आईआरसीटीसी में शोषण का सिलसिला

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आईआरसीटीसी के पिटारे में और भी कई विवाद बंद हैं. विवाद ठेका कर्मचारियों के स्थायीकरण को लेकर भी है. जिस विभाग की हम बात कर रहे हैं, वर्तमान में उसमें 322 कर्मचारी कार्यरत हैं जिनमें से 265 ठेका कर्मचारी हैं. इनकी मांग है कि इन्हें स्थायी किया जाए और ‘समान काम, समान वेतन’ की तर्ज पर स्थायी कर्मचारियों के जितना वेतन दिया जाए. लेकिन प्रबंधन इसके लिए राजी नहीं है. आईआरसीटीसी के जनसंपर्क अधिकारी संदीप दत्ता कहते हैं, ‘वे हमारे कर्मचारी हैं ही नहीं. वे आउटसोर्स किए गए हैं. हम तो उन्हें ठेकेदारों के मार्फत रखते हैं. जब भी हमें मानव संसाधन की जरूरत होती है, हम अपने ठेकेदारों को बताते हैं. हमारी जरूरत के अनुसार वे हमें योग्य कर्मचारी उपलब्ध करा देते हैं. जब हमारा काम हो जाता है तो हम उन्हें रिलीव कर देते हैं. वे ठेकेदार के लिए काम करते हैं न कि हमारे लिए. तो फिर उन्हें हम कैसे स्थायी कर सकते हैं?’

इसके उलट, गिरीश कुमार निराला, जो 2005 से आईआरसीटीसी से जुड़े रहे, बताते हैं, ‘हम कोई ठेका कर्मचारी नहीं हैं. हम किसी ठेकेदार के मार्फत नहीं आए थे. हम सभी को आईआरसीटीसी प्रबंधन ने नियुक्त किया था. बाकायदा प्रबंधन के अधिकारियों द्वारा हमारा साक्षात्कार लिया गया था. साक्षात्कार से लेकर भर्ती तक व आगे की सभी संस्थागत औपचारिकताएं आईआरसीटीसी प्रबंधन ही पूरी करता है. मैं दस साल से ज्यादा समय से काम कर रहा हूं और किसी ठेकेदार के जरिए नहीं आया था, हम सब सीधे प्रबंधन द्वारा नियुक्त किए गए थे. हमें तो बाद में पता चला कि आईआरसीटीसी ने हमें किसी ठेकेदार के हवाले कर दिया है.’ सुरजीत श्यामल बताते हैं, ‘वेतन कम देने के लिए ठेकेदार को केवल कागज पर दिखाया जाता है. ठेका कर्मचारियों के बिना जानकारी के ठेकेदार साल दो साल में बदल जाते हैं पर ठेका कर्मचारी वही रहते हैं. जो भी नया ठेकेदार आता है, वह ठेका कर्मचारियों का पंजीकरण नए सिरे से कराता है जिससे वे नए कर्मचारी बन जाते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि दस-दस सालों से अधिक समय से कंपनी से जुड़े कर्मचारियों को ग्रेच्युटी से वंचित रखा जा सके. आईआरसीटीसी की यह नीति ठेका मजदूर कानून 1970 का खुला उल्लंघन है.’

