इंटरनेट बिन सून

भारत के शहरों में रहनेवाले करीब उन्नीस करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन लोगों में से अधिकतर लोगों के बारे में कहा जा सकता है कि वे ऑनलाइन दुनिया में भी बसते हैं. इनकी सक्रियता वास्तविक दुनिया के मुकाबले ऑनलाइन की आभासी दुनिया में ज्यादा रहती है. अभी तक यह बात हल्के-फुल्के ढंग से कही जाती थी. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. देश के डॉक्टर इस समस्या को लेकर गंभीर हैं. बंगलुरू में इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीमार लोगों के इलाज के लिए एक केंद्र खुल चुका है. यह देश का पहला ऐसा केंद्र है जहां सोशल मीडिया और इंटरनेट की लत से जूझ रहे लोगों का इलाज हो रहा है, उनकी काउंसलिंग हो रही है और लोग स्वस्थ भी हो रहे हैं.

डॉक्टरों में इंटरनेट के फैलाव को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. उनका मानना है कि इसकी वजह से युवाओं की एक ऐसी फौज तैयार हो रही है जो मानसिक तौर पर बीमार है

बंगलुरू स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निमहांस) ने इस सेंटर की शुरुआत की है. निमहांस ने बंगलुरू के करीब 400 युवकों के ऊपर एक सर्वे किया. इस सर्वे में हर आय वर्ग के युवकों को शामिल किया गया जो नतीजे सामने आए वह बेहद चौंकानेवाले थे. 70 प्रतिशत लोगों को इंटरनेट और सोशल मीडिया के बिना समय बिताने में दिक्कत आ रही थी. एक सवाल यह उठता है कि ऐसे कौन से लक्षण हैं जिनके आधार पर यह जाना जा सके कि किसी व्यक्ति को इंटरनेट या सोशल मीडिया की लत लग चुकी है या फलां व्यक्ति सामान्य इंटरनेट यूजर है? इस सवाल के जवाब में निमहांस के मनोचिकित्सक डॉ. मनोज शर्मा कहते हैं, ‘हम कई तरह के टेस्ट करते हैं. हाव-भाव की निगरानी करते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, व्यक्ति में चार ‘सी’ की खोज करना. इनमें से पहला सी है ‘क्रेविंग’ इसका मतलब यह है कि व्यक्ति में सोशल मीडिया को लेकर कितनी बेचैनी है. उसे इसकी कितनी आदत है. दूसरा है ‘कंट्रोल’ यानी कि जब वह इंटरनेट या किसी सोशल मीडिया पर होता है तो उसका अपने-आप पर कंट्रोल है या नहीं. इस दौरान कुछ लोगों को समय का अंदाजा ही नहीं होता. तीसरा ‘सी’ है कंपल्शन. मतलब अगर आपको इंटरनेट पर जाने की या सोशल मीडिया पर एक्टिव होने की जरूरत न भी हो तो भी आप ऐसा करते हैं और आखिरी है, कॉन्सीक्वेंसेज यानी कि बाकी तीन ‘सी’ की वजह से व्यक्ति को कितना और क्या-क्या नुकसान हो रहा है.’

निमहांस की टीम ने जब इन चार ‘सी’ के आधार पर बंगलुरू के 400 युवकों को परखा तो उनमें से ज्यादातर फेल हो गए और इंटरनेट के नशे के शिकार पाए गए. इसी से मिलता-जुलता एक अध्ययन 2014 में टाटा कंसल्टेंसी ने भी किया है. इस सर्वे में करीब-करीब 71 फीसदी लोगों ने अपने स्मार्ट फोन को अपना पसंदीदा गैजेट बताया है. यह सर्वे देश के 12 शहरों के करीब-करीब 1200 छात्रों पर किया गया था. एक तरफ स्मार्ट फोन सस्ते हो रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा लोग सूचना के क्षेत्र में आई क्रांति का हिस्सा बन रहे हैं वहीं देश के डॉक्टरों में इस बात को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है कि इस फैलाव के साथ बच्चों और युवाओं की एक ऐसी फौज तैयार हो रही है जो मानसिक तौर पर बीमार है. इस फौज को इंटरनेट के बिना सब कुछ सूना-सूना सा लगता है. ये लोग अपनी आभासी दुनिया से बाहर निकलकर वास्तवकि दुनिया में चहलकदमी नहीं करना चाहते.

