी में रिसकर जमीन को बंजर बना देते हैं और भूजल पूरी तरह प्रदूषित कर देते हैं.’

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ई-कचरे पर इतनी लापरवाही क्यों?

हमारी जीवनशैली में रोज नए-नए इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिक उपकरण शामिल हो रहे हैं. इन उपकरणों  पर हमारी निर्भरता इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि हर साल पूरे देश में 70 लाख से ज्यादा उपभोक्ता कंप्यूटर खरीद रहे हैं. ऐसे ही हमारे दूसरे जरूरी उपकरणों में मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, वॉशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर, एसी आदि भी शामिल हो चुके हैं. इन उपकरणों की एक तय उम्र होती है, जिसके बाद ये ठीक से काम करना बंद कर देते हैं. इन अनुपयोगी या खराब उपकरणों को ई-वेस्ट (कचरा) कहा जाता है. सामान्य कचरे की तरह ई-कचरे को भी डंप (व्यवस्थित तरीके से कचरे को ठिकाने लगाना) किया जाना चाहिए. सरकार ने ई-कचरा (मैनेजमेंट और हैंडलिंग) नियम 2011 में ही बना दिया था और 1 मई 2012 को इसे लागू कर दिया है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की कार्यकारी निदेशक (शोध) अनुमिता राय चौधरी  के अनुसार, ‘सरकार सामान्य कचरा प्रबंधन के मामले तक में अभी बहुत पीछे है, जबकि ई-कचरे के प्रबंधन मामले में तो सरकार और उसकी मशीनरियां अभी जागी भी नहीं हैं.’ वे उदाहरण देकर बताती हैं, ‘सीएफएल बल्ब के पैकेट पर उसके सुरक्षित निस्तारण के बारे में लिखा होता है, लेकिन उसे अमल ला पाना इतना आसान नहीं? सरकार या उद्योग जगत ने इस दिशा में कोई खास पहल नहीं की है. आलम ये है कि भारत में सर्वाधिक सालाना 10 फीसदी की दर से बढ़ रहे कचरे के कारण प्रदूषण में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.’

Ragpickers by vijay Pandey (2) web
फोटो- विजय पांडेय

राज्यसभा द्वारा कराए गए एक शोध में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, ‘देश में 2005 तक प्रतिदिन 1.47 लाख टन ई-कचरा पैदा होता था, जबकि उसी शोध में यह भी अनुमान लगाया गया था कि 2012 में यह बढ़कर 8 लाख टन प्रतिदिन हो जाएगा. दिक्कत तो ये है कि सरकार इस पर लगाम लगाने की बजाय विकसित देशों से मुक्त व्यापार संधि के नाम पर ई-कचरा आयात भी करती है. सीमा शुल्क विभाग की ओर से  उपलब्ध कराए गए एक आंकड़े के अनुसार, ‘सरकार हर साल 50 लाख टन ई-कचरा  रिसाइकिलिंग के लिए आयात करती है. सामान्यत: 14 इंच के एक मॉनीटर में इस्तेमाल होने वाली ट्यूब में 2.5-4.0 किग्रा शीशा होता है. ई-कचरे में आर्सेनिक, बेरियम, कैडमियम, क्रोम, कोबाल्ट, तांबा, सीसा, निकल, जस्ता जैसे जहरीले पदार्थ शामिल होते हैं, जो वायु में मिलकर प्रदूषण को बढ़ाते हैं.’

दिल्ली के मायापुरी औद्योगिक इलाके में 2010 में ‘कोबाल्ट 60’ के रेडिएशन की वजह से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और छह लोगों की तबियत खराब हो गई थी. पिछले 10 साल के दौरान देश में वायु प्रदूषण का स्तर तीन गुना बढ़ चुका है. बेसल समझौते के बाद यूरोपीय संसद ने एक कानून बनाया, जिसके तहत ई-कचरे को इनकी उत्पादक कंपनियों को हर हाल में वापस लेना होगा. भारत में भी इसके लिए कानून है, लेकिन कई कंपनियों के कस्टमर केयर पर पूछे जाने पर निशानाजनक या कानून के बारे में जानकारी न होने की बात कही जाती है. ई-कचरा वापस लेने के नाम पर बैट्री, मोबाइल, कंप्यूटर आदि वापस लिए जाने लगे हैं, लेकिन ये प्रयास नाकाफी हैं.

उत्पादकों द्वारा ई-कचरा वापस नहीं लिए जाने की वजह से आम लोग कबाड़ी को ही ये कूड़ा बेच देते हैं. कबाड़ी कचरे में लाए गए उपकरण को तोड़कर तांबे जैसी कीमती धातु निकाल लेते हैं और दूसरे जहरीले तत्वों को खुले में छोड़ देते हैं. नतीजा ये होता है कि ये जहरीले तत्व सांस के जरिए शरीर में पहुंचकर बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाते हैं. शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विनय कुमार मिश्रा का कहना है, ‘ई-कचरे के उचित प्रबंधन की व्यवस्था नहीं हो पाने की वजह से किडनी, लीवर, रक्तसंचार में बाधा, मानसिक आघात, दमा, डीएनए का क्षतिग्रस्त होना, हार्मोन में गड़बड़ी, कमजोरी, बच्चों के मानसिक विकलांग होने जैसी समस्याएं पैदा हो रही है.’

