पत्रकारिता या पीआर

दूसरा कि खासकर टेलीविजन इंडस्ट्री के संदर्भ में सब टीआरपी के लिए किया जाता है, मुहावरा ही बन गया है और अब तो ये मुहावरा इतना घिस गया है कि गली-मोहल्ले के सामान्य दर्शक तो बात-बेबात इसका इस्तेमाल करते हैं. पैनल डिस्कशन में अक्सर राजनीतिक दलों के प्रवक्ता तक बोलते नजर आते हैं. एक तरह से मीडिया के इस बदलते चरित्र पर पर्दा ही डालने का काम करते हैं. पत्रकारीय जिम्मेदारी से छिटककर मीडियाकर्मी जिन सारी गतिविधियों में शामिल हैं उनसे टीआरपी का सवाल दूर-दूर से जुड़ा नहीं है बल्कि ये वो गतिविधियां हैं जिसका संबंध मीडिया संस्थान के उस प्रमुख व्यवसाय से है जिसके बूते चैनल के बने रहने की संभावना मजबूत होती है. जिस दिन मीडिया संस्थान का मूल व्यवसाय गड़बड़ाया नहीं कि मीडिया के कारोबार पर भी ताला लगते देर नहीं लगेगी. हमारे सामने एक के बाद एक चैनलों के बंद होने के उदाहरण हैं जो ये स्पष्ट करते हैं कि ये इसलिए बंद नहीं हुए क्योंकि टीआरपी की दौड़ में पिछड़ गए या इन्हें विज्ञापन नहीं मिले. ये इसलिए बंद होते चले गए क्योंकि अपने रियल एस्टेट, चिटफंड, राजनीति या ठेकेदारी के जिस मूल व्यवसाय की दम-खम पर टिके थे, उसमें कंपनी को भारी नुकसान हुआ और जिसका सीधा असर पहले कटौती, फिर वेतन रोक दिए जाने और अंत में इसके बंद ही कर दिए जाने पर हुआ. ऐसे में इस ओनरशिप पैटर्न के तहत मीडियाकर्मी लगातार इस बात की सलामती चाहते हैं कि कंपनी का जो मूल व्यवसाय है वो हर हाल में सुरक्षित रहे. एक ही मीडिया घराने का मीडियाकर्मी अंग्रेजी से हिंदी, टीवी स्क्रीन से ऑनलाइन तक पर जब दिखते हैं तो बात फिर भी समझ आ जाती है कि उनके ऊपर एक संस्थान के लिए काम करने का मतलब एक चैनल या वेबसाइट के लिए काम करना नहीं है, उन तमाम ब्रांड के लिए काम करना है जिसे उसकी कंपनी चलाती है.

नेटवर्क 18 में साल 2012-13 में रातोंरात सैंकड़ों मीडियाकर्मियों की छंटनी हुई, उसका आधार भी यही था. लेकिन एक मीडियाकर्मी पत्रकारिता के अलावा भी दूसरे कई काम कर रहा है वो कभी-कभार मीडिया संस्थान की ओर से आयोजित कॉन्क्लेव या फेस्टिवल में भले दिख जाते हों लेकिन खुले तौर पर सामने नहीं आ पाता.

ये स्थिति तो उस कॉर्पोरेट मीडिया का है जिसकी ओनरशिप माध्यमों के दायरे से लांघकर उस पैटर्न पर आकर टिकी है कि जहां-जहां मुनाफे की संभावना है, मीडिया संस्थान अपने पैर वहां-वहां बढ़ाएंगे. लेकिन पिछले कुछ सालों से खासकर लोकसभा चुनाव 2009 के बाद से चुनावी राजनीति की जो शक्ल बदली है उसमें एक नए किस्म की मीडिया ओनरशिप का दौर शुरू हुआ है.

ये कोई नई परिघटना नहीं है कि जो भी सरकार सत्ता में आती है, पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग से लेकर सरकारी विज्ञापनों पर निर्धारित खर्च को अपने पक्ष में इस्तेमाल करती है. ऑल इंडिया रेडियो से लेकर सरकारी भोंपू दूरदर्शन जैसे कई मुहावरे इतने प्रचलित रहे हैं कि इनकी व्याख्या किए बिना समझ आ जाता है कि माध्यमों पर कब्जा उसी का होगा, जिसका चुनाव के जरिए जनतंत्र पर है और तब वो अपनी सुविधानुसार छवि का जनतंत्र गढ़ने का काम करेंगे.