अभी तक जो थोड़े-बहुत आंकड़े और नतीजे सामने आए हैं उनसे यह पता चलता है कि इस लत के शिकार लोगों में एक समय के बाद अवसाद, सर दर्द, नींद न आना, पढ़ाई-लिखाई में मन न लगना, शारीरिक विकास का सही से न हो पाना और दिमागी विकास का भी रुक जाना जैसे लक्षण दिखते हैं. एक सवाल यह भी है कि इंटरनेट या सोशल मीडिया की आदत व्यक्ति को लगती कैसे है. क्यों कोई व्यक्ति अपने आस-पास मौजूद वास्तविक लोगों की बजाय दूर-दराज के लोगों से ज्यादा लगाव महसूस करने लगता है. दिल्ली में कैक्टस लिली नामक संस्था चलाने -वाली और ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे परिवारों को परामर्श देने वालीं मंजू छाबड़ा इस सवाल के बारे में कहती हैं, ‘इस समस्या की जड़ में शहरी रहन-सहन और उसके तौर-तरीके हैं. एकल परिवारों में रहनेवालों के आस-पास इतने लोग नहीं होते जिनसे हंस-बोल सकें. हर व्यक्ति अपने आप में व्यस्त है. आज के हर परिवार में अमूमन तीन-चार सदस्य होते हैं. बच्चे और माता-पिता. बस यही परिवार है. हर कोई अपने काम में व्यस्त है. पति और पत्नी दफ्तर जाते हैं. बच्चे या तो दाई के हवाले होते हैं या प्ले स्कूल में होते हैं. इस तरह से न तो बच्चों की परवरिश हो पाती है और न ही पति-पत्नी की परवरिश बतौर माता-पिता हो पाती है.’

मंजू छाबड़ा के मुताबिक आजकल के परिवारों में हर किसी की अपनी परेशानी है. ऐसे में अगर बच्चे किसी वीडियो गेम या स्मार्ट फोन के लिए जिद करते हैं तो पति-पत्नी लिए सबसे आसान तरीका यही है कि उन्हें जो चाहिए वह फौरन दे दिया जाए. किसी को समझाने की फुर्सत नहीं है. ऐसे माहौल में बच्चों को समझ में आता है कि उन्हें जो चाहिए सब मिल जाएगा. इसका इंटरनेट की लत से कोई सीधा संबंध है? इस सवाल पर छाबड़ा बताती हैं, ‘शुरुआत तो यहीं से होती है. मां-बाप ने पहले बच्चे को चुप रखने के लिए खुद ही उसे उन चीजों से जोड़ दिया जहां सब कुछ चमत्कारिक है. रोमांच से भरपूर है. भले वहां जो भी है वह सब आभासी है. इससे बच्चे को तो आदत पड़ेगी ही. वो कुछ दिनों के बाद स्मार्ट फोन या इंटरनेट के बिना रहने की सोच भी नहीं पाता. वह फुटबॉल भी वीडियो गेम पर ही खेलता है और लिखता भी वहीं पर है.’ शहरों के कामकाजी मां-बाप के लिए यह और बड़ी समस्या बन गया है. अक्सर दोनों दफ्तर जाते हैं. अगर इनमे से कोई एक दफ्तर नहीं भी जाता है तो वह कहीं न कहीं व्यस्त रहता है. यह शहरी जीवन का दुष्प्रभाव है जहां खाली रहना बुरा माना जाता है. जाहिर है दोनों के काम की अपनी-अपनी परेशानियां हैं, अपने-अपने तनाव हैं. दोनों में से किसी के पास इतना समय नहीं है कि वे एक- दूसरे को समझने-समझाने की हद तक बात करें. इस एक वजह से बहुत हद तक संभव है कि दोनों काफी देर तक इंटरनेट पर किसी अनजान चेहरे से चैट करते हों. या इंटरनेट पर ही किसी और तरह के टाइम पास से जुड़े हुए हों. तहलका से बातचीत में छावड़ा एक और बात बताती हैं कि जो लोग इंटरनेट के माध्यम से चैट करने के आदी हो जाते हैं वे बाहरी दुनिया के लोगों से कम बातचीत करते हैं. कहने का मतलब कि जो हमसे-आपसे कम बात करते हैं. जो वास्तविक दुनिया में बहुत चुप-चुप रहते हैं वैसे लोग इंटरनेट की मदद से अनजान लोगों से बातचीत करने में ज्यादा रूचि रखते हैं. और ऐसे लोग किसी भी आयु वर्ग में मिल सकते हैं. इस बारे में मुंबई स्थित लीलावती अस्पताल से जुड़ी क्लिनिकल साईकोलॉजिस्ट और साईकोथेरिपिस्ट बरखा चुलानी का मानना है कि हम वास्तविक और आभासी दुनिया के बीच का फर्क भूलते जा रहे हैं और इसी वजह से यह दिक्कत आ रही है. वो कहती हैं, ‘हम देख रहे हैं कि लोग अब निजी और सार्वजनिक जीवन को बांटने -वाली उस मोटी लकीर को देख नहीं पा रहे हैं और वे सोशल मीडिया को लेकर जुनूनी हो गए हैं.’

