‘आदिवासी समाज से कोई आगे आएगा तो हिंदी लेखकों की चिंता बढ़ जाएगी’

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आप जैसे लोगों से हिंदी वालों को क्यों डर लगेगा, वे तो दुनिया में छाए हुए हैं?

मुझसे डर नहीं लगेगा. लेकिन जब आदिवासी या किसी पिछड़े समुदाय के लोग लिखने लगेंगे तो उनके सामने नई चुनौती आ खड़ी होगी और जाहिर है कि उन्हें चिंता सताने लग जाएगी. वे ज्ञान के क्षेत्र पर एकाधिकार रखकर अब तक अपने तरीके से चीजों की व्याख्या करते रहते हैं. लेकिन उनका ज्ञान तो बहुत बाद का ज्ञान है न. इतिहास ज्ञान भी उनका बहुत बाद का है. वे पवित्रता और ज्ञान की दुनिया में आदिवासियों या देसज चेतना वालों के सामने टिक नहीं पाएंगे. उनका भेद खुल जाएगा. एकाधिकार टूट जाएगा. इसलिए वे डरते हैं कि सृष्टि को सबसे करीब से समझने वाले, देखने वाले, महसूसने वाले और सबसे लंबे समय से दुनिया को बदलते हुए देखते रहनेवाले अगर लिखेंगे तो उनके लिखे हुए पर सवालों के घेरे बनते जाएंगे. पवित्रता में कहीं टिक नहीं पाएंगे, इसलिए वे डरते हैं. हमारे समुदाय की दुनिया छल-प्रपंच की दुनिया नहीं है.

दलित-पिछड़े साहित्य वाले भी अपना बड़ा-बड़ा संगठन चलाते हैं और वे अपनी ही छतरी तले आदिवासियों को भी रखते हैं और जब भी बात करते हैं तो दलित-आदिवासी साहित्य के विकास की बात एक साथ करते हैं. क्या ऐसे किसी किसी संगठन या दलित साहित्य लेखक-आलोचक ने आपसे संपर्क किया और बधाई दी?

नहीं. अब तक तो नहीं. चार साल तो हो गए. मैं किसी को जानता भी नहीं. वे भी मुझे क्यों जानेंगे या पूछेंगे. अब तक किसी संगठन ने कभी गलती से मुझसे कुछ नहीं कहा-पूछा. मैं तो जानता भी नहीं किसी ऐसे संगठन-लेखक आदि को.

हिंदी में लिखना शुरू किया है तो किन समकालीन कवियों को पढ़ते हैं आप? आप किस-किस को जानते हैं?

ईमानदारी से कहूं तो किसी कवि का नाम नहीं जानता. आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं. मेरी परीक्षा तो नहीं ले रहे हैं न! मैं किसी को नहीं जानता. ज्ञानोदय, वागर्थ समकालीन भारतीय साहित्य जैसी पत्रिकाएं पढ़ता हूं. एक बार समकालीन भारतीय साहित्य में मेरी रचना छपी थी. दोबारा भेजा तो कहा गया कि यह नहीं छप सकती, तब से उधर ज्यादा ध्यान भी नहीं देता लेकिन पत्रिकाएं पढ़ता हूं. उन पत्रिकाओं में छपी रचनाएं पढ़ता हूं. रचनाकारों के बारे में कभी नहीं जाना और न ही उसकी कोई जरूरत महसूस हुई. केदारनाथ सिंह का नाम सुना है और किसी का नहीं. पहले के कवियों में रवींद्रनाथ टैगोर, निराला, दिनकर को पढ़ा है. बाकि आज हिंदी में कौन-कौन से कवि हैं, नहीं जानता.

संथाली के बाद अब आप हिंदी में अपनी कविता संग्रह  पहाड़ पर हूल फूल’  लाने की तैयारी में हैं. इसके बारे में जानकारी दें. क्या इसमें संकलित कविताएं भी आदिवासी समुदाय के संकट के बारे में है?

इस संकलन में संकलित रचनाएं मैंने असम में पोस्टिंग के दौरान लिखी हैं. इसमें दुनिया के सामने, सृष्टि के सामने जो संकट है, उसके बारे में लिखा है. दुनिया को बचाना जरूरी है, मनुष्यता ही संकट में है. कोई समुदाय तो पूरी सृष्टि का एक छोटा-सा हिस्सा होता है. समुदाय का संकट अकेले और अपने में कोई स्वतंत्र संकट नहीं है. दुनिया जिस राह पर है, उससे जो संकट के रास्ते तैयार हो रहे हैं, उसी से समुदायों का अस्तित्व दांव पर लगता जा रहा है. बस, उसी को केंद्र में रखकर कुछ लिखने की कोशिश की है मैंने.

संथाली में लिख रहे थे आप. आपने हिंदी में लिखना क्यों शुरू कर दिया. और अचानक पूरी दुनिया के बारे में सोचना शुरू कर दिया.

यह जरूरी है. हम कैसे सोचते हैं दुनिया के बारे में, हम दुनिया के संकट को किस नजरिए से देखते हैं और हमारे अनुसार क्या मूल कारण है यह बताना जरूरी है. हिंदी इसलिए अपनाया क्योंकि अब यह वैश्विक भाषा है. पूरी दुनिया को हम अपना नजरिया बताना चाहते हैं. हम उस समुदाय से आते हैं, उस मिट्टी से आते हैं, जो हवा-आकाश-पानी-जंगल-पेड़-पौधे से अनंत काल से बतियाने की कला जानता है. हमारी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे. अपने समय में जो घटित हो रहा है, उसे लिखते रहना चाहिए ताकि कल की भावी पीढ़ी को किसी चीज को एकांगी व्याख्या के जरिए समझाने की जरूरत न आ पड़े.

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