आरक्षण की आग

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सभी फोटो- व‌िजय पांडेय

18 फरवरी, 2016; तूफान से पहले की शांति थी उस दिन हरियाणा में. तूफान, जो पूरे राज्य को अपनी चपेट में लेने वाला था. जिसका केंद्र रोहतक था. यातायात पूरी तरह ठप था, शहर के अंदर-बाहर कुछ-कुछ दूरी पर रास्ते बंद थे. लंबे-लंबे जाम लगे हुए थे. बाजार तो खुले थे पर ग्राहक नहीं थे, सड़कें सूनी थीं. स्कूल-कॉलेजों और कार्यालयों में ताले जड़े थे. परीक्षाएं स्थगित कर दी गई थीं. जाट प्रदर्शनकारी सड़कों और रेलवे लाइनों पर तंबू गाड़े और हाथों में हथियार लिए बैठे हुए थे तो दूसरी तरफ चौक-चौराहों पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के भी हथियारबंद जवान तैनात थे. धारा 144 लगी थी. इस सबने एक दहशत भरी खामोशी को जन्म दे दिया था. मानो सुई के भी फर्श पर गिरने पर उसकी आवाज चंडीगढ़ में बैठे हुक्मरानों की गद्दी हिला सकती थी. लेकिन किसी भी तूफान के आने से पहले उसके अनुकूल परिस्थितियां भी बनती हैं. हरियाणा और उसके वासियों की याद में हमेशा के लिए एक काला अध्याय बनकर बस जाने को तैयार वह तूफान भी कोई अचानक नहीं उठने वाला था. उसकी नींव भी लगभग हफ्ता भर पहले रखी जा चुकी थी.

12 फरवरी की वह सुबह कहने को तो किसी आम सुबह की ही तरह थी लेकिन अपने साथ वह हरियाणा की बर्बादी का पैगाम भी लाई थी. जिस जाट आरक्षण की आग में हरियाणा जल उठा, उसका बीज इसी दिन हिसार में बोया गया था. अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के बैनर तले हवा सिंह सांगवान ने अपने समर्थकों के साथ हिसार के मय्यड़ गांव में रेलवे ट्रैक बंद कर दिया. सरकार ने बातचीत के प्रयास तेज किए. बातचीत सफल हुई और 14 तारीख को बंद खुल भी गया. लेकिन उसी दिन रोहतक के सांपला में रोहतक, झज्जर और सोनीपत के खाप चौधरियों ने ‘जाट स्वाभिमान’ रैली निकाली जिसमें तय हुआ कि सरकारी आश्वासन के मुताबिक 31 मार्च तक इंतजार करेंगे. लेकिन मंच की तस्वीर तब बदल गई जब वहां मौजूद युवा जाट नेताओं ने खाप मुखिया और दूसरे प्रमुखों के फैसले के खिलाफ बगावत करके मंच पर कब्जा जमा लिया. उनके आह्वान पर रोहतक को दिल्ली से जोड़ने वाले नेशनल हाइवे 10 को जाटों ने बंद कर दिया. दूसरे दिन रोहतक को दिल्ली, झज्जर, सोनीपत और पानीपत से जोड़ने वाली सड़कों और रोहतक-दिल्ली रेलवे ट्रैक को भी बंद कर दिया. 78 ट्रेनें प्रभावित हुईं, 600 ट्रक जाम में फंस गए. स्कूल-कॉलेजों की बसें फंस गईं, बच्चे रोते-बिलखते रहे, एंबुलेंस में मरीज तड़पते रहे, मिन्नतें करते रहे पर बीच रास्ते तंबू गाड़कर बैठे जाट प्रदर्शनकारी बेपरवाह हुक्का पीते रहे. किसी की परीक्षा छूटी तो किसी के घर बारात न पहुंच सकी. किसी का माल ट्रकों में फंसा रह गया तो किसी की फ्लाइट छूट गई. अगले दिन तक रोहतक राज्य से पूरी तरह कट गया. जींद, भिवानी, हिसार सहित मुख्य व वैकल्पिक सभी मार्ग बंद थे. पचास से ज्यादा जगह जाम थे. चार रेलवे ट्रैक ठप थे. पेट्रोल पंप सूख चुके थे. जिस एनएच 10 से रोजाना 20-30 हजार ट्रक गुजरते थे, वहां खड़े ट्रकों में फल, सब्जी, दूध सड़ रहे थे और शहर में खाने-पीने के सामानों के दाम आसमान छू रहे थे. अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अलग-अलग गुटों ने भी इस नेतृत्वविहीन आंदोलन को अपना समर्थन दे दिया. मय्यड़ में रेल ट्रैक बंद कर दिया गया. सतगामा खाप ने दिल्ली-दादरी मार्ग बंद करके चेतावनी दी कि अगर राज्य सरकार हमारी मांगों पर गंभीरता नहीं दिखाती तो हम जबरदस्ती मांगें मनवाएंगे.

