कठिन है डगर स्मार्ट सिटी की

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स्मार्ट बनने की दौड़

देखा जाए तो शहरी विकास मंत्री द्वारा की गई सबसे बड़ी गलती 98 शहरों के नाम चुनने में हुई जल्दबाजी है. शुरुआती रूप में सलाहकारों के पास स्मार्ट सिटी योजना बनाने के लिए सौ दिन का समय था, पर विशेषज्ञ मानते हैं कि ये अवधि काफी कम है. उनमें से एक बताते हैं, ‘इससे पहले हम कई शहरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य की योजनाओं पर काम कर चुके हैं और ऐसे प्रयोगों में एक साल या उससे ज्यादा का समय लगता है. यहां तक कि जब राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन ने हमें जानकारियों और पूर्व में हुए प्रोजेक्ट से अवगत कराया हुआ था, तब भी जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली. आधिकारिक जानकारी पुरानी थी और योजनाओं की उपलब्धियों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था. और सबसे जरूरी, लोगों के इन योजनाओं के बारे में विचार योजनाकारों के बिल्कुल उलट है.’

ऐसी स्थिति में स्मार्ट सिटी की योजना में इन कंसल्टेंट्स के पास एक ही रास्ता बचता है कि वे विभिन्न शहरों के लिए बनी योजनाओं में से ही कुछ तथ्य उधार ले लें. ऐसा करना महज नकल करना ही होगा, जिसमें स्थानीय जरूरतों और शहर विशेष की असल स्थितियों की कोई जानकारी नहीं होगी. यानी बिना किसी जानकारी के आधार पर ये सलाहकार इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का काम शुरू कर देंगे भले ही आगे वह स्थानीय आबादी द्वारा इस्तेमाल किया जाए या नहीं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली का ‘बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम’ (बीआरटी) है, जिसकी शुरुआत से ही आलोचना हुई और फिर इसे बंद कर दिया गया.

स्मार्ट सिटी योजना अपरिपक्व है इसलिए जब इसका टेंडर निकाला जाएगा तब सबसे कम बोली लगाने वाला ही जीतेगा और ऐसे में रिसर्च पर होने वाला खर्च अपने आप ही कम हो जाएगा. यहां उन्हें ये भी संदेह रहेगा कि ये सलाहकार कहीं नगर पालिका के साथ कोई मिलीभगत न कर रहे हों. मान लेते हैं अगर स्मार्ट सिटी की योजना का ठेका लेने भर के लिए कोई व्यक्ति 5 लाख रुपये की बोली लगाता है और योजना को क्रियान्वित करने के समय सलाहकार के हिस्से में कटौती कर देता है. विशेषज्ञ कहते हैं कि पहले कुछ मामलों में ऐसा हो चुका है. उनमें से एक ने बताया, ‘कोई भी सलाहकार कुछ लाख रुपयों में स्मार्ट सिटी का प्लान नहीं बना सकता, इसके लिए ऑनलाइन शोध निहायत ही जरूरी है.’

 भारी-भरकम राशि का निवेश

सरकारी आंकड़ों के अनुसार केंद्र आने वाले 5 सालों में 98 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने पर 48 हजार करोड़ रुपये खर्च करेगा यानी औसतन हर शहर पर प्रतिवर्ष लगभग सौ करोड़ रुपये खर्च होंगे. लगभग उतना ही खर्च संबंधित राज्य या नगर निकाय को भी देना होगा. यानी अगले 5 सालों के लिए कुल एक लाख करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध होगी. तो ऐसे में क्या एक स्मार्ट सिटी बनाने के लिए प्रतिवर्ष 200 करोड़ रुपये या पांच सालों के लिए 1 हजार करोड़ रुपये पर्याप्त होंगे? स्पष्ट रूप से नहीं! इसे भी एक उदाहरण से ही समझते हैं. कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन से पहले दिल्ली को बेहतर बनाने के प्रयास में 66,550 करोड़ रुपये लगे थे, जहां 5,700 करोड़ रुपये सिर्फ फ्लाईओवर और पैदल पुलों के निर्माण में खर्च हुए. दिल्ली मेट्रो के विस्तार के लिए 16,887 करोड़ रुपयों की जरूरत पड़ी, वहीं बिजली की सुचारु आपूर्ति के लिए बनाए गए बिजली के नए प्लांटों पर 35 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए.