लोकसभा चुनाव 2009 के बाद फिक्की-केपीएमजी की मीडिया और मनोरंजन से संबंधित जो रिपोर्ट आती है, उसके बाद से मीडिया ओनरशिप का एक नया पैटर्न उभरकर आता है. रिपोर्ट का दिलचस्प पहलू है कि जब दुनियाभर में आर्थिक मंदी का दौर था और जिसका सीधा असर इस देश के कारोबार पर भी पड़ा, उस वक्त भी मीडिया इंडस्ट्री न केवल मुनाफे में रही बल्कि उसका विकास दर पहले से कहीं ज्यादा रहा. इसकी बड़ी वजह चुनाव से हासिल राजस्व रहा. मीडिया के लिए ये बात समझना कोई मुश्किल नहीं रहा कि एफएमसीजी, ऑटोमोबाइल और टेलीकॉम के विज्ञापनों की तरह राजनीति दल भी बेहतरीन क्लाइंट हो सकते हैं और न ही राजनीतिक दलों को इंडिया शाइनिंग के जबरदस्त पिट जाने के वाबजूद अंतिम सत्य मान लेने में देरी लगी कि भारी लागत के विज्ञापनों के बिना वे चुनाव में टिके रह सकते हैं. नतीजा माध्यमों पर निर्भरता का एक ऐसा दौर शुरू हुआ कि जिसमें विज्ञापन से कहीं ज्यादा इवेंट, पीआर प्रैक्टिस, स्ट्रैटजी और प्रोपेगेंडा प्रभावी होते चले गए.

आज देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दल बाकायदा पट्टाधारी मीडियाकर्मियों को अपने वॉररूम के लिए नियुक्त कर रहे है. उन्हें उसी तरह बायमेट्रिक कार्ड पंच करके शिफ्ट वाइज काम करना होता है जैसा कि मीडिया दफ्तरों में किया जाता है. उनका काम सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया की एक-एक सामग्री पर नजर रखनी होती है जो कि उनके पक्ष-विपक्ष में अपनी बात कर रहे होते हैं. उनका काम वेतन देने वाली अपनी राजनीतिक पार्टी के लिए लगातार पक्ष में माहौल बनाना होता है जिसे सोशल मीडिया की भाषा में ‘बज़’ क्रिएट करना कहते हैं. इसे चाहें तो कार्यकाल मीडिया ओनरशिप कह सकते हैं जिसकी स्ट्रैटजी में हर अगला पांच साल शामिल है. ऊपरी तौर पर जो राजनीतिक पार्टियां सरकार चलाती हुई दिख रही हैं, विपक्ष में बैठी नजर आ रही है वो एक ऐसे वॉररूम की ओनरशिप लिए बैठी हैं जो बिल्कुल न्यूजरूम की शक्ल में काम करता है.

इस वॉररूम के एजेंडे जितने स्पष्ट हैं, उसकी राजस्व संरचना उतनी ही धुंधली. मसलन जब इन राजनीतिक दलों की गतिविधियां ही सीधे-सीधे न आकर वाया मेनस्ट्रीम मीडिया या सोशल मीडिया आ रही हैं तो बैलेंस शीट आने में तो सालों लग जाएंगे, लेकिन ओनरशिप के इस नए पैटर्न से इतना तो स्पष्ट है कि ट्राई अपनी रिपोर्ट में जनतंत्र के भीतर जिस बहुलता की चिंता करती है, वो यहां तक आते-आते बादशाहत कायम करने के सवाल पर टिक जाता है. कंटेंट का सवाल बहुत मामूली और पीछे रह जाता है. और इन सबके बीच सबसे बड़ी बात कि अब इस पर आखिर चिंता कौन जाहिर करे, जिसे चिंता करनी चाहिए वो तो खुद वॉररूम को और भी आक्रामक बनाने की कवायद में जुटे हैं.

(लेखक मीडिया अध्ययन से जुड़े हैं)

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