‘रोहतक हमेशा सौहार्दपूर्ण रहा है. जातीय मतभेद यहां कभी ऐसे नहीं रहे. राजनीतिक स्वार्थवश समाज को तोड़ने के लिए यह बोया गया बीज था’

अगले दिन आंदोलन और ज्यादा व्यापक हो गया. हिसार-चंडीगढ़ का रास्ता भी बंद हो गया. कई दूसरे क्षेत्रों में प्रदर्शन होने लगे. शहर के अंदर भी आंदोलन ने प्रवेश कर लिया. जाट छात्र महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू) और जाट कॉलेज पर ताला जड़ सामने ही धरने पर बैठ गए. जाट अब तक निहत्थे थे पर अब उनके हाथों में लाठी-डंडे, कुल्हाड़ी जैसे हथियार चमक रहे थे. दहशत ने पैर पसारे तो ऑफिस भी बंद हो गए. जनजीवन तो पहले से ही अस्त-व्यस्त था, लोगों को खाने तक के लाले पड़ रहे थे. सरकार ने खाप प्रतिनिधियों की मीटिंग बुलाई. ईबीसी कोटा बढ़ाने पर सहमति बनी. पर अब तक स्थिति खाप मुखियाओं के हाथों से निकल चुकी थी. आंदोलनकारी युवा जाट बस ओबीसी के तहत आरक्षण की मांग पर अड़े थे. जाट आरक्षण के विरोध में ओबीसी जातियां भी सड़कों पर उतर आईं. स्थिति बिगड़ती देख बीएसएफ, पुलिस के दंगा निरोधक दस्ते और पैरामिलिट्री फोर्स ने मोर्चा संभाला. गनीमत यह थी कि अब तक हिंसा की एक भी घटना सामने नहीं आई थी. जो चल रहा था शांतिपूर्वक चल रहा था. लेकिन 18 तारीख को शांति तब भंग हुई जब जाट और गैर-जाट आमने-सामने आ गए. दोनों के बीच हिंसक झड़प हुई.  तूफान उठ चुका था. बस उसका फैलना बाकी था. कई गाड़ियां फूंक दी गईं. दुकानों में तोड़-फोड़ और लूटपाट की गई.

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जाट आरक्षण की आग पहले ही रोहतक से होकर सोनीपत, पानीपत, हिसार, जींद, भिवानी, रेवाड़ी, झज्जर, फरीदाबाद, करनाल, गुड़गांव, फतेहाबाद, सिरसा सहित प्रदेश के 16 जिलों में फैल गई थी. हर जगह रेलवे ट्रैक, हाइवे और सड़कें जाम कर दी गईं. जाम खुलवाने गए सुरक्षा बलों पर पथराव होने लगा. नतीजतन टकराव के हालात बने. सुरक्षा बलों ने भी बल प्रयोग किया. प्रदर्शनकारियों ने निजी व सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाना चालू कर दिया. दुकान, घर, अस्पताल, मॉल, स्कूल, कॉलेज, शोरूम, हर जगह तोड़-फोड़ करने के बाद लूटपाट करके उन्हें आग के हवाले कर दिया गया. वाहनों को आग लगा दी गई, पटरियां उखाड़ दी गईं, रेलवे स्टेशन जला दिए गए. एक वाहन शोरूम के मालिक देवराज गोयल बताते हैं, ‘मेरे ही सामने मेरे शोरूम में तोड़-फोड़ की गई. मैं बाहर खड़ा बस देखता रह गया. मदद को फोन लगाया पर कोई मदद नहीं आई. उन्होंने पहले शोरूम तोड़ा, फिर उनमें से कुछ बाइक लूटकर भाग गए. बाद में शोरूम में आग लगा दी.’ 

