लोकतंत्र पर हावी मूर्खतंत्र

हाल ही में नीलॉय नील नाम से लिखने वाले एक ब्लॉगर की नृशंस हत्या कर दी गई. उनका असली नाम नीलाद्री चट्टोपाध्याय था. 27 साल के नील ने ढाका विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एमए किया था. वे एक पढ़ाकू व मेहनती छात्र थे जिसने  प्रथम श्रेणी से एमए पास किया था. वे अच्छा लिखते थे, पढ़े-लिखे और जागरूक थे. हत्या से पहले उन्हें जान से मार देने की धमकी मिली थी. उन्होंने लिखा भी था कि उनका पीछा किया जाता है.

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फोटो- एएफपी

दो महीने पहले पुलिस से मिलकर उन्होंने उन लोगों के खिलाफ केस दर्ज कराया था, जो कथित रूप से उनका पीछा कर रहे थे. उन्होंने बताया कि उनकी सुरक्षा को खतरा है. पुलिस ने उन्हें देश छोड़ देने की सलाह दी थी लेकिन नील की ऐसी कोई योजना नहीं थी. वे अपने देश में ही जिंदा रहने के रास्ते खोज रहे थे. इन स्थितियों के बावजूद बांग्लादेश सरकार ने उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. सरकार एक अच्छे उदारवादी युवा को बचाने की बजाय अपने हाथ जेब में डालकर चुपचाप तमाशा देखती रही.

इससे पहले भी इस संगठन ने  कई  दूसरे ब्लॉगरों की हत्या करने की जिम्मेदारी भी ढिठाई से ली है. इसके बावजूद पुलिस का दावा था कि हत्यारों का कोई भी सबूत उन्हें नहीं मिला है. ऐसा लग रहा है कि पुलिस इस बात का इंतजार कर रही है कि हत्यारे खुद आगे आएं और जिम्मेदारी लें, ‘हमने सारी हत्याएं की हैं, हमें गिरफ्तार किया जाए.’ इसके बावजूद भी शायद उनकी गिरफ्तारी के लिए ये सबूत काफी नहीं होगा.

मैं डरती हूं उस दिन के बारे में सोच कर कि कहीं वे मुसीबतें हरने वाली हमारी ‘देवी’ खुद हसीना पर न ही झपट पड़ें. जो भी आवाज उठाएगा उसका हश्र नील के जैसा  ही होगा. पर शायद हमें खून-खराबा देखने की आदत पड़ चुकी है, इसलिए ऐसे दृश्य अब हमें झकझोरते नहीं हैं.

नील के कमरे में अब सिर्फ किताबें अौर खून बचा है. अगर आप खूब पढ़ने-लिखने वाले एक सजग किस्म के व्यक्ति हैं, विचारों की आजादी में यकीन रखते हैं, धार्मिक अंधविश्वासों और भेदभाव पर उंगली उठाते हैं तो आपका खून भी इसी तरह बहाया जाएगा. इसलिए बांग्लादेश में जिंदा रहने के लिए आपको मूर्ख होना पड़ेगा. बहुत ज्यादा बुद्धिमत्ता दिखाने से काम नहीं चलेगा. बेहतर है आप आस्थावान होकर रहें, लेकिन आस्थाहीन कतई भी न रहें. सिर्फ इंसान होना कोई विकल्प नहीं है.

किसी समय नील कुछ युवाओं द्वारा बनाए एक मानवाधिकार मंच ‘तस्लीमा समर्थक समूह’ के सदस्य हुआ करते थे. मैंने फेसबुक पर उनकी पोस्ट की गई रचनाएं पढ़ी हैं. हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म, इस्लाम- इन सभी धर्मों पर उनकी आलोचनात्मक नजर रहती थी. हिंदुओं ने उन्हें नहीं मारा, न ही बौद्धों ने, न ईसाईयों ने और न ही यहूदियों ने उन पर हमला किया, सिर्फ और सिर्फ इस्लाम के कट्टर अनुयायियों ने उन्हें मार डाला. जो यह मानते हैं कि सभी धर्म समान हैं और विभिन्न पंथों व रूढ़िवादी अनुयायियों में कोई फर्क नहीं है, वे सभी जरूर गलत हैं.

बांग्लादेश के इंस्पेक्टर जनरल और गृह मंत्री ने यह घोषणा जारी की थी कि ब्लाॅगरों को अपने लेखन से जनसाधारण की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए अन्यथा उन्हें 14 वर्ष की कड़ी कैद की सजा का सामना करना पड़ेगा.  देश की गठबंधन सरकार में शामिल उलेमाओं के समूह मांग कर रहे हैं कि ब्लाॅगरों को फांसी पर लटकाया जाना चाहिए, उनके ब्लाॅगों को बंद किया जाना चाहिए और उन्हें देश निकाला दे देना चाहिए. हालांकि सरकार ने ऐसा कोई प्रारूप नहीं बनाया है जिसमें धर्म के विरुद्ध लिखने पर कोई कानूनी कदम उठाया जाएं.

मैं ये जानने के लिए उत्सुक हूं कि राज्य के गुस्से को भड़काने के लिए कौन से धर्म के खिलाफ लिखा जाना चाहिए. क्या हिंदू रवायतों की आलोचना करने पर गिरफ्तारी होगी? या शायद बौद्ध धर्म के सिद्धांतों की निंदा करने पर? या फिर ईसाई धर्म की आलोचना पर? हालांकि इस मुद्दे पर राज्य की स्थिति टाल-मटोल करने वाली है. आज के समय में हम सभी जानते हैं कि किसी भी धर्म के बारे में कुछ भी कहने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता लेकिन इस्लाम के खिलाफ एक शब्द कहना या लिखना मात्र ही पुलिस को आपके दरवाजे पर भेज सकता है.

