उद्योग से मरता जीवन

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जमशेदपुर से 25-30 किलोमीटर दूर स्थित गालूडीह के उलदा गांव के ग्रामीण भी इसी समस्या से परेशान हैं. टाटा स्टील कंपनी की ओर से गांव में स्लैग डालने के लिए बनाए गए तालाब से बहकर आए जहरीले पानी की चपेट में आकर उनकी फसल नष्ट हो रही है, छोटे तालाबों में पाली जाने वाली मछलियां भी मर रही हैं. ये ग्रामीण टाटा स्टील कंपनी से अपने नुकसान की भरपाई की मांग कर रहे है. गांववालों ने मांगें पूरी न होने की दशा में आंदोलन की भी चेतावनी दी है. उलदा गांव में लगभग चार वर्ष पहले टाटा स्टील ने सल्फरयुक्त स्लैग डंप करने के लिए तालाब बनवाया था. अब यह तालाब पिछले चार वर्ष में लगभग 50 एकड़ जमीन पर 50 फीट ऊंचा हो गया है. इसके निर्माण के समय स्लैग से निकलने वाले जहरीले पदार्थ से होने वाले परिणाम को समझने के बाद गालूडीह पंचायत के युवा मुखिया वकील हेमब्रम ने इसका विरोध किया था. तब उनका साथ बड़ाखुशी पंचायत के मुखिया बंसत प्रसाद सिंह, ग्रामीण उपेन मांझी, जमनीकांत महतो ने दिया था, लेकिन आसपास के गांववालों को अपने साथ लाने में ये असफल रहे और इस खतरनाक तालाब का निर्माण हो गया.

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हेमब्रम बताते हैं, ‘ग्रामीण भोलेभाले हैं उनको स्लैग डंप से होने वाले प्रदूषण और नुकसान का अनुमान नहीं था. उन्हें धन का लालच देकर भटका दिया गया और वे टाटा स्टील का सहयोग करने लगे.’ जबकि हेमब्रम के साथ वाले चाहते थे कि मामले को लेकर तीनपक्षीय वार्ता हो. टाटा स्टील, जिला प्रशासन और ग्राम पंचायत के बीच अनुबंध हो, जिसमें लिखा हो कि कचरा डंप करने से किसी भी प्रकार का जल, जमीन और वायु प्रदूषण न हो और गांववालों का नुकसान होने की दशा में उचित मुआवजा मिले.’

पर अब चार साल बाद हाल ये है कि स्लैग से बहकर आए जहरीले पानी ने ग्रामीणों की जमीनों को बंजर बना दिया है. खेत में लगी फसल जलकर नष्ट होने लगी है. इस तालाब से कुछ दूरी पर स्थित बिरसा अनुसंधान केंद्र के निदेशक जे. टोपनो ने बताया, ‘स्लैग से निकला पानी जमीन की उर्वर क्षमता को नष्ट कर रहा है. इससे जमीन में फसल नहीं लग पाती है. साथ ही इस पानी के संपर्क में आने वाले किसानों को बीमारियां भी हो रही हैं.’ हालांकि अब तक कितनी जमीन बंजर हुई है, इसके बारे में विभाग से  कोई जानकारी नहीं मिल पाई है.

झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्रीय कार्यालय सह प्रयोगशाला की ओर से टाटा पावर लिमिटेड को जल नियंत्रण अधिनियम 1974 व वायु नियंत्रण अधिनियम 1981 के उल्लंघन के लिए नोटिस भेजकर चेताया भी गया है, मगर इसका असर होता नहीं दिख रहा है

झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्रीय कार्यालय सह प्रयोगशाला की ओर से टाटा पावर लिमिटेड को जल नियंत्रण अधिनियम 1974 व वायु नियंत्रण अधिनियम 1981 के उल्लंघन के लिए नोटिस भेज कर चेताया भी गया है, मगर इस नोटिस का कुछ खास असर होता नहीं दिख रहा है. उधर, कृषि, पशुपालन व सहकारिता मंत्री रणधीर सिंह ने पूरे मामले की जांच कराने की बात कही है. उन्होंने कहा है, ‘खेती योग्य जमीन का बंजर होना और जहरीले पानी से जीवों की मौत होना गंभीर बात है. पूरे मामले की जांच करने के बाद दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी.

उलदा पंचायत प्रधान छोटू सिंह बताते हैं, ‘टाटा स्टील के स्लैग डंप करने वाले  तालाब की चपेट में आकर उनकी तीन एकड़ जमीन बंजर हो गई है. हर साल लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है.’ छोटू हर साल एक एकड़ जमीन पर 50 से 60 हजार रुपये तक का धान उपजाने के साथ मछली भी पालते थे. इससे उनको 10 से 12 हजार रुपये की अतिरिक्त कमाई हो जाती थी. अब वे अपने खेत से एक रुपया भी नहीं कमा पा रहे हैं. उनके परिवार में सात सदस्य हैं. उनके साथ ही गांव के 40 अन्य किसान भी अपनी उपजाऊ जमीन से हाथ धो बैठे हैं. किसानों ने इसके लिए टाटा स्टील से मुआवजे की भी मांग की थी. पिछले साल उनकी तीन एकड़ जमीन के लिए महज 34 हजार रुपये मुआवजे के रूप में दिए गए. गांव के लाल मोहन सिंह बताते हैं, ‘मेरी सात एकड़ जमीन है, जो बंजर हो चुकी है. मेरी जमीन के अलावा 40 किसानों की सैकड़ों एकड़ जमीन तालाब के जहरीले पानी की चपेट में आकर अपनी उर्वर क्षमता खो चुकी है. हमें परिवार पालने में तकलीफ उठानी पड़ रही है. हमारी मांग है कि टाटा स्टील हमें स्थायी नौकरी या रोजगार उपलब्ध कराए, वरना हम आंदोलन के लिए सड़क पर उतरेंगे.’ इस संबंध में पक्ष जानने के लिए टाटा स्टील प्रबंधन को पत्र लिखा गया, पर प्रबंधन की ओर से किसी भी तरह का जवाब नहीं दिया गया.

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