हिंसा के दौरान चुन-चुनकर गैर-जाटों को निशाना बनाया गया था. दूसरी ओर गैर-जाट भी जाटों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे. आरक्षण की मांग जातीय हिंसा में बदल गई थी जिसमें आम आदमी भी पिसा. राहगीरों को रोक-रोककर मारपीट और लूटपाट की गई. बाइक सवारों पर ईंट-पत्थरों से हमला किया गया. रोहतक, झज्जर, भिवानी, हिसार सहित कई जिलों में कर्फ्यू लगाना पड़ा. यह अगले सात दिन तक चला. ‘हरित प्रदेश’, ‘लाल प्रदेश’ में तब बदल गया जब प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षाबलों पर फायरिंग की गई और जवाबी कार्रवाई में प्रदर्शनकारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी. हिंसा के दौरान 30 लोगों की जान गई. 13 झज्जर, आठ सोनीपत, पांच रोहतक, दो जींद, एक-एक कैथल व हिसार में मारे गए. इस दौरान पर्यावरण को भी खूब नुकसान पहुंचाया गया. रास्ते जाम करने के लिए हजारों की संख्या में पेड़ काट दिए गए. नहरों को क्षतिग्रस्त किया गया. जिससे दिल्ली को पानी की सप्लाई बंद हो गई.

‘राजनीति को धर्म नहीं मिला लड़ाने को तो उसने जातीय हिंसा की राह पकड़ ली. यह परंपरा हरियाणा को आगे भी जातीय हिंसा की आग में जलाएगी’

जाट आरक्षण की लड़ाई के हिंसात्मक होने पर सर्वखाप पंचायत मुखिया टेकराम कंडेला कहते हैं, ‘हिंसा फैलाने वाले जाट नहीं थे. सांसद राजकुमार सैनी ने दूसरी जाति वालों को भड़काकर ऐसा करवाया था. हम सालों से आरक्षण की मांग के लिए धरना दे रहे हैं. पर कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया. हमें बदनाम किया जा रहा है. मामले की जांच हो और गुनाहगारों की पहचान की जाए.’ रोहतक के एमडीयू में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रणवीर गुलिया कहते हैं, ‘रोहतक हमेशा सौहार्दपूर्ण रहा है. जातीय मतभेद यहां कभी ऐसे नहीं रहे कि हिंसा में बदल जाएं. राजनीतिक स्वार्थवश समाज को तोड़ने के लिए यह बीज बोया गया था. कभी भी हरियाणा में सैनी-जाट के बीच मतभेद नहीं दिखे. ये सांसद राजकुमार सैनी ने पैदा किए. ‘35 बिरादरी समिति’ की परिकल्पना रचकर एक जाति बनाम 35 जाति का माहौल उन्होंने ही बनाया. यही समिति जातीय हिंसा के केंद्र में रही.’ आम आदमी पार्टी के नेता नवीन जयहिंद का कहना है, ‘अकेले जाटों को दोष नहीं दिया जा सकता, गैर-जाट भी हिंसा में बराबर से शामिल थे और जहां तक लूटपाट की बात है तो जब भी कोई दंगा भड़कता है तो असामाजिक तत्व तो अपने आप ही सक्रिय हो जाते हैं. उन्हें लूटपाट करने के लिए खुला मैदान मिल जाता है. तो अकेले जाटों को दोषी ठहराना भी ठीक नहीं.’

वैसे आंदोलन के हिंसक होने के पीछे इसका नेतृत्वविहीन होना भी एक कारण रहा. जाट संघर्ष समिति और खापों ने आरक्षण का बीज तो जाट युवाओं के मन में बो दिया पर वे जाट युवाओं को संभाल नहीं सके. जाट युवा किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थे. आंदोलन में शामिल जाटों के एक दल से बात हुई. उनका कहना था, ‘हम स्वयं आठ-दस गांवों के लोगों ने आकर जाम लगाया है, हमारा खाप या किसी से कुछ लेना-देना नहीं. हर बार खाप नेता अपना उल्लू सीधा कर आंदोलन वापस ले लेते हैं पर इस बार आर-पार की लड़ाई होगी.’ वहीं हिंसा भड़काने में नेता और अधिकारी भी पीछे नहीं रहे. एक एसडीएम का वीडियो सामने आया जहां वे भीड़ को संबोधित कर रही हैं और उसे आंदोलन जारी रखने के लिए भड़का रही हैं. वहीं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के पूर्व सलाहकार वीरेंदर सिंह की एक ऑडियो क्लिप सामने आई जिसमें वे एक खाप नेता को हिंसा बढ़ाने की बात कह रहे हैं. वीरेंदर सिंह पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हो गया है. हालात बद से बदतर हो जाने में पुलिस की भूमिका भी कम नहीं रही. नवीन जयहिंद आंखों देखा हाल बताते हैं, ‘पुलिस और प्रशासन पूरी तरह से नाकाम रहा. रोहतक को खुला छोड़ा था मरने-मारने के लिए. लोग अपनी सुरक्षा खुद कर रहे थे. हाथों में हथियार लिए बैठे थे. कोई उन पर वार करता तो वो पलटकर वार करते. इस दौरान पुलिस कहीं नहीं थी. कई जगह तो पुलिस के सामने ही हिंसा होती रही और वह मूकदर्शक बनी रही. जिस दिन हिंसा की शुरुआत हुई, उसी दिन पुलिस की कार्रवाई सवालों के घेरे में रही. पहले तो दोनों विरोधी गुटों को बार-बार आमने-सामने आने दिया गया. उसके बाद नेकीराम कॉलेज के हॉस्टल में घुसकर छात्रों को पीटा, यहीं से परिस्थितियां बदली थीं.’ पुलिस भी जातीय तौर पर विभाजित हो गई थी, ऐसे भी आरोप पुलिस पर लगे. वहीं एक ऐसा भी वीडियो सामने आया जहां पुलिस का जवान ही लूटपाट करने वाले की पीठ थपथपा रहा है.

