‘डोंगी से यात्रा में बार-बार महसूस हुआ कि आगे बढ़ना मुश्किल है’

नहीं, मैं कभी दोबारा नहीं जा पाया.

लोग बताते हैं और मुझे भी याद है कि मुंगेर, भागलपुर और साहेबगंज वाले इलाके में गंगा का पाट बहुत चौड़ा होता था?

हां, राजमहल वाले इलाके में गंगा अपने व्यापक रूप में थी और एक किनारे से दूसरा किनारा नहीं दिखाई देता था. मुझे लगभग चार दशक बीत गए तो इस बीच गंगा में कितना पानी बह गया कैसे बताऊं? जाहिर है बहुत से बदलाव आए होंगे.

आपने इसके अलावा और कौन-कौन सी यात्राएं की हैं?

इस यात्रा से पहले मैं साइकिल से लखनऊ से काठमांडू गया और काठमांडू से लखनऊ वापस भी आया था. उस यात्रा के अनुभव मैंने ‘पहियों के इर्द-गिर्द’ किताब में दर्ज किए. वह किताब 1976 में ही प्रकाशित हो गई थी. मैंने नेवी वालों के साथ बनारस से बलिया तक नाव से यात्रा की. डोंगी से दिल्ली से कोलकाता तक की यात्रा करने से पूर्व दो अन्य यात्राएं मैंने की.

आप किताब में जिस इलाके के बारे में लिख रहे होते हैं, वहां की भाषा का छौंका भी डालने की कोशिश करते हैं?

जहां तक अलग-अलग इलाकों की भाषा एवं बोलियों के जिक्र का सवाल है तो मैं स्कूल के दिनों से डायरी लिखने का आदी रहा हूं. जिस इलाके से गुजरता था अपने काम की बातें वहां की भाषा में लिख लेता था. मेरे मां-पिता दोनों ही पढ़े-लिखे थे. घर में किताबें बहुत थीं. मेरी भी पढ़ने में दिलचस्पी शुरू से रही. मेरे पिताजी कहते थे कि खूब घूमो. घुमक्कड़ी से ज्ञान बढ़ता है. घूमने के साथ-साथ मैं डायरी भी लिखता था, अगर डायरी नहीं लिखता होता तो शायद यह किताब भी आज नहीं होती. डायरी में नोट लेने के बाद जब लिखने बैठा तो जिस इलाके के बारे में लिख रहा होता तो उसके बारे में उस इलाके के लोगों से पूछ लेता. मैंने अगर आगरा के आसपास की भाषा में कुछ लिखा तो अमृतलाल नागर से पूछ लिया या उन्हें दिखा दिया. उनका संबंध आगरा से बहुत गहरा रहा है. मैं इस तरह की मदद उनसे तो लेता ही था और दूसरों से भी लेने में कभी संकोच नहीं करता था. अब चंबल गए तो वहां के मेरे मित्र चंदू यादव मेरे साथ हो लिए. वे उसी इलाके इटावा के थे. उनकी भाषा तो आज भी मैं अच्छे से बोल-समझ और लिख सकता हूं. अवधी मुझे आती है. बनारस में कई साल रह चुका था तो भोजपुरी मेरे लिए अंजानी नहीं थी. लेकिन जब मुंगेर और भागलपुर की तरफ बढ़ा तो अंगिका के कुछ शब्द और वाक्य मैंने नोट कर लिए जिसका उपयोग मैंने किताब में किया है. बंगाल के इलाके से गुजरा तो मैंने वहां के जरूरतभर संवाद डायरी में नोट कर लिए.

हिंदी या उससे जुड़ी भाषाओं को थोड़ा सतर्क होकर समझने की कोशिश की जाए तो एक हिंदीभाषी परिवार को दूसरे हिंदीभाषी परिवार की भाषा समझने में शायद ही बहुत मुश्किल पेश आए?

हां, लेकिन किसी भी भाषा को बोलने के तरीके को आप नहीं पकड़ पाए तो फिर आपको मुश्किल होगी और उसमें से मजा जाता रहेगा. बोलियों की जान उसकी टोन ही है. टोन ही उसकी गमक है. टोन बरकरार रखने से उन भाषाओं के बोलने वाले आपकी फीलिंग तक पहुंच पाते हैं और आपकी कही या लिखी हुई चीजों से जुड़ते हैं. हालांकि मैंने यह यात्रा-वृत्तांत पेशेवर लेखक की तरह नहीं लिखा इसलिए पाठकों के जुड़ने के बारे में कभी सोचा नहीं था. मैंने चौमासा लिखे और उसमें 50 के करीब दोहे लिखे. बुंदेलखंड के इलाके के दोहे बुंदेलखंडी में लिखे तो वहां के लोगों ने समझा मैं उसी इलाके का हूं. जब उत्तराखंड पर लिखा तो वहां के लोगों को लगा कि मैं उत्तराखंडी हूं.

आप लिखते हैं कि यात्रा करने वालों की मुश्किल यह होती है कि अपने यात्रा के साथ छूट गए बहुत सारे लोग बाद में याद आते हैं लेकिन उनसे दोबारा मिलना शायद ही संभव हो पाता है. कोई ऐसा व्यक्ति या कोई पात्र है जिनकी याद जब-तब आती है या फिर उनमें से कोई ऐसा है जिन्होंने आपको कभी याद किया हो?

मैंने यह यात्रा 1976 में की थी और 1995 में मैं मूसानगर, पुरातत्व विभाग की ओर से गया तो वहां यमुना के घाट पर पहुंचते ही ठेकेदार ने मुझे तुरंत पहचान लिया. आप देखिए कि 20 साल तक उस व्यक्ति ने एक यात्री को इस तरह याद रखा था. मैं बतौर यात्री 23 की उम्र में गया था और विभाग के काम से जब दोबारा पहुंचा तब 42-43 का हो चुका था. इस बीच शारीरिक रूप से मुझमें बहुत परिवर्तन आ गए थे. मुझे यात्रा के दौरान ऐसे बहुत सारे लोग मिले जिनके नाम आज तो याद नहीं हैं लेकिन उन्होंने मेरी जो आवभगत की और जिस गर्माहट के साथ मिले, वो आज भी मेरे भीतर एकदम ताजा है.

हम दो व्यक्ति के कुछ खास गुणों के बारे में जिस तरह बात करते हैं तो अगर आपसे कहूं कि गंगा और यमुना के बारे में बताएं तो क्या कहेंगे?

यमुना एक स्थाई नदी है. उसने जमीन को काटकर अपना बहाव सुनिश्चित कर लिया है. यमुना गहरी नदी है. गंगा अभी भी अपने को स्थिर करने में लगी हुई है इसलिए उसका पाट चौड़ा है. उसका बहाव तेज है. यमुना में अधिकांश पानी विंध्य का है. यमुना में चंबल, बेतवा, केन आदि का पानी है. गंगा में अधिकांश पानी हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से आता है.

ऐसा कोई अनुभव जो पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे?

आप जब इस तरह की यात्रा करते हैं तब आप प्रकृति के बहुत करीब जाते हैं और उससे जो अनुभव मिलते हैं, वह अद्वितीय होते हैं. सामान्य तौर पर आदमी बहुत आत्मकेंद्रित होता है लेकिन जब वह प्रकृति के करीब जाता है तब उसे इस बात का एहसास होता है कि वह बहुत तुच्छ है. प्रकृति बार-बार आपको यह संदेश देती है कि आप उसके बहुत छोटे से हिस्से हैं.

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