मैं प्रो. सिरास से तो नहीं मिला, लेकिन मनोज बाजपेयी ने जिस तरह का रोल किया है उसे देख लगता है कि वे वैसे ही रहे होंगे : दीपू

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आपकी प्रो. सिरास से कई बार बात हुई. बातचीत के आधार पर आपको वे किस तरह के इंसान लगे?

जितनी मेरी उनसे बात हुई उसके आधार पर ये पता चला कि वह साधारण और बेहद निजी व्यक्ति थे. अलीगढ़ में अकेले रहा करते थे. उनके ज्यादा दोस्त नहीं थे. वह सहनशील और मजबूत इरादों वाले व्यक्ति थे, क्योंकि जिस तरह का विवाद उनके साथ हुआ था. कोई और होता तो फोन ‘स्विच आॅफ’ कर लेता या फिर किसी से बात नहीं करता, लेकिन खराब परिस्थितियां होने के बावजूद उन्होंने अपना फोन कभी बंद नहीं रखा और जब आप कॉल करो तो वे बड़ी आसानी और सहजता से बात भी करते थे. उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा. उन्हें लगता था कि समस्याएं उनकी अपनी हैं और वे ही इनका समाधान करेंगे. उन्हें बस यही लगता था कि जो कुछ भी हुआ उससे उनकी निजता के अधिकार उल्लंघन किया गया, ये तब किया गया था जब दिल्ली हाईकोर्ट ने सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने को अपराध नहीं माना था. शुरू में उनकी लड़ाई अपना निलंबन रद्द कराने को लेकर थी, लेकिन बाद की उनकी लड़ाई खुद के हक को लेकर शुरू हुई.

आप उनका इंटरव्यू करने के लिए अलीगढ़ जाने वाले थे. अलीगढ़ में क्या हुआ था?

अलीगढ़ पहुंचने के बाद मैं सीधा कैंपस गया लेकिन वे वहां नहीं थे. उनके डिपार्टमेंट में मलयालम पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर हैं सतीशन, जिनका फिल्म में भी छोटा सा रोल है. विश्वविद्यालय में सतीशन मेरे पुराने सूत्र थे. उस डिपार्टमेंट में प्रो. सिरास के अलावा सतीशन ही थे. सतीशन भी उस दिन डिपार्टमेंट में नहीं थे, उन्हें भी उनके बारे में पता नहीं था. उनके बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. तब किसी ने बताया कि वह दुर्गाबाड़ी मोहल्ले में रह रहे हैं. वहां विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर रहते थे. उन्हें भी पता नहीं था, लेकिन उन्होंने एक मराठी व्यक्ति के बारे में बताया जिसने उन्हें नया कमरा दिलवाया था. मैं उनके पास गया तो उन्होंने बताया कि वे यहां नहीं रहते अब. फिर कुछ दूसरे इलाकों में ढूंढा, लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला. फिर वापस दुर्गाबाड़ी आ गया. शाम को एक लड़के ने उनके बारे में बताया. हम वहां गए तो पता चला कि जिस मराठीभाषी व्यक्ति ने प्रोफेसर को कमरा दिलाया, उसके मकान के बिल्कुल पीछे ही था प्रोफेसर का घर. उन्होंने हमसे झूठ बोला था. जब हम पहुंचे तो प्रो. सिरास का कमरा बाहर से लॉक था. हम आधा घंटा थे वहां, लेकिन उनकी कोई जानकारी नहीं मिली. दूसरे दिन भी उनका घर बंद था. मैंने अपने एडिटर से बात की तो उन्होंने अलीगढ़ में ही एक दूसरी रिपोर्ट पर लगा दिया. ये रिपोर्ट करते हुए मुझे एक दूसरे रिपोर्टर से पता चला कि उस कमरे में उनकी लाश मिली.

उनकी मौत किन वजहों से हुई इस पर अब भी रहस्य बरकरार है. आपको क्या लगता है?

बहुत सारे लोग कहते हैं कि उनकी हत्या हुई है, लेकिन उनके आत्महत्या करने से भी इंकार नहीं किया जा सकता. मेरे हिसाब से ये एक आत्महत्या थी, हत्या की संभावना बहुत ही कम है. वह बहुत निजी व्यक्ति थे. किसी को भी नहीं पता था कि उनके मन में उस वक्त क्या चल रहा था. ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता कि हाईकोर्ट की ओर से पक्ष में फैसला आ जाने के बाद वो खुश ही थे.

आपके लिए फिल्म ‘अलीगढ़’ की खास स्क्रीनिंग कराई गई थी? आपको ये फिल्म कैसी लगी?

फिल्म की कहानी बहुत ही अच्छी तरह से लिखी गई है और फिल्म भी बहुत अच्छी बनी है. इसे थोड़ा सा नाटकीय बनाया गया है, जैसे मैं प्रोफेसर से कभी नहीं मिला, लेकिन फिल्म में मिलते हुए दिखाया गया है. हालांकि ये कहानी ऐसी है कि आप इसमें बहुत सारा ड्रामा नहीं जोड़ सकते. प्रोफेसर के बहाने फिल्म एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों के बारे में बात करती है. एक बात मैं जरूर कहूंगा कि मैं प्रो. सिरास से नहीं मिला, लेकिन मनोज बाजपेयी ने जिस प्रभावशाली तरीके से प्रोफेसर का किरदार निभाया है, वह एकदम वैसा ही है जैसा मैंने प्रोफेसर के बारे में कल्पना की थी. लगता है कि प्रोफेसर ऐसे ही रहे होंगे.