इन कर्मचारियों का यह भी दावा है कि 2014 तक आईआरसीटीसी ठेका मजदूर कानून 1970 के तहत पंजीकृत ही नहीं था और न ही इसके किसी ठेकेदार के पास लाइसेंस था. इस तरह तो उसके अपने बचाव में किए जा रहे सारे दावे गलत हैं. प्रबंधन को समस्या कर्मचारियों के यूनियन बनाने को लेकर भी है. अगर यहां के कर्मी यूनियन का गठन कर लें या उनकी सदस्यता ले लें तो उन्हें प्रताड़ित करने में प्रबंधन कोई कसर नहीं छोड़ता. सुरजीत श्यामल ने जब एक ऐसा ही प्रयास किया और समान काम, समान वेतन की मांग उठाई तो उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ गया था. सुरजीत बताते हैं, ‘हम सभी ने यूनियन का गठन किया था और अपनी मांगें प्रबंधन के सामने रखीं. प्रबंधन को यह रास नहीं आया. यूनियन को तोड़ने के लिए मुझे नौकरी से निकाल दिया गया. जो कारण दिया गया, वह स्वीकार करने योग्य नहीं था. उन्होंने कहा कि वे मेरे काम से संतुष्ट नहीं थे. जबकि मुझे खुद प्रबंध निदेशक ने मेरे अच्छे काम के लिए ‘मेरिट अवॉर्ड’ से सम्मानित किया था. मैं उनके इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट गया तो मेरी पत्नी को प्रताड़ित किया जाने लगा, जो मेरे साथ ही वहां काम करती थी.’

अपने खिलाफ उठती आवाज को प्रबंधन किस तरह दबाता है, इसकी एक और बानगी हरीश जोशी हैं. वे 2006 से आईआरसीटीसी से जुड़े हैं. वे कहते हैं, ‘जब से हमने प्रबंधन से स्थायीकरण और समान काम, समान वेतन की मांग की, तब से हमारी वेतन वृद्धि भी रोक दी गई. सुरजीत को पहले ही नौकरी से निकाल दिया गया था, हमारे खिलाफ भी ऐसी कोई कार्रवाई न की जाए यह सोचकर हमने फिर ज्यादा विरोध नहीं किया.’ सुरजीत कहते हैं, ‘एमसीए, बीसीए पास लोग दस-दस सालों से यहां काम कर रहे हैं, तब भी उन्हें न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है. जहां एक आठवीं पास सरकारी चपरासी बीस-बाईस हजार रुपये वेतन पाता है, वहीं हमें कई डिग्री और डिप्लोमा होने के बावजूद दस-बारह हजार रुपये में संतोष करना पड़ता है. मेरी मांग इस असमानता के खिलाफ थी.’

आईआरसीटीसी में ठेका कर्मचारियों के शोषण की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती. इन कर्मचारियों का कहना है कि कर्मचारी भविष्य निधि में नियोक्ता का जो अंशदान होता है, वह भी उनके वेतन में से काट दिया जाता था. सुरजीत कहते हैं, ‘जब इसके खिलाफ कर्मचारी लामबंद हुए तब प्रबंधन जागा. लेकिन कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) में जो नियोक्ता का अंशदान होता है वो अब भी कर्मचारियों के वेतन में से ही काटा जाता है. ऐसा इसलिए है कि प्रबंधन ने जिन ठेकेदारों के हवाले कर्मचारियों को कर दिया है उनके पास भविष्य निधि खाता तक नहीं है.’ वहीं कहने को तो आईआरसीटीसी ‘रेल नीर’ का पानी सबको पिलाता है लेकिन अपने ही कर्मचारियों को पिलाने के लिए उसके पास साफ पानी नहीं है. लगभग सभी कर्मचारी अपने घर से ही पीने के पानी का इंतजाम करके चलते हैं. वे बताते हैं, ‘दफ्तर के पीने के पानी में कॉकरोच पड़े होते हैं. अगर घर से पानी का इंतजाम करके ले जाना भूल जाएं तो सारा दिन प्यासा ही रहना पड़ता है.’

