सड़क किनारे साहित्य

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आज इनके पास तीन से चार हजार किताबें हैं. वो हर रोज अपनी स्कूटी से आती हैं और पास के एक कमरे से सभी किताबें लाकर यहां अपनी दुकान सजाती हैं और रात में किताबें समेटकर वापस घर लौट जाती हैं. संजना बताती हैं, ‘हर रोज इतनी किताबों को लाना, लगाना और फिर इन्हें उठाकर रखना आसान काम तो है नहीं लेकिन कर भी क्या सकते हैं. अब तो मुझे इस काम में मजा आने लगा है. अब इसमें कोई परेशानी भी नहीं होती. यहां लोग भी बहुत अच्छे हैं, अगर दिन में थोड़ी देर के लिए मुझे इधर-उधर जाना होता है तो मैं इनलोगों के भरोसे दुकान छोड़कर चली जाती हूं. रात को नौ-दस बजे मैं अपनी दुकान बढ़ाती हूं लेकिन आजतक किसी ने किसी भी तरह से परेशान नहीं किया. हां, जब एक-दो दफा दिल्ली पुलिस के लोग आए तो इन्हीं बच्चों ने मेरी दुकान बचाई. यही लोग मेरे ग्राहक हैं और इन्हीं लोगों की मदद से मैं अपनी दुकान चला पा रही हूं.’

हर बात मुस्कुराते हुए बोलनेवाली संजना के मन में किसी के लिए कोई कड़वाहट नहीं है. न तो उन्हें वाणी प्रकाशन से नौकरी जाने की शिकायत है और न ही ज्ञानपीठ प्रकाशन से नौकरी छोड़ने का मलाल. वे कहती हैं, ‘शिकायत क्या करना. उनकी नौकरी थी सो जब उन्हें ठीक लगा हटा दिया. अगर वे ऐसा न करते तो आज मैं अपना काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती. जो हुआ अच्छा हुआ.’

कहानी में कविता-सी लय हो और कविता में कहानी हो. पुराने लेखकों के लेखन में इसकी झलक मिलती है लेकिन आज किताबों में वैसा असर नहीं होता

मूलत: बिहार के सीवान जिले से आनेवाली संजना की खुद की पढ़ाई-लिखाई केवल 12वीं तक हुई है. इसके बाद घरवालों ने उनकी शादी राधेश्याम तिवारी से करवा दी थी. 50 वर्षीय राधेश्याम तिवारी देश के एक बड़े हिंदी अखबार में पिछले कई सालों से पत्रकार हैं लेकिन उनकी तनख्वाह इतनी नहीं कि वह अकेले परिवार का खर्च चला सकें. संजना के मुताबिक, ‘वे एक ऐसे इंसान हैं जिसकी वजह से वह यह सब कर पा रही हैं.’ इस तरह खुले में दुकान लगाने से परिवार या पति को कोई एतराज, के सवाल पर वे कहती हैं, ‘नहीं… मेरे पति या मेरे बच्चों को कभी कोई एतराज नहीं हुआ. हां, कुछ साल पहले सीवान में रह रहे मेरे छोटे भाई को इससे दिक्कत हुई थी और उसने मुझसे कहा था कि मैं किसी को न बताऊं कि मैं उसकी बहन हूं. हालांकि वो मुझसे बहुत छोटा है और मुझे उससे यह सब सुनना अच्छा भी नहीं लगा था लेकिन मैंने उसे तभी कह दिया था. ठीक है, मैं नहीं कहूंगी.’

आज की तारीख में संजना के पास हर वो किताब है जिसे मंडी हाउस आने-जानेवाला व्यक्ति खोज या मांग सकता है. महीने में वे 70 से 75 हजार रुपये की किताबें बेच लेती हैं. बतौर मेहनताना इन्हें इस पर 20 प्रतिशत मिलता है. क्या इंटरनेट के आने से लोग किताबें खरीदना पसंद नहीं कर रहे हैं? इसके जवाब में वे कहती हैं, ‘मुझे ऐसा नहीं लगता. आज से आठ साल पहले जब मैं यहीं वाणी प्रकाशन की नौकरी करती थी तो महीने में 30 या 40 हजार रुपये की किताबें बिकती थीं आज मैं 70 से 75 हजार रुपये की किताबें बेच रही हूं.

