भारत एक देश नहीं विचार है

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1988

आज जो भारत है वह कभी एक देश था ही नहीं. लोक में अपने गांव से सौ कोस से आगे की जगह परदेस हो जाती है, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र और तमिलनाडु ही नहीं लगभग सभी राज्यों के पुराने नामों को याद किया जाए तो इतिहास में छिपे कई देश झिलमिलाने लगते हैं, कम से कम जितनी भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज है उतनी उपराष्ट्रीयताएं तो अब भी मौजूद हैं. इनमें से कई एक-दूसरे से टकराती भी हैं. एक ढीला-ढाला राष्ट्रवाद स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ते हुए उसी रेल, डाक और तार के जरिए यानी आपसी मेलजोल के नए अवसरों से बना था जो हमें गुलाम बनाने वालों ने अपने व्यापारिक मुनाफे को संगठित और अकूत बनाने के लिए मुहैया कराए थे. राष्ट्रवाद को जीवित रहने के लिए हमेशा एक साझा दुश्मन चाहिए होता है लिहाजा चीन और पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध के समय इसका उभार देखा गया. जब तक साम्राज्यवाद के विरोध का हैंगओवर था हमें ‘आमार नाम तोमार नाम वियतनाम’ कहने से भी परहेज नहीं था लेकिन ग्लोबलाइजेशन और नई आर्थिक नीतियों को सहर्ष लागू करने के बाद वही साम्राज्यवादी शक्तियां फिर से हमारी नीतियां ही नहीं तय करने लगीं, हमारा मानस भी बदल डाला और हम भारतीय उनकी भाषा, पहनावे, खानपान और संस्कृति अपनाने को तरक्की कहने लगे.

अगर विडंबना कोई सड़क है तो अब हम उस मोड़ पर खड़े हैं जहां साम्राज्यवाद के आगे घुटने टेक देने के पाप पर पर्दा डालने के लिए और अपनी मिथकीय सनकों को फलीभूत करने के लिए राष्ट्रवाद को मुसलमानों, ईसाईयों और अन्य धार्मिक समूहों से नफरत पर आधारित करने की कोशिश की जा रही है. यह दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों से नफरत यानी जाति आधारित भी हो सकता था लेकिन खुद घृणा के सौदागर ही इतनी भाषाएं बोलते हैं, एक-दूसरे के रीति रिवाजों से अनजान हैं, इतनी ऊंच-नीच है कि उनमें एका संभव नहीं है.

भारत अब तक इतने अंतर्विरोधों के बावजूद नाजुक संतुलन से इसलिए बंधा हुआ है कि वह देश नहीं एक विचार है जिसका मूल विविधता, भिन्नता, अनेकता का सम्मान करने में है. यही भारतीयता है जिसे हिंदू पादशाही स्थापित करने की सनक पाले लोग देखना नहीं चाहते.

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