केशव के हाथ कमल

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केशव प्रसाद के खिलाफ सबसे पहले 1996 में कौशांबी के पश्चिम शरीरा थाने में दंगा भड़काने, सरकारी काम में बाधा डालने, पुलिस पर हमला, और बलवा करने का मामला दर्ज हुआ था. इसके बाद ठीक दो साल बाद इलाहाबाद के कर्नलगंज थाने में ऐसे ही मामलों में एफआईआर हुई . 2008 में कौशांबी के मोहम्मदपुर पइंसा थाने में धोखाधड़ी, जालसाजी समेत अन्य धाराओं में रिपोर्ट लिखी गई. इसी घटना के साथ एक अन्य मुकदमा किया गया है जिसमें केशव पर मोहम्मदपुर पइंसा थाने में ही धार्मिक स्थल तोड़ने, बलवा करने और दंगा भड़काने की एफआईआर दर्ज हुई. उनके खिलाफ कौशांबी में 2011 में तीन मुकदमे दर्ज हुए. पहला मंझनपुर थाने में बलवा, दंगा भड़काने समेत अन्य मामलों में दूसरा कोखराज थाने में एक मुस्लिम युवक की हत्या और साजिश के मामले में वे नामजद हुए. कोखराज थाने में भी दंगा भड़काने की एफआईआर हुई. 2014 में लोकसेवा आयोग अध्यक्ष के खिलाफ प्रतियोगी छात्रों के आंदोलन के दौरान हुए बवाल में केशव के खिलाफ बलवा, सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने, तोड़फोड़, पुलिस टीम पर हमला, सरकारी काम में बाधा समेत अनेक धाराओं में मुकदमा किया गया.

हालांकि मुकदमों की लंबी फेहरिस्त बताकर विरोध करने वालों को केशव ने जोरदार भाषा में जवाब दिया. लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि अन्याय के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी रहेगी. सरकार 11 नहीं, 11 हजार मुकदमे लगा दे तब भी कोई परवाह नहीं है. वहीं इस मामले पर कौशांबी भाजपा के जिलाध्यक्ष रमेश पासी कहते हैं, ‘केशव प्रसाद मौर्य आपराधिक नहीं जुझारू प्रवृति के नेता हैं. वे हमेशा अत्याचार के विरोध में आवाज उठाते रहे हैं. आप देख सकते हैं कि उन पर ज्यादातर मुकदमे कार्यकर्ताओं का साथ देने के चलते दायर हुए हैं. इसमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है. मेरा मानना है कि भाजपा कार्यकर्ता अब विपक्ष का अत्याचार बर्दाश्त नहीं करेगा.’

कुछ ऐसी ही बात लक्ष्मीकांत बाजपेयी भी करते हैं. वे कहते हैं, ‘किसी भी पार्टी का कोई कार्यकर्ता जब किसी जिले में अपने काम की बदौलत तेजी से उभरना शुरू होता है तो वह सत्तारूढ़ दल समेत अन्य लोगों को खटकना शुरू हो जाता है. फिर उस पर अंकुश लगाने के लिए विभिन्न अर्जी-फर्जी मुकदमे दायर होने लगते हैं. जो इन मुकदमों से डर जाता है वह नेपथ्य में चला जाता है, लेकिन जिसने अपने शर्ट के दो बटन खोल दिए उसके उपर दो मुकदमे और दायर हो जाते हैं. वैसे भी ऐसा नहीं है कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ मुकदमे दायर होने से जनप्रतिनिधि नहीं बन सकता है. अगर वह जनप्रतिनिधि बन सकता है तो संगठन के लिए क्यों अयोग्य होगा?’

हालांकि बाजपेयी से जब यह पूछा गया कि आखिर भाजपा की ऐसी कौन-सी मजबूरी थी जिसके चलते वह संगठन में तमाम वरिष्ठ लोगों की मौजूदगी के बावजूद आपराधिक छवि वाले केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुनती है तो उन्होंने कहा, ‘मुझसे आप तीन वाक्य सुन लो पहला, टिट फॉर टैट; दूसरा, जैसे को तैसा और तीसरा शठे शाठ्यम् समाचरेत. अरे, सामने वाला नंगा है और आप मुझसे कह रहे हैं कि आपने लंगोट क्यों पहन लिया है. अरे, माला जपने से राजनीति नहीं होती है. राजनीति के हिसाब से चीजें बदल जाती है.’