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अगर ये भी मान लिया जाए कि ये आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं, तब भी ये तो साफ है कि कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान पैसों का बड़ा हेर-फेर हुआ है. ऐसे में वर्तमान सरकार की इस स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए तो एक लंबी समयावधि के लिए दसियों हजार करोड़ रुपयों की जरूरत होगी.

केंद्र भी इस तथ्य से वाकिफ है. स्मार्ट सिटी के फाइनेंस से जुड़े एक दस्तावेज में कहा गया है, ‘ऐसा अनुमान है कि योजना के लिए लगातार पूंजी लगाने की जरूरत होगी.’ केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाला अनुदान तो प्रोजेक्ट की लागत का अंश-भर होंगे, इसलिए इन अनुदानों को आंतरिक और बाहरी स्रोतों से आर्थिक मदद के लिए बढ़ाना होगा. यहां हो सकता है कि आंतरिक स्रोत यूजर फीस और बेनेफिशरी (लाभार्थी) शुल्क बढ़ा दें और बाहरी स्रोत म्युनिसिपल बॉन्ड्स, वित्त संस्थानों से मदद या पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप जैसे माध्यमों की मदद ले सकते हैं.

हालांकि ये सब भी खासी परेशानियों से भरा है. ज्यादातर नगर निगम आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं. दिल्ली के ही तीनों नगर निगमों पूर्वी दिल्ली नगर निगम, उत्तरी दिल्ली नगर निगम और नई दिल्ली नगर निगम को ले लीजिए, इनमें से केवल एक ही को आय मिलती है. पूर्वी और उत्तरी दिल्ली नगर निगम क्रमशः 500 करोड़ और 1 हजार करोड़ के वार्षिक घाटे में चल रहे हैं, वहीं, नई दिल्ली नगर निगम ने वर्ष 2013-14 में 335 करोड़ रुपये का लाभ दर्ज किया है.

योजना के लिए लगातार पूंजी लगाने की जरूरत होगी. केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाला अनुदान तो प्रोजेक्ट की लागत का अंश-भर होगा

अगर स्थानीय निकाय सेवाओं के बदले टैक्स बढ़ा देते हैं तो जाहिर है उपभोक्ताओं में गुस्सा बढ़ेगा, जिससे स्मार्ट सिटी योजना में कही गई ‘सिटीजन-फ्रेंडली’ बात सीधे खत्म हो जाएगी.

जैसे वित्तीय संकट का सामना नगर निकाय कर रहे हैं, उसमें बॉन्ड्स या बाहर से ऋण लेकर धन नहीं जुटाया जा सकता. पिछले कुछ समय में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप भी इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में सक्षम साबित नहीं हुआ है. इस प्रकार स्थानीय निकायों के पास धन जुटाने का जो विकल्प बचता है वह ये कि वे दोतरफा या बहुपक्षीय संस्थाओं के अनुदान के सहारे अतिरिक्त रकम जुटाएं.

स्मार्ट सिटी बनाने की योजना तो अच्छी है पर वर्तमान स्थितियों को देखकर लगता है कि कहीं ये बेवकूफी भरा और सिटीजन- ‘अनफ्रेंडली’ (लोगों के लिए प्रतिकूल) न साबित हो. सरकार को इसी अवधारणा पर रहने की बजाय इससे बेहतर योजना, जो ज्यादा उपयोगी हो, को सोचकर उस पर काम करने की जरूरत है. स्मार्ट सिटी सिर्फ जमीन पर या भौतिक रूप से नहीं बनती, बल्कि लोगों के दिमागों में बनती है. यहां समझने वाली बात ये है कि रोम जैसे बड़े शहर को बनने में पांच या दस साल नहीं लगे थे! अगर वैश्विक रूप से देखा जाए तो अधिकतर स्मार्ट शहरों को बनने में बीस से तीस साल का समय लगा है.

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