साख पर सवाल

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डूबते को किसका सहारा: आंदोलन के साथ हो रही राजनीति के कारण बांध प्रभावितों का मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है

दूसरी तरफ आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और आप के प्रदेश संयोजक आलोक अग्रवाल का कहना है, ‘सत्याग्रह के दौरान मध्य प्रदेश सरकार का रुख नकारात्मक रहा. केंद्र और राज्य दोनों में एक ही पार्टी की सरकार है इसलिए अब वह ज्यादा  असंवेदनशील हो गई है. दोनों ही सरकारें किसानों से दूर होकर पूंजीपतियों के पक्ष में जा रही हैं. एक तरफ राज्य सरकार ने जमीन-हदबंदी कानून हटा दिया है तो केंद्र सरकार भी भूमि अधिग्रहण कानून के जरिए किसानों की जमीन उद्योगों को सौंपने के लिए तैयार है.’ यह पूछने पर कि क्या जल सत्याग्रह के साथ सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी के जुड़ने से भी शिवराज सरकार का यह रुख सामने आया है, उन्होंने कहा, ‘महत्वपूर्ण यह नहीं है कि मांग कौन कर रहे थे बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि मांगें क्या थीं. लोग पुनर्वास के लिए अपना कानूनी अधिकार मांग रहे थे. लोकतंत्र में हर किसी को ये हक है कि वह लोगों के लिए आवाज उठाए. ऐसे में अगर कोई राजनीतिक पार्टी मानवाधिकार का मुद्दा उठा रही है तो उस पर सवाल खड़ा करना एक खतरनाक संदेश है. आम आदमी पार्टी हमेशा से इस तरह के मुद्दों को उठाती रही है. अफसोस तो यह है कि कोई और पार्टी इन मुद्दों को उठाती ही नहीं. यह सब बहानेबाजी है. सरकार इसका बहाना बनाकर विस्थापितों को उनका कानूनी हक देने से बचने की कोशिश कर रही है.’

इस पर अनुराग मोदी का कहना है, ‘आम आदमी पार्टी से यह पूछा जाना चाहिए कि एक दल के तौर पर बड़े बांध बनाने को लेकर उनका पक्ष क्या है? ऐसा नहीं हो सकता कि आप एक तरफ बांध प्रभावितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ें और दूसरी तरफ आपके और दूसरी पार्टियों के विकास के मॉडल में कोई फर्क भी दिखाई न दे. यह तो बहुत बड़ा विरोधाभास होगा. नर्मदा बचाओ आंदोलन की लड़ाई से भले ही हम बड़े बांध रोकने और प्रभावितों को पूरी तरह से पुनर्वास दिलाने में कामयाब न रहे हों, कम से कम यह विकास के पूरे ढांचे पर सवाल तो खड़ा कर पा रहा था लेकिन इस बार यह भी नहीं हो पाया.’

बहरहाल, इस बार आंदोलन की प्रकृति किस कदर बदली हुई थी इसका नजारा सत्याग्रह के 26वें दिन 7 मई को भोपाल में बोर्ड ऑफिस चौराहे पर हुए प्रदर्शन के दौरान देखने को मिला. इसमें खंडवा जिले से सैकड़ों बांध प्रभावित शामिल हुए थे. प्रदर्शन में आम आदमी पार्टी के पदाधिकारी, कार्यकर्ता समर्थन में मौजूद थे, लेकिन स्थानीय जन संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी वैसी नहीं थी, जो पहले हुआ करती थी. मंच पर आम आदमी पार्टी और नर्मदा बचाओ आंदोलन दोनों के बैनर लगे थे, मगर ज्यादातर आप के नेता दिखाई पड़ रहे थे. तकरीबन 500 प्रभावित लोगों में से ज्यादातर लोग आम आदमी पार्टी की टोपियां पहने हुए थे. हाथों में नर्मदा बचाओ आंदोलन का झंडा भी मौजूद था. इसके अलावा सत्याग्रह की समाप्ति के मौके पर घोघलगांव में आम आदमी पार्टी के नेताओं ने बलात्कार पीड़ित नाबालिग लड़कियों और उनके परिवार के लोगों को मंच पर बुलाया. उन्हें पार्टी की टोपी पहनाकर बिना चेहरा ढंके अपने साथ हुई ज्यादती की कहानी माइक से सुनाने को कहा गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार पीिड़ताओं और उनके परिवार की पहचान को किसी भी हालत में सार्वजनिक नहीं करने के सख्त निर्देश दिए हैं. सत्याग्रह के समाप्ति के समय इसका कोई औचित्य भी नहीं था.

घोघलगांव के प्रभावित किसान अजय भारती का कहना है, ‘सत्ताधारी पार्टी के लोग कहने लगे थे हम नौटंकी कर रहे हैं. 32 दिनों तक पानी में खड़े होकर कोई नौटंकी नहीं करता. हम पर दो से चार लाख रुपये तक का कर्ज चढ़ा हुआ है. ऊपर से हमारी जमीनें भी डुबो दी गई हैं. हमारे पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है. अगर सरकार ने कुछ और महीनों तक हमारी बात नहीं सुनी तो हमारे पास आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. मुख्यमंत्री किसी एक पार्टी का नहीं सभी का होता है. उन्हें सबकी सुननी चाहिए. उन्हें किसान को देखना चाहिए, किसी पार्टी को नहीं.’ इस आंदोलन के साथ हो रही राजनीति के कारण बांध प्रभावितों का मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है.

1 COMMENT

  1. आलेख में “आप” का एंगल और 1 धड़े का ज़िक्र आंदोलन की ख़ास दिशा को दिखता है और संभवतः आप(लेखक) भी इस राजनीतिक एंगल की शमिलियत से बनी नकार को रेखांकित कर रहे हैं. और नर्मदा बचाओ आंदोलन को कुछ विशेष लोग नौटंकी तो बताते ही रहे है …

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