तथ्यों पर भारी तेजी

उनकी गिरफ्तारी से पहले ही मीडिया में उनके अपराध के विवरण के साथ उनके कुबूलनामे की खबरें आ चुकी थीं. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने लिखा था कि ‘आतंकवादियों’ ने पाकिस्तान के नंबर पर फोन कॉल करने से पहले गिलानी को कॉल किया था, वहीं ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की हेडलाइन में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को आतंकी योजनाओं का सरगना कहा गया था. जहां ऐसी खबरों ने पहले ही संदिग्धों के खिलाफ एक राय कायम कर दी थी, जी न्यूज के डॉक्यू ड्रामा ‘13 दिसंबर’, जिसमें संसद हमले के पूरे घटनाक्रम का नाट्य रूपांतरण किया गया था, को सरकार की सहमति और समर्थन के बाद प्रसारित किया गया जिसने इन संदिग्धों को आतंकवादी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

जब हाईकोर्ट को गिलानी पर लगे इन आरोपों को साबित करने वाला कोई तथ्य नहीं मिला तो उन्होंने गिलानी और अफ्जान को बरी कर दिया, मगर तब तक बरी हो चुके इन लोगों के लिए अपनी सामान्य जिंदगी में लौटना नामुमकिन हो चुका था. क्या कोर्ट के इन्हें बेगुनाह मानने के बाद लोगों की इनके बारे में राय बदल सकती थी? क्या मीडिया संस्थान अपनी कहानियां वापस ले सकते थे? क्या वो तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने के लिए गिलानी से माफी मांग सकते थे? अफजल इस मामले में बदकिस्मत रहे कि अपनी बेगुनाही साबित कर बरी हो पाने के लिए उन्हें पर्याप्त सुबूत नहीं मिले, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी कि उन्हें ‘सामूहिक अंतःकरण की संतुष्टि’ के लिए मरना ही होगा. अफजल के खिलाफ मीडिया द्वारा हुईं चूकों ने जिस सामूहिक विवेक को जन्म दिया वो दिखाता है कि कैसे प्रेस किसी व्यक्ति के जीने-मरने को प्रभावित कर सकता है.

2013 में इसी तरह का एक और निंदा अभियान टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर तब चला जब ‘इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी’ नाम के एक एनजीओ के कार्यकारी निदेशक खुर्शीद अनवर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे. जबकि इन आरोपों की सच्चाई पर ही संदेह था. सोशल मीडिया और इंडिया टीवी पर लगातार इस मुद्दे पर हो रही बहस ने खुर्शीद अनवर को अपनी जिंदगी खत्म कर देने जैसा गंभीर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया. मीडिया ने आरोपों के आधार पर ही उन्हें बलात्कारी घोषित कर दिया. इंडिया टीवी ने तो अभियान ही शुरू कर दिया था, जिसमें बार-बार ‘औरतों पर अन्याय को बढ़ावा देने वाले आदमी को सजा मिलनी चाहिए’ जैसी बातें पूरी उत्तेजना के साथ कही जा रही थीं, इसके बाद ही खुर्शीद ने अपने घर की छत से कूदकर जान दे दी.

अनवर के शुभचिंतकों, शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों आदि ने मीडिया द्वारा एफआईआर से पहले ही अनवर को बलात्कारी घोषित कर देने की घोर निंदा की. एक फोरम ‘जस्टिस फॉर खुर्शीद अनवर’ की सदस्य अंकिता चंद्रनाथ बताती हैं, ‘रजत शर्मा द्वारा इंडिया टीवी पर अनवर द्वारा किए गए कथित बलात्कार की रिपोर्ट निर्भया कांड के ठीक एक साल बाद पेश की गई थी. मीडिया को दिसंबर तक इंतजार करने की क्या जरूरत थी जब कथित बलात्कार का मामला सितंबर की शुरुआत का था? इंडिया टीवी की रिपोर्ट पूरी तरह से एकपक्षीय थी. यहां तक कि उस लड़की का अनवर के खिलाफ बयान हद दर्जे तक संपादित था, साथ ही चैनल आक्रामक रूप से उसे ‘दूसरी निर्भया’ के नाम से प्रसारित कर रहा था.’ 2008 में हुए मुंबई हमले की बात  करें तो उस समय ऐसी खबरें भी आई थीं कि सेना की कार्रवाई का सीधा प्रसारण आतंक फैलाने वालों के आका देखकर आतंकियों को निर्देश दे रहे थे. इसी तरह पिछले दिनों गुरदासपुर में हुई आतंकी वारदात के समय खुफिया विभागों को समाचार चैनलों से सीधा प्रसारण न करने की अपील करनी पड़ी थी. ऐसे में मीडिया संस्थानों को इस बात पर भी सोचने और ध्यान देने की जरूरत है कि उनकी सीमाएं किस हद तक हैं और कहीं इससे किसी व्यक्ति विशेष या फिर राष्ट्र का हित तो नहीं प्रभावित हो रहा है.

