‘मैं खुद को किसी खांचे में नहीं बांधना चाहता’

फिल्म में दिखाई गई अदालत वास्तव में सिर्फ एक कल्पना है, एक ऐसी कल्पना जिसके दम पर इसकी कहानी कहने में मुझे आसानी हुई. अदालत की प्रक्रियाओं के संबंध में हमने अपनी ओर से कुछ स्वतंत्रता ली है. शुरू से ही मैंने तय कर लिया था कि मैं अपनी फिल्म की कहानी में वास्तविकता का गैरजरूरी दबाव नहीं आने दूंगा. इसलिए मैं कहूंगा कि फिल्म में भारतीय अदालतों को कुछ हद तक महसूस किया जा सकता है.

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बूढ़े लोकगायक की अदालती जद्दोजहद

‘कोर्ट’ चैतन्य तम्हाणे की पहली फिल्म है.  28 साल के चैतन्य ने मीठीबाई कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में डिग्री ली है. फिल्ममेकिंग की किताबों में गहरी दिलचस्पी रखने वाले चैतन्य इससे पहले एकता कपूर के प्रोडक्शन हाउस बालाजी टेलीफिल्म्स के साथ काम कर चुके हैं. साथ ही उन्होंने ‘सिक्स स्ट्रैंड्स’ नाम की एक शॉर्ट फिल्म भी बनाई थी, जिसे उन्होंने कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया था. ‘कोर्ट’ एक बूढ़े लोकगायक की एक स्थानीय अदालत में चल रही जद्दोजहद दिखाती है, जहां उस गायक पर एक सफाई कर्मचारी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है. फिल्म में सफाई कर्मचारियों और अदालतों की दुर्दशा भी दर्ज है. ‘कोर्ट’ फिल्म का प्रदर्शन पहली बार पिछले साल सितंबर में  71वें वेनिस फिल्म समारोह में किया गया था, जिसके बाद से विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर फिल्म ने कुल 18 अवॉर्ड जीते हैं. वेनिस फिल्म समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म और तम्हाणे को ‘लॉयन ऑफ द फ्यूचर’ सम्मान मिला, वहीं विएना अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी ‘कोर्ट’ सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित की गई.

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Court-Indian-Posterआप कह चुके हैं कि आपकी फिल्म आलोचना नहीं है. हालांकि  ‘कोर्ट’  की सराहना इसलिए ज्यादा हुई क्योंकि इसमें भारतीय न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी की गई है. इसे किस तरह से देखते हैं?

यह एक रोचक सवाल है. किसी संस्था से ज्यादा मेरा ध्यान मानवीय पहलू पर था. या यूं कह सकते हैं कि मेरी दिलचस्पी मशीन से ज्यादा उसके कलपुर्जों में है. वैसे भारतीय न्याय व्यवस्था की कमियां दिखाने के लिए आपको किसी काल्पनिक फिल्म की जरूरत नहीं. मेरे लिए सिनेमा अकादमिक होने से ज्यादा प्रयोगधर्मी और भावुक माध्यम है. इसलिए भारतीय न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी के लिए जब भी फिल्म की सराहना होती है तो मैं सोचता हूं कि यह लोगों से प्रभावी तौर पर जुड़ने में नाकाम रही. फिल्म निश्चित रूप से कमियों को छूती है, लेकिन मेरे दिमाग में फिल्म का मूल अर्थ ये नहीं था.

गैर कलाकारों के साथ काम करने और उनके साथ लगातार लंबे दृश्य फिल्माने के अपने निर्णय के बारे में क्या कहेंगे ?

शुरुआत से ही मैं इस बात को लेकर स्पष्ट था कि मैं फिल्म के लिए जितना संभव हो सकेगा उतने गैर कलाकार लूंगा. समाज के कई तबकों से हमने लोगों को चुना, जिसमें शिक्षक, बैंकर, चपरासी, टैक्सी ड्राइवर और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे. फिल्म के कलाकारों के लिए ऑडिशन लेने और उन्हें चुनने में ही एक साल का समय गुजर गया. कई बार यह प्रक्रिया काफी कठिन लगती थी. सबसे बड़ी चुनौती इन लोगों से चार से पांच मिनट के संवाद बिना किसी रुकावट के बुलवाना था. अगर कोई भी एक संवाद बोलने में गलती करता था तो हमें पूरी प्रक्रिया फिर से दोहरानी पड़ती थी. इस प्रक्रिया ने न सिर्फ हमारे धैर्य की परीक्षा ली बल्कि फिल्म की शूटिंग का समय और बजट भी बढ़ाया. लेकिन हां, मुझे लगता है कि इस मेहनत का प्रतिफल भी मिला. इन गैर कलाकारों ने फिल्म में अपनी जिंदगी के अनुभवों को समेटा है, जिसनेे फिल्म को एक अलग ही रंग दिया है. इसके अलावा इन गैर कलाकारों में दूसरे अभिनेताओं की तरह किसी भी तरह की असुरक्षा की भावना नहीं थी, इसलिए उनके साथ काम करना काफी आसान रहा. एक निर्देशक और कलाकार के संबंधों के अलावा इंसान होने के नाते भी यह एक तरह का समृद्ध अनुभव था. मुझे कभी भी ऐसा मौका नहीं मिलता कि मैं समाज के अलग-अलग तबकों से आने वाले लोगों से बातचीत करता और उनके साथ घुलमिल पाता.

क्या आप इस तरह के सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर काम जारी रखेंगे?

मैंने इस तरह की कोई कसम नहीं खाई है. न तो ऐसा मेरा एजेंडा है और न ही मैं इस तरह के खांचों में खुद को सीमित रखना चाहता हूं. ऐसा कहा जाता है कि मैंने इस तरह के सामाजिक-राजनीतिक तत्वों को महसूस करते हुए फिल्म की स्क्रिप्ट में शामिल किया था. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब आप एक बार इस तरह की वास्तविकता से परिचित हो जाते हैं तो उन्हें नकारना कठिन होता है.

 

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