केशव को प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा बनाया गया एक पोस्टर, जिस पर विवाद हुआ
केशव को प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा बनाया गया एक पोस्टर, जिस पर विवाद हुआ

आपराधिक छवि को लेकर 47 वर्षीय केशव का समर्थन करने वालों में सिर्फ भाजपा नेता नहीं बल्कि इलाहाबाद में रहकर सिविल परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कुछ युवा भी शामिल हैं. सिविल परीक्षा की तैयारी करने वाले अनूप तिवारी कहते हैं, ‘2014 में लोकसेवा आयोग अध्यक्ष के खिलाफ प्रतियोगी छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ तो केशव छात्रों के समर्थन में कूद पड़े. 2015 में लोकसेवा आयोग के मुद्दे पर छात्रों का आंदोलन चल रहा था तो वे बेली अस्पताल में छात्रों से मिलने पहुंचे. इस दौरान उनकी दरोगा से कहासुनी भी हो गई थी. इसके पहले वे 2013 में सिविल लाइंस में छात्रों के साथ खड़े रहे. इन तीनों मामलों में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज है. अब इसमें उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं हैं. जहां दूसरे नेता छात्रों के साथ खड़े नहीं होते हैं वही केशव एक आवाज देने पर हमारे साथ कहीं भी चलने के लिए तैयार हो जाते हैं. हालांकि लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें इसका फायदा मिला और छात्रों ने उनके पक्ष में जबरदस्त माहौल बनाया था.’

हालांकि ऐसा नहीं है कि सब केशव प्रसाद मौर्य की इस छवि से खुश हैं. चायल विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ चुके सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद रूफी कहते हैं, ‘शीर्ष भाजपा नेतृत्व केशव की छवि को कैसे भी दिखाए लेकिन इलाहाबाद में हकीकत सबको पता है. केशव ने अपराध के सहारे ही अपनी राजनीति चमकाई है. उनके उपर मामले इसलिए नहीं दर्ज हुए कि वे राजनीतिक रूप से मजबूत हो रहे थे बल्कि जितना अपराध में वे मजबूत हुए उतना ही राजनीति में उनका कद बढ़ा. गोरक्षा समेत दूसरे अभियान चलाकर उन्होंने हमेशा अल्पसंख्यकों को डराने और बहुसंख्यकों के ध्रुवीकरण की कोशिश की है. इलाहाबाद से मुरली मनोहर जोशी, केशरी नाथ त्रिपाठी समेत दूसरे भाजपा नेता भी रहे हैं, लेकिन केशव इस कड़ी में सबसे कमजोर हैं. उनके नेतृत्व में भाजपा के मजबूत होने के आसार कम ही हैं. खुद उनकी अपनी ही जाति में उनका जनाधार बहुत ज्यादा नहीं है. उनका कद इतना बड़ा नहीं है कि अल्पसंख्यक उनके साथ अपने को जोड़ सकें. कुल मिलाकर केशव भाजपा के लिए फायदे का सौदा नहीं हैं.’

‘चुनाव से पहले केशव की नियुक्ति से साफ पता चलता है कि भाजपा को हिंदुत्व और राम मंदिर के अतिरिक्त कुछ नहीं सूझता है. जबकि यह साफ है कि राम मंदिर और हिंदुत्व को भुनाने का वक्त बीत चुका है. पार्टी जब-जब इस मुद्दे पर चुनाव लड़ती है तो उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है’

