दर्द की दोहरी मार

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वहीं दूसरी तरफ बलात्कार के एक मामले में पुलिस के सुस्त रवैये की वजह से एक किशोरी को कई बार उसी पीड़ा से गुजरना पड़ा. इसी साल जुलाई में महाराष्ट्र के जालना में 17 साल की एक किशोरी के साथ दो युवकों द्बारा गैंगरेप करने का मामला सामने आया था. गैंगरेप के समय युवकों ने उसका वीडियो बना लिया था. इसके बाद दोनों ने किशोरी का मोबाइल छीनकर उसके बदले में दो हजार रुपये लाने की मांग की. किशोरी मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुंची तो पता चला कि दोनों युवक उसे मोबाइल लेने के लिए बुला रहे हैं. इसे देखते हुए पुलिस ने युवकों को पकड़ने के लिए योजना बना ली और किशोरी को महिला पुलिसकर्मी के साथ युवकों से मिलने के लिए भेजा. युवकों ने मामले को पहले ही भांप लिया और फरार हो गए. इस वजह से मामले की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं हो सकी. बाद में युवकों ने मोबाइल लेने के लिए किशोरी को फिर बुलाया तो पुलिस ने फिर वैसी ही योजना बना ली. बदकिस्मती ये थी कि पुलिस समय से पहुंच ही नहीं सकी और युवकों ने किशोरी के साथ फिर सामूहिक दुष्कर्म किया. पुलिस की सुस्ती की वजह से युवक फिर पकड़ में नहीं आ सके. दोनों युवकों को बाद में पकड़ा गया.

छोटी उम्र में बलात्कार और उसके बाद ठहरे गर्भ की पीड़ा का एक और मामला सामने आया. गुजरात में 14 साल की किशोरी के साथ बलात्कार हुआ और वह गर्भवती हो गई. मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंचा, जहां वह गर्भपात करवाने की अनुमति चाहती थी, लेकिन उसे अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि वह 24 सप्ताह की गर्भवती थी और गर्भपात कानून के अनुसार 20 सप्ताह की गर्भावस्था तक ही गर्भपात कराया जा सकता है. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो गर्भपात की संभावना जांचने के लिए पांच डाक्टरों का समूह बनाया गया. इसने अपना मत देते हुए कहा कि किशोरी का गर्भपात कराया जा सकता है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बलात्कार पीड़ित का गर्भपात तभी करवाया जाएगा जब स्वयं उसका जीवन संकट में होगा. यहां अंतिम निर्णय लेने का अधिकार किशोरी के हाथ में न देकर डॉक्टरों के हाथ में दे दिया गया.

बहरहाल हमारी संवैधानिक व्यवस्था में गर्भपात कराने का कोई अधिकार परिभाषित नहीं है. मेडिकल टर्मिनेशन आॅफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971 में यह उल्लेख है कि कुछ खास परिस्थितियों में गर्भपात करवाया जा सकता है, किन्तु निर्णय में डाॅक्टरों की अहम भूमिका होगी. यह प्रमाण है कि हमारे समाज में महिलाओं और नाबालिग बच्चियों को सोच समझ कर निर्णय लेने लायक नहीं माना जाता है. बलात्कार की शिकार बच्ची या महिलाओं के संदर्भ में भी ठीक वही नियम कैसे लागू हो सकते हैं, जो एक सामान्य व्यवस्था में या लिंग परीक्षण आधारित गर्भपात के संदर्भ में लागू होते हैं? यहां कुछ अहम बिंदु हैं- एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, यह पहला अपराध है. जिसमें आज इस बात पर विमर्श हो रहा है कि बच्ची या महिला को ही अपराध के लिए दोषी मानने की प्रवृत्ति को बदलने की कोशिश की जाए, लेकिन यदि वह बच्ची मां बन जाए, तो क्या उसके लिए ‘बलात्कार’ को भूल पाना संभव होगा? इसके बाद उस बच्ची का अपना जीवन क्या रूप लेगा? उसकी शिक्षा, उसके कौशल, उसके खुद के विकास के अधिकार का क्या होगा? किसी अपराधी द्वारा किए गए कृत्य की सजा में उसे क्यों बराबरी का साझेदार बनाया जाना चाहिए? इसके बाद सवाल यह भी है कि जन्म लेने वाले बच्चे का क्या होगा, उसकी पहचान क्या होगी? क्या हमारा समाज अभी इतना सभ्य और मानवीय हो गया है कि वह बेहद सहज और सामान्य रूप से उन दोनों को अपना लेगा? इसका जवाब है, नहीं! इस संदर्भ में एक मत बनाना बहुत आसान नहीं है- एक तरफ बलात्कार से प्रभावित बच्ची है और दूसरी तरफ गर्भ में जीवन पा चुका भ्रूण, जिसे जीवन का अधिकार दिए जाने की वकालत हम सब करते हैं. कुछ और हो न हो, किंतु बलात्कार से प्रभावित बच्ची या महिला को गर्भावस्था में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए और उसे यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वह गर्भपात करवाना चाहती है या नहीं.

भारत में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की स्थिति पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में 53.22 प्रतिशत बच्चे एक या एक से अधिक तरह के यौन दुर्व्यवहार के शिकार हुए हैं

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के सालाना प्रतिवेदनों के मुताबिक भारत में वर्ष 2005 से 2014 के बीच की दस वर्ष की अवधि में बच्चों के साथ बलात्कार के 71,872 प्रकरण दर्ज हुए. इन दस सालों में ऐसे मामलों में 341 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाई देती है. साल 2005 में 4,026 प्रकरण दर्ज हुए थे, जो वर्ष 2014 में बढ़कर 13,766 हो गए. यह भी एक तथ्य है कि ये संख्या वास्तव में होने वाली घटनाओं से बहुत कम है, शायद ये वास्तविक मामलों का 5 प्रतिशत भी नहीं है. भारत में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की स्थिति पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में 53.22 प्रतिशत बच्चे एक या एक से अधिक तरह के यौन दुर्व्यवहार के शिकार हुए हैं. 21.90 प्रतिशत बच्चों के साथ गंभीर किस्म का यौन दुर्व्यवहार हुआ है. 50 प्रतिशत मामलों में इस तरह का व्यवहार परिचितों के द्वारा किया गया. ज्यादातर बच्चे इसके बारे में बात नहीं करते हैं और उस पीड़ा में रहते हैं.

झारखंड में वर्ष 2014 में एक भी प्रकरण दर्ज नहीं हुआ. वहां दस साल में 212 मामले दर्ज हुए. इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी बहुत कम प्रकरण दर्ज होते हैं. हमने शीलू और गीतू के मामले में देखा कि ये घटनाएं तब तक सामने नहीं आईं, जब तक कि वे गर्भवती नहीं हो गईं. दूसरी बात यह है कि बच्चों के साथ बलात्कार की सबसे ज्यादा हरकतें परिजनों और परिचितों के द्वारा अंजाम दी जाती हैं. प्रतिष्ठा व नाते-रिश्तों के नाम पर इन घटनाओं को दबा दिया जाता है.

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