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दिल्ली महिला आयोग से नहीं मिली राहत

आईआरसीटीसी में महिलाओं के साथ हो रहे अमानवीय बर्ताव पर दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) ने उदासीन रवैया अपना रखा है. सुरजीत ऐसा मानते हैं. उनका कहना है, ‘शौचालय की समस्या को लेकर हमने डीसीडब्ल्यू का भी दरवाजा खटखटाया था. पहले सोनिका ने शिकायत की थी. उसके बाद सितंबर में यहां की 19 महिला कर्मचारियों ने आयोग को एक पत्र लिखकर अपनी पीड़ा बताई थी. लेकिन आयोग द्वारा कार्रवाई के लिए तय समयसीमा में समस्या का कोई भी निराकरण नहीं किया गया. 18 दिसंबर को हमने अपनी शिकायत की स्थिति जानने के लिए आरटीआई लगाई. इसका जवाब हमें 1 जनवरी को मिला जिसमें आयोग ने कहा कि उसे इस संबंध में कोई शिकायत नहीं मिली है. लेकिन 22 दिसंबर को ही आयोग आईआरसीटीसी को उसी शिकायत पर कार्रवाई करने के लिए नोटिस भेज चुका था. अगर शिकायत मिली ही नहीं थी तो नोटिस किस बात का भेजा?’

जिस नोटिस का जिक्र सुरजीत कर रहे हैं उसी के बाद 92 कर्मचारियों पर गाज गिरी थी. सुरजीत बताते हैं, ‘बीते 29 जनवरी को हमने फिर से महिला आयोग के संज्ञान में ये बात लाई कि शिकायत करने वाले कर्मचारियों सहित समर्थन में बोलने वाले कर्मचारियों को भी नौकरी से निकाल दिया गया है. तब से ही हम डीसीडब्ल्यू की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल से मिलने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन हमें फोन करके ऑफिस बुलवा लिया जाता है और घंटों इंतजार के बाद भी उनसे मुलाकात नहीं हो पाती.’

हालांकि स्वाति मालीवाल इस सबसे इनकार करती हैं, वे कहती हैं, ‘काफी दिनों से इनका विवाद सुनने में आ रहा था. मैंने खुद ही इस मामले का संज्ञान लिया. आईआरसीटीसी से संबंधित तीन शिकायतें हमारे पास आई थीं. दो व्यक्तिगत मामले थे और एक हालिया मामला था जिसमें उनकी शिकायत है कि हमें नौकरी से निकाल दिया गया. इन तीनों मामलों में से पहले दो मामले मानसिक प्रताड़ना और यौन शोषण से संबंधित थे. इन दोनों पर ही हमें जितना अधिकार था वो हरसंभव कार्रवाई हमने की. आईआरसीटीसी में एक शिकायत समिति का गठन कराया. इसके बाद भी अगर उन्हें कोई समस्या थी तो उन्हें वापस हमारे पास आना चाहिए था. तीसरा मामला लेबर से संबंधित था. उनका कहना है कि हमें निकाल दिया गया. यह तो एडमिनिस्ट्रेटिव मसला है. इसके लिए उन्हें लेबर कोर्ट में जाना चाहिए. इसमें दिल्ली महिला आयोग क्या कर सकता है? हमने उन्हें यही बोला कि आप लेबर कोर्ट जाइए, वहीं इस पर आपको न्याय मिल सकेगा. दिल्ली महिला आयोग तो उनसे बार-बार कह रहा है कि अगर आपकी कोई समस्या है तो हमें बताएं.’ लेकिन सुरजीत के अनुसार, 25 फरवरी को भी वे और चार अन्य महिलाकर्मी आयोग के बुलावे पर वहां पहुंचे लेकिन घंटों तक इंतजार करने के बाद भी जब मुलाकात नहीं हुई तो उन्हें जबरन ऑफिस में दाखिल होना पड़ा. वे बताते हैं, ‘इस पर मालीवाल भड़क गईं और कहा कि वे जब चाहें जिससे चाहें मिलें और बिना किसी सुनवाई के वहां से हमें जबरन भगा दिया गया.’