वहीं शरत प्रधान कहते हैं, ‘चुनाव से पहले केशव की नियुक्ति से साफ पता चलता है कि भाजपा को हिंदुत्व और राम मंदिर के अतिरिक्त कुछ नहीं सूझता है. जबकि यह साफ है कि राम मंदिर और हिंदुत्व को भुनाने का वक्त बीत चुका है. पार्टी जब-जब इस मुद्दे पर चुनाव लड़ती है तो उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा उपचुनावों में पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को आगे बढ़ाकर चुनाव लड़ा था लेकिन सफलता नहीं मिल पाई थी. इस दौरान जमकर हिंदुत्व, लव जेहाद और राम मंदिर जैसे मुद्दों को उछाला गया था. वैसे भी चुनाव के ठीक पहले लक्ष्मीकांत बाजपेयी को हटाकर केशव की नियुक्ति करके भाजपा भी कांग्रेस की राह पर है. कांग्रेस में पहले से ही यह कल्चर रहा है कि काम करने वाले आदमी को चुनाव के ठीक पहले हटाकर अपने आदमी को नियुक्त कर दें. यही अब अमित शाह कर रहे हैं. योगी आदित्यनाथ को उपचुनाव की बागडोर देकर हार का सामना कर चुकी भाजपा अब दूसरे योगी आदित्यनाथ यानी केशव को बागडोर सौंप रही है. मुझे आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्या में खास फर्क नजर नहीं आता है. आगामी विधानसभा चुनावों में अमित शाह की कलई खुल जाएगी.’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता रमेश यादव कहते हैं, ‘केशव के चुने जाने से कुछ अलग होने का दावा करने वाली भाजपा का चेहरा प्रदेश की जनता के सामने खुल गया है. विधानसभा चुनाव से पहले दागी छवि वाले व्यक्ति को प्रदेश की कमान सौंपे जाने से सीधे-सीधे यह पता चलता है कि अमित शाह और मोदी की जोड़ी सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. हालांकि उत्तर प्रदेश में उनका यह दांव नहीं चलने वाला है. प्रदेश की जनता ने पिछले दो साल में केंद्र की सत्ता में भाजपा के कुशासन को देख लिया है.’

विपक्षी उनकी संपत्ति को लेकर भी सवाल उठाते रहे हैं. उनका कहना है कि चाय बेचने से अपने जीवन की शुरुआत करने वाले केशव सिर्फ दो दशक के भीतर करोड़पति हो गए. हालांकि भाजपा नेता लाल बहादुर इसके जवाब में कहते हैं, ‘विरोधियों ने केशव का जुझारूपन नहीं देखा है. वह आदमी मेहनती और उर्जा से भरपूर है. उन्होंने बिजनेस करके सारा पैसा कमाया है और खुद अपनी संपत्ति घोषित की है. उन्होंने कोई चोरी नहीं की है. उनका व्यापार इलाहाबाद समेत अन्य जिलों में फैला है. अगर आपको कुछ गड़बड़ लगता है तो जांच करा लीजिए. प्रदेश में कौन-सी हमारी सरकार है. दरअसल यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा है, जिसके जरिए जनता को भरमाया जा रहा है.’

फिलहाल प्रदेश में नेतृत्व संभालते ही केशव अपने तेवर दिखाने लगे हैं. वे अभी प्रदेश में ताबड़तोड़ दौरे कर रहे हैं और स्थानीय नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं. जल्ह ही वे आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपनी टीम का गठन भी करने वाले हैं. प्रदेश कार्यकारिणी समेत जिला कार्यकारिणी में बड़े बदलाव किए जाने की बात भी हो रही है. वे मंदिर मुद्दे से तो परहेज कर रहे हैं लेकिन प्रदेश में रामराज्य लाने की बात कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी सक्रिय केशव ने मिशन 265 प्लस को अपना एजेंडा बना लिया है. जीत के लिए सपा-साफ, बसपा-हाफ और बीजेपी ऑन ‘टॉप’, सपा-बसपा मुक्त उत्तर प्रदेश जैसे जुमले भी गढ़े जा रहे हैं.

हालांकि इस सबके बावजूद विश्लेषक भाजपा और केशव की राह को कांटों भरी ही बता रहे हैं. डॉक्टर प्रदीप सिंह कहते हैं, ‘केशव प्रसाद मौर्य के सामने चुनौती काफी बड़ी है और उनका कद काफी छोटा है. प्रदेश की कुल 20-25 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाले व्यक्ति को मिशन 265 प्लस की जिम्मेदारी सौंपा जाना समझ से परे है. प्रदेश में लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा समर्थकों में कमी ही आई है. इसमें इजाफा नहीं हुआ है. हालांकि केशव जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए सबसे मुफीद हैं, लेकिन बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रूहेलखंड, मध्य यूपी और अवध जैसे अलग-अलग हिस्सों में वे कैसे प्रभाव जमाएंगे यह देखने वाली बात होगी. पूरे प्रदेश में आप एक नारे से जीत नहीं हासिल कर सकते हैं. हर जगह अपने स्थानीय मुद्दे और समीकरण हैं जिन्हें साधकर चलना होगा. हालांकि अभी तक भाजपा पिछली विधानसभा में हासिल की गई सीटों में सिर्फ 10-20 सीटों का इजाफा करती नजर आ रही है. इसे बहुमत तक पहुंचाना केशव, अमित शाह और संघ सभी के लिए चुनौतीपूर्ण है.’