ई-कचरा कानून में यह साफ शब्दों में कहा गया है कि खराब उपकरणों को वापस लेने की जिम्मेदारी उत्पादक कंपनी की होगी और उसे 180 दिन के भीतर कचरे का पुनर्चक्रण करना होगा. शहरों में जगह-जगह कलेक्शन सेंटर होंगे, जहां के हेल्पलाइन नंबर लोगों को देने होंगे. इसी कानून में यह भी जिक्र किया गया है कि नए बन रहे उपकरणों में सीसा, पारा, कैडमियम, हेक्सावैलेट, क्रोमियम जैसे तत्वों का प्रयोग नहीं किया जाएगा. कानून की जमीनी हकीकत के बारे में अनुमिता राय चौधरी कहती हैं, ‘खाली कानून बनाए जाने से बात नहीं बनने वाली है. सरकार ई-कचरा कलेक्शन सेंटर खोलने पर जोर दे और साथ ही उत्पादक कंपनियों को इस बात के लिए जवाबदेह बनाए कि वे उपभोक्ताओं के पास से खराब या बेकार पड़े उपकरणों को वापस लें और उनका पुनर्चक्रण जल्द करे. इससे इतर एक तथ्य यह भी है कि भारत में 75 फीसदी ई-कचरा उपभोक्ताओं के स्टोर या घर के किसी कोने में पड़ा रहता है.’

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सरकार के पास कचरे का आंकड़ा तक नहीं

दिल्ली में भवन निर्माण और तोड़फोड़ की प्रक्रिया में हर रोज करीब 4000-5000 मीट्रिक टन कचरा इकट्ठा होता है. यह दिल्ली नगर निगम का आंकड़ा है. हालांकि सही-सही आंकड़ा नगर निगम के पास भी नहीं है. यह बस एक अनुमान है. इस मलबे के पुनर्चक्रण के लिए दिल्ली में सिर्फ एक संयंत्र बुराड़ी में स्थित है, जहां सिर्फ उत्तरी दिल्ली के मलबे का पुनर्चक्रण किया जाता है. इसकी कचरा पुनर्चक्रण क्षमता 500 टन प्रतिदिन है. मतलब दिल्ली में जितना मलबा भवन-निर्माण और तोड़फोड़ के दौरान इकट्ठा होता है उसके सिर्फ 10 फीसदी हिस्से का ही पुनर्चक्रण हो पाता है.  पूर्वी दिल्ली में एक पुनर्चक्रण संयंत्र स्थापित किया गया है, लेकिन इसे शुरू नहीं किया जा सका है. कचरा प्रबंधन के दौरान एक समस्या तो बहुत आम है कि जैविक और अजैविक कूड़े को अलग नहीं किया जाता. निर्माण के दौरान निकले हुए मलबे को, खासतौर पर छोटे बिल्डरों द्वारा डंपिंग यार्ड पर पहुंचाने, इसका पुनर्चक्रण करने की बजाय उसे शहर के किसी नाले, नहर या तालाबों में डाल दिया जाता है.

इस मामले में दिल्ली की स्थिति सबसे अच्छी है. ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि दिल्ली में इनकी स्थिति को लेकर थोड़े-बहुत आंकड़े तो मौजूद हैं. देश के दूसरे शहरों में भवन-निर्माण और तोड़फोड़ का सिलसिला तेज हुआ है लेकिन उन शहरों से कोई खास आंकड़ा नहीं मिलता. पूर्व शहरी विकास मंत्री ने पिछले साल राज्यसभा में बताया था कि इस बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. शहरी विकास मंत्रालय के ठोस कचरा प्रबंधन की नियमावली (मैनुअल) में वर्ष 2000 में 10-12 मिलियन टन सालाना कचरा इकट्ठा होने की बात कही गई थी और 2015 में भी 10-12 मिलियन टन कचरा जमा होने की बात है. इन पंद्रह सालों में देश में निर्माण और विध्वंस दोनों ही प्रक्रियाओं में तेजी आई ऐसे में मंत्रालय के इस आंकड़े पर कैसे विश्वास किया जा सकता है? सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने 2013 में इस बारे में एक अनुमान लगाया था कि 530 मिलियन टन निर्माण व विध्वंस का कचरा जमा हुआ होगा. अब सवाल है कि जब आंकड़े इकट्ठे करने में इतनी लापरवाही बरती जा रही है तब इसके समाधान को लेकर सरकार की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

अविकल सोमवंशी, रिसर्च एसोसिएट, सीएसई

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