अनामिका के मामले में तो और भी ज्यादा संवेदनहीनता का परिचय आयोग ने दिया. अनामिका और आईआरसीटीसी प्रबंधन को आमने-सामने बैठाकर की गई सुनवाई में आयोग की सदस्य फरहीन मलिक मौजूद थीं. अनामिका का आरोप है कि फरहीन मलिक ने न सिर्फ प्रबंधन का पक्ष लिया बल्कि उन्हें सबके सामने बेइज्जत भी किया गया. वे बताती हैं, ‘जब खुद प्रबंधन ही मेरे पति को जान से मारने और मेरी बेटी को अगवा करने की धमकी दे रहा था तो मैं किससे शिकायत करती? लेकिन फरहीन मुझसे कहती हैं कि आपको आयोग में आने से पहले प्रबंधन स्तर पर ही मामला निपटाना था. मैंने उन्हें अपनी समस्या बताई तो उन्होंने कहा कि आप जिस प्रबंधन से टकरा रही हैं, वो आप जैसों को यूं ही खरीद लेता है.’

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संदीप दत्ता इन सभी आरोपों को झुठलाते हुए कहते हैं, ‘हम कस्टमर केयर विभाग को आउटसोर्स कर रहे हैं. इसका पूरा काम एक बड़ी कंपनी के हवाले करने जा रहे हैं. वही इसका संचालन करेगी. इसी कारण हमने 1 फरवरी से 92 कर्मचारियों को सेवामुक्त कर दिया, जिसके चलते वे कर्मचारी हम पर झूठे आरोप लगा रहे हैं ताकि प्रबंधन दबाव में आकर अपना फैसला बदल ले.’ पर जब उनसे समस्यावार स्पष्टीकरण मांगा गया तो वे कई सवालों के जवाब यह कहते हुए टाल गए कि उन्हें उस बारे में जानकारी नहीं है. जब हमने उन सवालों के जवाब जीजीएम सुनील कुमार और सुपरवाइजर ममता शर्मा से जानना चाहा तो उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.

संदीप दत्ता के स्पष्टीकरण पर सुरजीत कहते हैं, ‘अब खुद को सही दिखाने के लिए उन्हें कोई तो बहाना चाहिए. इसलिए कस्टमर केयर विभाग को आउटसोर्स करने की बात कह रहे हैं. आईआरसीटीसी के गठन के बाद से पहली बार उसके कर्मचारी अपने वाजिब हक की मांगों के लिए एकजुट हुए हैं. वह उन्हें रास नहीं आ रहा. इसलिए वे कर्मचारियों की इस यूनियन को तोड़ना चाहते हैं. जो भी कर्मचारी उनके खिलाफ सिर उठाता है, उसे निकाल बाहर करते हैं. विभाग को आउटसोर्स करने के बहाने पहले भी ऐसा प्रयास किया गया था लेकिन उनकी चाल भांपकर हमने अदालत का रुख कर लिया था.’ अनामिका कहती हैं, ‘यहां का यही नियम है कि अगर एक कर्मचारी के समर्थन में दूसरा खड़ा हुआ तो दोनों को निकाल बाहर करो ताकि आगे वह किसी तीसरे को न प्रभावित कर सके.’

बहरहाल पीड़ित कर्मचारी मामले को श्रम अदालत में ले गए हैं. साथ ही केंद्रीय श्रम मंत्री और रेल मंत्री से भी निरंतर संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं. आईआरसीटीसी के आगे भी उनका प्रदर्शन जारी है. इस बीच सुनने में यह भी आ रहा है कि आईआरसीटीसी में जो गार्ड और सफाईकर्मी तैनात हैं पहले उन्हें न्यूनतम वेतन से भी 2000 रुपये कम दिए जाते थे लेकिन जब मामले ने तूल पकड़ा तो उन्हें न्यूनतम वेतन दिया जाने लगा पर अधिकारियों ने साफ कह दिया कि हर गार्ड और सफाईकर्मी को अपने बढ़े वेतन में से 500 रुपये उन्हें देने होंगे, अन्यथा उन्हें नौकरी से निकाल देंगे.