लोग अब अपने वास्तविक जीवन में भी फेसबुक की तरह ‘लाइक’ बटन ढूंढ़ रहे हैं. लोग अब बहुत खुश होते हैं, दुखी होते हैं, खुद को अकेला महसूस करते हैं और यहां तक कि आत्महत्या जैसे विचारों को अपने परिवार या दोस्तों के साथ साझा नहीं करते बल्कि अपने ‘फेसबुक दोस्तों’ और ट्विटर  ‘फॉलोअर्स’ के साथ साझा करते हैं. यह बात उन ट्वीट और स्टेटस अपडेट में खासतौर पर दिखती है, जो आत्महत्या के विचार को दर्शाते हैं. इनसे काफी हद तक व्यक्ति की मनोदशा समझी जा सकती है. ऐसे कुछ भाव हैं, ‘निराश’, ‘अपमानित महसूस कर रहा/रही हूं’, ‘सब खत्म हो गया’ या ‘अंदर से अकेला महसूस होना’ आदि.

मनोचिकित्सकों की माने तो सोशल मीडिया से जुड़ाव के कारण लोग निजी और सार्वजनिक जीवन में फर्क करना भी भूल गए हैं. लोग पहले की तुलना में ज्यादा खुलकर बोलने लगे हैं. सार्वजनिक मामलों में खुलकर बोलना, गलत का विरोध करना और उसके लिए सोशल नेटवर्किंग साईट पर खुलकर लिखने-बोलने में कोई बुराई नहीं है बल्कि यही तो इस माध्यम की असली ताकत है. लेकिन जैसे ही यह उन्मुक्तता निजी जिंदगी में घुसती है वैसे ही परेशानी शुरू हो जाती है और कई बार यह परेशानी इतनी बड़ी हो जाती है कि इसकी वजह से भयंकर घटनाएं घट जाती हैं.

यह समस्या बड़ी होती जा रही है लिहाजा इसके इलाज की तरफ लोगों का ध्यान तेजी से गया है. कैसे इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए भी उसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है? ऐसे कौन से जतन किए जाएं कि इंटरनेट का  केवल सकारात्मक उपयोग होता रहे. इस बारे में ज्यादातर चिकित्सक एक मत हैं. चिकित्सक मानते हैं कि हर बीमारी की तरह इसके लिए भी इलाज की बजाय बचाव पर ध्यान देना चाहिए. इंटरनेट से, फोन से उतना ही संपर्क रखा जाए जितनी जरूरत हो. ऑनलाइन गेम खेलने से बचना चाहिए. बच्चों को तो जहां तक हो सके बाहर पार्क में खेलने और दूसरे बच्चों से मिलने देना चाहिए. जो लोग आपस में साथ रह रहे हैं उन्हें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि वह दूसरों के लिए एक-एक दिन को खास बनाएं जिससे की सुबह उठते ही इंटरनेट पर जाने, चैट करने या वीडियो गेम खेलने की जरूरत महसूस ही न हो. डॉक्टरी सलाह के इतर लगभग साल भर पहले देश के जानेमाने अर्थशास्त्री, नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने भी इंटरनेट पर ज्यादा समय बितानेवालों को एक सलाह दी थी. जयपुर में आयोजित होनेवाले साहित्य मेले में बोलते हुए अमर्त्य सेन ने कहा था, ‘इंटरनेट आपकी सहायता कर सकता है लेकिन आपको किताबें ज्यादा से ज्यादा पढ़नी चाहिए.’

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