झपसु मियां के बारे में पढ़कर दोनों धर्मों के अतिवादी शर्मसार होंगे

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‘की हो झा जी, की मर्दे; आदमी साठा तब पाठा, बियाह कर ले बेटबा-पुतहुआ ठंडा हो जइतौ.’ झपसु मियां हर रोज की तरह अपने दालान में बैठकी लगाने आए और अपने मित्र कपिल झा को ब्याह करने की सलाह दी तो एकबारगी सब ठठाकर हंस पड़े. ऐसे ही थे झपसु मियां. कुछ महीने पहले उनका इंतकाल हो गया. उनके जनाजे में गांव के हर उम्र के लोग शामिल हुए और सभी उनके मिलनसार स्वभाव और उदार मन का विश्लेषण कर रहे थे.

छह फुट से कुछ अधिक लंबे और गोरे-चिट्टे. संस्कारी. उन्हें दूर से ही पहचाना जा सकता है क्योंकि वे हमेशा बगबग करते (सफेद) कुर्ता और धोती पहनते थे. कुर्ते पर गमछा भी होता था. उनको दूर से पहचानने के लिए ये काफी था. वे कमर में ढेंका खोंस के धोती पहनते थे. उनके कपड़े पहनने का अंदाज कुछ-कुछ जमींदार जैसा था. सभी ने उनको हमेशा ऐसे ही देखा था. 75 साल की उम्र में भी वे हर साल प्रतिदिन दाढ़ी बनाते थे. नमाज, टोपी, दाढ़ी जैसे धार्मिक आडंबरों का प्रदर्शन करते उन्हें कभी किसी ने नहीं देखा था. गांव में कोई मस्जिद तो थी नहीं इसलिए तीन किलोमीटर दूर बरबीघा की मस्जिद में वो जुमे की नमाज पढ़ने कभी-कभार जाते थे पर वही धोती पहन के, ढेंका खोंस के…

बिहार के शेखपुरा जिले के बरबीघा कस्बे के पास बभनबीघा गांव में लगभग 500 हिंदू परिवार रहता है. पूरे गांव में सिर्फ झपसु मियां का ही एक परिवार मुस्लिम धर्म से ताल्लुक रखने वाला था. वे अपने परिवार में सबसे बड़े थे. वैसे तो उनका नाम नसीरुद्दीन था पर उन्हें इस नाम से पूरे गांव में कोई नहीं जानता. उनका परिवार बहुत बड़ा था. वे पूरी जिम्मेदारी के साथ परिवार को संभालकर रखते. उन्होंने अपने बच्चों के नाम भी राजेश, छोटे, बेबी, रूबी आदि रखा था. किसी को शायद ही एहसास हुआ हो कि वो मुसलमान हैं. झपसु मियां और उनके गांव के बीच गर्मजोशी से भरे रिश्ते को देखकर लगता कि आपसी प्रेम, सौहार्द, भाईचारा जैसे सारे शब्द इस गांव और इस परिवार तक आकर छोटे पड़ गए हों.

झपसु मियां के घर जब भी किसी भोज का आयोजन होता तो पूरा गांव भोज खाने पहुंचता था. भोज की सारी व्यवस्था गांव के हिंदू लड़कों के कंधों पर ही होती

गांव में बड़ी और छोटी जोत वाले किसानों के बीच झपसु मियां कहीं-न-कहीं सेतु का काम करते रहे. मुझे आज भी याद है कि तीस साल पहले अपने बचपन के दिनों में हम कई बार उनके ट्यूबवेल पर पहुंच जाते और घंटों धमाचौकड़ी मचाते रहते. हमने उनके बगीचे से दर्जनों बार अमरूद, फनेला आदि चुराकर खाए… गांव में किसी की भी मौत होती तो उनके परिवार के लोग झपसु मियां के ट्यूबवेल के आसपास लगे बंसेढ़ी बगैर किसी हिचक के पहुंच जाते और बांस काटकर ले आते. उनके बंसेढ़ी के बांस से ही अर्थी तैयार की जाती.

झपसु मियां के घर जब भी किसी भोज का आयोजन होता तो पूरा गांव भोज खाने पहुंचता था. भोज की सारी व्यवस्था गांव के हिंदू लड़कों के कंधों पर ही होती. भोज से पहले भंडार संकल्प करने के लिए पंडितजी आते तो उनको दक्षिणा भी झपसु मियां ही देते. और वो जब भोज खाने जाते तो एक साथ पंगत में बैठकर खाते.

उनकी एक खासियत यह भी थी की यूं तो वो ऊपरी तौर पर बहुत ही धीर और गंभीर थे पर अंदर से भरा-पूरा एक बच्चे-सा स्वभाव. गांव में किसी की साली आती तो वो उसको छेड़े बिना नहीं छोड़ते, चाहे वह उनके बच्चे की उम्र की ही क्यों न हो. जैसे ही किसी ने परिचय कराया कि ये मेरी साली है तो बोल पड़ते… ‘बड़ी खूबसूरत हखुन, एतबर गो गांव में इनखरा ले दूल्हे नै है हो मर्दे, बियाह करा दहीं..बेचारी मसुआल हखिन…’ और अपने पड़ोसी पंडीजी की पत्नी को वो रोज चिढ़ाते… ‘सुन्लाहीं हो पंडीजी नै हखिन औ उनकर घर में ई नया मर्दाना के जाते देखलिय…’ और पंडीजी की कन्या छिद्धीन छिद्धीन गाली देना शुरू कर देती… और वही पंडीजी जब मरणासन्न और पैसे के अभाव में इलाज कराने में असमर्थ थे, तब झपसु मियां की बेचैनी आसानी से देखी जा सकती थी. पंडीजी के घर जाकर हांक लगाई और रिक्शा बुलाकर उन्हें रिक्शे पर बिठाया. पंडिताइन को पैसा देकर कहा इलाज करा लीजिए जो भी खर्च आएगा देख लेंगे.

सरस्वती पूजा का चंदा देने में भले ही गांव के बड़े-बड़े बाबू साहेब बच्चों को दुत्कार देते पर झपसु मियां पहले तो प्रेम से चंदे की राशि को लेकर जोड़-तोड़ करते और फिर जेब से पैसा निकाल दे देते. आज धार्मिक उन्माद और अतिवाद अपने चरम पर है और जाहिर है कि इन हालात में झपसु मियां के बारे में पढ़कर दोनों पक्षों (हिंदू-मुस्लिम) के अतिवादी शर्मसार होंगे… भले ही वो कुछ भी कुतर्क करें… आदमी है, तो शर्म तो आएगी ही..राजनीतिज्ञ यदि धर्म का जहर न बोएं तो भारत में सौहार्द की फसल ऐसे ही लहलहाएगी.

(लेखक पत्रकार हैं और बिहार के शेखपुरा में रहते हैं)