अगर इंटरनेट की वजह से फर्क पड़ना होता तो बिक्री घटनी चाहिए थी न? लेकिन ऐसा नहीं हुआ? मैं पहले से ज्यादा किताबें बेच रही हूं. मुझे लगता है कि आज भी पाठक किताब खरीदने से पहले उसे हाथ में उठाकर उलटना-पलटना चाहता है.’ संजना ऐसी पुस्तक विक्रेता हैं जो न सिर्फ किताबें बेचती है, बल्कि उन्हें पढ़ना भी पसंद है. निर्मल वर्मा, प्रेमचंद, रेणु से लेकर तुलसीराम और टीवी पत्रकार रवीश कुमार की हालिया किताब ‘इश्क में शहर होना’ को उन्होंने पढ़ा है. सारी किताबें पढ़ने के सवाल पर संजना कहती हैं, ‘न, न… सारी नहीं कुछेक तो जरूर पढ़ती हूं. इसका दोहरा फायदा है. एक, किताब के बारे में पाठकों को अच्छे से समझा पाती हूं और दूसरी, राधेश्याम जी किताबों की समीक्षा भी लिखते हैं सो उनकी भी मदद कर देती हूं, जिससे उनका काम आसान हो जाता है.’

तकरीबन ढाई-तीन घंटे उनकी दुकान पर रहने पर एक बात साफ समझ आ जाती है कि वहां आनेवाले ज्यादातर ग्राहक आज भी प्रेमचंद, गुलजार, गालिब, इस्मत चुगताई और मंटो की किताबें खोज रहे हैं. हाल में प्रकाशित किताबों को कोई खोजता हुआ नहीं दिखता. सिर्फ पुराने लेखकों की ही किताब रखने के सवाल पर वे तंज कसते हुए कहती हैैं, ‘पुराने लेखक? हिंदी में यही लेखन है और यही लेखक हैं. नया तो कुछ लिखा ही नहीं जा रहा है. कुछेक लेखकों को छोड़ दें तो बाकी तो पुस्तकालयों में सहेजने के लिए ही लिखा और छापा जा रहा है.’ वे आगे कहती हैं, ‘देखिए… हम पाठक को तभी बांध सकते हैं जब लेखन में दम हो. कहानी में कविता-सी लय हो और कविता में कहानी हो.पुराने लेखकों के लेखन में इसकी झलक मिलती है लेकिन आज की ज्यादातर किताबों में वैसा असर नहीं होता.’

संजना का दावा है कि हाल के वर्षों में प्रकाशित किताबों में तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ और व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी का व्यंग्य ‘हम न मरब’ पाठकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं. वहीं टीवी पत्रकार रवीश कुमार की किताब ‘इश्क में शहर होना’ की भी पूछपरख है. फिलहाल संजना को बरसात के दिनों में अपनी दुकान लगाने को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ता है. पिछले साल दिसंबर की बेमौसम बरसात में इनकी काफी किताबें भीग गई थीं. आज भी वे सारी बेकार पड़ी हैं. संजना बरसात से बचने का रास्ता जरूर खोज रही हैं लेकिन इससे वे परेशान बिल्कुल नहीं हैं. वे कहती हैं, ‘हर छोटी, बड़ी बात पर परेशान नहीं हुआ जाता. परेशानी में समस्या का हल खोजना मुश्किल होता है. यह आराम से किया जा सकता है. वैसे भी पिछले कई वर्षों में इतनी परेशानियां आईं कि उनके आगे ये सब तो छोटी लगती हैं.’

संजना के चेहरे पर एक बार फिर वही हल्की मुस्कान छा जाती है जिसके साथ मैं उन्हें पिछले कई घंटो से देख रहा हूं. इसी मुस्कान के साथ वो द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कविता ‘वीर तुम बढ़े चलो’ की कुछ पंक्तियां बोलती हैं- सामने पहाड़ हो / सिंह की दहाड़ हो / तुम निडर डरो नहीं / तुम निडर डटो वहीं / वीर तुम बढ़े चलो!

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