जज-जूरी-जल्लाद

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मीडिया के एक हिस्से ने जिस तरह से इस फिल्म पर हो-हल्ला मचाया वह कहीं ज्यादा सोच का विषय है. अगर किसी देश का मीडिया ही प्रतिबंध और सेंसर की मांग करने लगेगा तो अभिव्यक्ति और अधिकारों पर खतरे गहरा जाएंगे. सारी मारा-मारी सूत न कपास, जूलाहों में लट्ठम लट्ठ वाली तर्ज पर हो रही थी. किसी को फिल्म के असल कंटेंट की जानकारी नहीं थी. अजीब-अजीब तर्क दिए गए, मसलन पीड़िता की पहचान उजागर की गई है, उसके मां-बाप की पहचान उजागर हुई है, जज को प्रभावित करने की कोशिश हो रही है आदि-इत्यादि. इस विषय पर बात साफ होनी चाहिए कि बलात्कार की जो पीड़िताएं जीवित नहीं हैं उनकी पहचान छुपाने का क्या मकसद है? 16 दिसंबर के मामले में पीड़िता के मां-बाप उन तमाम मंच फोरमों पर आते-जाते रहे हैं जहां उन्हें सम्मानित किया गया. उनकी पहचान तो पहले भी कभी छिपी नहीं थी. जहां तक जज के प्रभावित होने का मसला है तो उसमें मीडिया को अपनी भूमिका फिर से तय करनी होगी. ऐसा कहकर मीडिया क्या कोर्ट के विवेक पर प्रश्नचिन्ह नहीं उठा रहा.

इन दिनों भारत बहुत जल्दी अपमानित हो उठता है. हमारे अंदरूनी मसले पर किसी परदेसी की तटस्थ राय सुनते ही हम अपमान से सिहुरने लगते हैं. सबको पता है कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में हमारा रिकॉर्ड शर्मनाक है. कुन्नूर से लेकर बांदा, बदायूं तक बलात्कार की घटनाएं हर दिन हो रही हैं. अबोध, युवा, बुजुर्ग, शहरी, ग्रामीण, आदिवासी, दलित, विदेशी हर वर्ग की स्त्रियां शिकार हो रही हैं. गृहमंत्री राजनाथ सिंह संसद में अपनी भारी-भरकम आवाज में उससे भी भारी निराशा प्रकट करते हैं कि यह भारत को अपमानित करने की साजिश है. एक बलात्कारी जो फांसी की सजा पा चुका है उसके विचार अगर लोगों के सामने आते हैं तो इसमें देश का अपमान कैसे होता है. यह तो आत्ममंथन का जरिया बन सकता है, बलात्कारी सोच और मानसिकता को समझने और उससे निपटने का माध्यम बन सकता है. जिस मध्ययुगीन मानसिकता के वकील बलात्कारी का बचाव कर रहे हैं उन पर सरकारों की चुप्पी ज्यादा चिंतनीय है, वे आज भी अदालतों में वकालत कर रहे हैं.

अभी चतुराई का बोलबाला है, चतुराई ही हर समस्या का समाधान है.

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