विश्वस्त सूत्रों के हवाले से

दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘अकेले रिपोर्टर को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता. सूत्रों पर आधारित पत्रकारिता इसके खतरों के बावजूद खबरें इकठ्ठा करने का एक महत्वपूर्ण साधन है. और जहां संवाददाताओं की अपराध की वास्तविक स्थिति तक सीधी पहुंच नहीं है, तथ्यों की कोई जानकारी नहीं है, वहां उन्हें अधिकारियों द्वारा उनके हितों के अनुरूप चुने गए तथ्यों पर ही निर्भर रहना पड़ता है. तथ्यों की इस चयनात्मक प्रस्तुति से कई बार बड़े नाटकीय निष्कर्ष निकलते हैं. एक टीवी न्यूजरूम के अंदर जो कहानियां हेडलाइन बनती हैं वो सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती हैं. अगर एक चैनल किसी घटना पर संतुलित रिपोर्ट दिखाता है और दूसरा चैनल उसी खबर को सनसनीखेज तरीके से दिखाता है तो दर्शकों का ध्यान उस सनसनीखेज रिपोर्ट पर ही जाएगा, जिससे टीआरपी भी बढ़ती है और साथ ही विज्ञापनों से आने वाला धन भी. कॉरपोरेट घरानों द्वारा चलाए जा रहे इस क्षेत्र में कई बार रिपोर्टरों को अनाम स्रोतों के नाम पर ऐसी कहानियां गढ़ने को कहा जाता है, जिससे चैनल की टीआरपी बढ़ाई जा सके. यहां पर इन अनाम सूत्रों पर भी सवाल उठता है, जिन्हें अमूमन ‘उच्च पदस्थ’ बताया जाता है. सरकारी महकमों के सूत्र सामान्यतया अपना नाम बताने से बचते हैं, ऐसे में कहानियां गढ़ने में और आसानी हो जाती है.

वर्तमान में मीडिया के किसी हत्या, बलात्कार की रिपोर्टिंग में लांघी गई नैतिकता की सीमाओं के एवज में चैनल सिर्फ चुप्पी साध लेता है.

 

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जहां निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

भारतीय मीडिया संस्थान केवल सनसनीखेज खबरें देते हैं ये कहना भी सही नहीं होगा. चार ऐसे मामले जहां न्याय की लड़ाई में पत्रकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है

 

  • जेसिकालाल हत्याकांड के मुख्य आरोपी को बरी करने के विरोध में एक अनाम एसएमएस विभिन्न मीडिया संस्थानों में पहुंचा और मीडिया के ढेरों लोग इंडिया गेट पर कैंडल लाइट मार्च के रूप अपना विरोध दर्ज कराने पहुंच गए. 1999 में दिल्ली के एक रेस्तरां-बार में हरियाणा के एक सांसद के बेटे मनु शर्मा ने 200 लोगों के सामने जेसिकालाल की गोली मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने देर रात शराब परोसने से मना कर दिया था. इस हाई प्रोफाइल मामले में मीडिया द्वारा बनाए गए दबाव के फलस्वरूप अदालत ने उसके सांसद पिता के प्रभाव को नजरअंदाज करके सजा सुनाई थी.
  • नीतीश कटारा की उस समय हत्या कर दी गई जब उनके भारती यादव से प्रेम संबंध के बारे में भारती के घरवालों को पता चला. 2002 में हुआ यह मामला ऑनर किलिंग का था. उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव के बेटों विशाल और विकास यादव ने नीतीश की हत्या की क्योंकि वे अलग जाति के थे. विकास यादव इस मामले में अपने पिता के प्रभाव के कारण साफ बचकर निकल गए होते अगर एनडीटीवी चैनल उसके इकबाल-ए-जुर्म की ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने नहीं लाया होता.
  • एस. मंजूनाथ इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन में ग्रेड ‘ए’ के अधिकारी थे . 2005 में, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में मंजूनाथ ने दो पेट्रोल पंपों को मिलावटी पेट्रोल बेचने के संदेह के चलते सील कर दिया था. मंजूनाथ की हत्या इसलिए हुई क्योंकि वे महीने भर पहले ही खुले एक पेट्रोल पंप का औचक निरीक्षण करने से पहुंच गए थे. इस केस में पेट्रोल पंप के मालिक पवन कुमार मित्तल सहित छह लोगों को दोषी घोषित किया गया. मंजूनाथ को मिले इसे न्याय का श्रेय उन कार्यकर्ताओं और मंजूनाथ षणमुगम ट्रस्ट को जाता है जिन्होंने इतने लंबे समय तक इस केस को जिंदा रखा.
  • संजीव नंदा को 1999 के हिट एंड रन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल की सजा सुनाई पर 2 साल बाद ही उन्हें छोड़ दिया गया. नशे में धुत संजीव ने तीन पुलिसकर्मियों सहित छह लोगों को बीएमडब्ल्यू कार से कुचल दिया था, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई थी. यदि मीडिया का दबाव न होता तो अपने दादा एसएम नंदा (पूर्व नेवी प्रमुख) के रसूख के चलते संजीव को बरी कर दिया गया होता.

निकिता लांबा

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