राज्य के पास साहस (दुस्साहस) की कोई कमी नहीं है. यहां तक कि आधिकारिक तौर पर यह घोषणा की जा सकती है कि केवल इस्लाम की आलोचना करने भर से ही आपको परेशान, प्रताड़ित, गिरफ्तार या कैद किया जा सकता है. यहां तक कि ऐसे गुनहगारों को मौत की सजा भी दी जा सकती है. इस्लामी आतंकवादियों और बांग्लादेश की सरकार के बीच फर्क करना इन दिनों कठिन होता जा रहा है. जैसा कि मैं साफ-साफ देख पा रही हूं धार्मिक कट्टरपंथी किसी को भी मार रहे हैं और सरकार उनकी कठपुतली बनकर रह गई हैै.

बांग्लादेश में आजाद सोच वाले तार्किक लोगों को मार डालने के किए एक निश्चित तरीके का इस्तेमाल किया जा रहा है. हत्या के बाद हत्यारे अपनी पहचान सार्वजनिक करते हैं, साथ ही उन समूहों की भी पहचान बताते हैं, जिनसे वे जुड़े हैं. हालांकि मैं यकीनी तौर पर नहीं कह सकती लेकिन मुझे लगता है कि वे अपने फोन नंबर और पता भी सार्वजनिक करते होंगे. हालांकि इन सबके बावजूद पुलिस उन्हें छू भी नहीं पाती.

पहले हत्याएं रात के सन्नाटे में सड़कों पर हुआ करती थीं लेकिन अब उनके हौसले और बढ़ गए है. अब वे दिनदहाड़े घर में घुसकर लोगों की हत्या कर रहे हैं. अब तक तो हत्यारों को जुर्म करने के बाद घटनास्थल से भाग जाने की आदत है लेकिन वह दिन दूर नहीं जब उन्हें ऐसा करने की जरूरत ही नहीं रहेगी. किसी भी किस्म के परदे की जरूरत न रहने पर वे जीत का जश्न मनाते हुए ब्लाॅगरों के घर में घुसेंगे, उन्हें मार डालेंगे और फिर निडर होकर आराम से घर से बाहर निकल जाएंगे. इसके बाद सड़क किनारे लगी चाय की किसी दुकान पर चाय पिएंगे अौर इन सब के बावजूद काेई भी उनका बाल बांका करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा. भविष्य में ऐसा ही खतरनाक समय हमारी राह देख रहा है. तब न केवल ब्लाॅगर बल्कि कोई लड़की जो बुर्का न पहने हो या कोई जोड़ा जो पार्क में हाथों में हाथ डाले बैठा हो, उन्हें पकड़कर उनके टुकड़े कर, गलियों में फैला दिया जाएगा. जो भी धार्मिक कानून व्यवस्था को नहीं मानेगा उनकी सरेआम हत्या की जाएगी. आज हमारा देश ऐसे ही घातक समय की ओर  बढ़ रहा है. इतिहास में ऐसे समय को अंधयुग अथवा इस्लामी शरिया के युग के रूप में याद किया जाएगा.

हर ब्लाॅगर के पास धमकी भरा फोनकॉल आने के बाद स्थिति ये होती है कि दूसरे दर्जन भर लोग ब्लॉग लेखन बंद कर देते हैं. किसी ब्लाॅगर की हत्या के बाद सैकड़ों ब्लाॅगर अपना ब्लाॅग बंद कर देते हैं. आज के समय में बांग्लादेश का सूरत-ए-हाल यही है. इसी तरह बांग्लादेश का अल्पजीवी तर्कवादी आंदोलन और ‘तर्क का युग’ अपने अंत की ओर बढ़ रहा है. देश के कलाकारों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों अथवा तर्कवादियों में से कोई भी आगे आकर इन नास्तिक ब्लाॅगरों के समर्थन में नहीं बोल रहा है.

यह मुझे 22 वर्ष पहले की याद दिलाता है, जब मेरे समर्थन में बहुत कम लोग थे. यह एक तरह से एक औरत बनाम पूरा देश था, जिसमें असक्षम सरकार भी शामिल थी. लाखों की संख्या में कट्टरपंथी शहर में दहाड़ रहे थे और मेरे खून के प्यासे थे. उनके दबाव को रोकने की जगह मेरे ही खिलाफ केस दर्ज किया गया. उस समय आईटी अधिनियम नहीं था और दंड संहिता की धारा 295 ही किसी भी लेखक को मौत के घाट उतारने के लिए काफी थी.

केवल कुछ मुठ्ठीभर रौशनख्याल बुद्धिजीवियों ने गुप्त रूप से मुझे समर्थन दिया लेकिन इस किस्म की कायर शपथ किसी काम की नहीं थी. अगर उस समय इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन होते और सारे देश से केवल 500 लोग मेरी अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में उतर जाते तो कोई भी मेरे देश से मुझे बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर सकता था.

दो दशक बाद आज फिर वैसी ही स्थितियां खुद को दोहरा रही हैं. आज भी इन प्रगतिशील ब्लाॅगरों की हत्या के खिलाफ देशभर में कहीं भी प्रदर्शन होने का कोई संकेत नहीं मिल रहा है. सभी चूहों की तरह अपने-अपने बिलों में छिपे हुए हैं. यहां तक कि प्रबुद्ध और शिक्षितों की गिनती में आने वाले भी भूमिगत हो गए हैं. ऐसे में हैरानी नहीं कि जाहिल सरकार और भी ज्यादा जाहिल समूहों की चापलूसी में कोई कसर नहीं छोड़ रही. लोकतंत्र बांग्लादेश को छोड़ चला है, अब जो बचा है, वो है भीड़तंत्र/मूर्खतंत्र.

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