‘मेरे ही सामने मेरे शोरूम में तोड़-फोड़ की गई. मैं बाहर खड़ा बस देखता रह गया. मदद को फोन लगाया पर कोई मदद नहीं आई’

चुन-चुनकर निशाना बनाया गया

हिंसा के दौरान चुन-चुनकर एक विशेष जाति को निशाना बनाया गया. झज्जर में बस स्टैंड के पास सैनी समुदाय की पांच दुकानें जलाई गईं. लेकिन बगल की एक दुकान छोड़ दी गई क्योंकि वह जाट की थी. इसी तरह कैथल में भी सैनियों की दुकानों और शोरूमों को निशाना बनाया गया. सैनियों के साथ पंजाबियों को भी निशाना बनाया गया. दूसरी ओर गैर-जाटों ने भी जाटों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. भिवानी स्थित बालाजी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के मालिक अतुल ने मीडिया को बताया, ‘मैं घर पर था, चौकीदार का फोन आया कि 50-60 लोग कॉलेज के अंदर घुसकर तोड़-फोड़ कर रहे हैं. वो कह रहे हैं कि यह कॉलेज जाट का है, बर्बाद कर दो. वो कॉलेज की बस और शीशे तोड़कर लगभग 25 लाख का नुकसान कर गए.’ यही बात हरियाणा ऑटोमोबाइल एसोसिएशन के अध्यक्ष जगमोहन मित्तल बताते हैं, ‘दंगों के दौरान रोहतक के ऑटोमोबाइल डीलरों को 100 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा. ज्यादातर एक-दो विशेष जाति वालों के शोरूम निशाने पर रहे.’  जाटों के खिलाफ राजकुमार सैनी की लगातार बयानबाजी के चलते सैनी निशाना बने पर पंजाबी क्यों निशाना बने? नवीन जयहिंद बताते हैं, ‘वकील न्यायालय परिसर में धरने पर बैठे हुए थे. 35 बिरादरी वालों ने उनकी पिटाई कर दी. इससे ये अफवाह फैल गई कि पंजाबियों को जाटों ने मारा. इसके बाद एक और अफवाह फैली कि पंजाबियों ने छोटू राम की प्रतिमा तोड़ दी, बस इन अफवाहों के चलते पंजाबियों से जाटों की ठन गई.

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अमानवीयता की सारी हदें पार

मिंटू नाम के एक शख्स का शव धनीपाल गांव के खेतों में मिला. उसे दो गोलियां लगी थीं. वह गांव अपने रिश्तेदारों से मिलने गया था. गांव में जाटों ने हमला बोल दिया. गोलीबारी की और घर जलाए. झज्जर में जाट प्रदर्शनकारियों ने एक कॉलोनी पर हमला बोल दिया, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई और 22 लोग घायल हो गए. वहीं एनएच-1 हाइवे पर प्रदर्शनकारी तबाही के दूत बनकर निकले. जो रास्ते में मिला, उसे जला डाला. होटल, ढाबा, कॉलेज, मालगाड़ी, पुलिस पोस्ट.

एक प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं, ‘दिल्ली-चंडीगढ़ हाइवे पर लगभग 500 गाड़ियां फंसी हुई थीं. पानीपत के पास दो गुरुद्वारों में हमने शरण ले रखी थी. देर रात वहां पुलिस ने आकर बोला कि अब हालात नियंत्रण में हैं, आप जा सकते हैं. जैसे ही यह खबर मिली सब एक साथ अपनी-अपनी गाड़ियां लेकर निकले. सबको जल्दी थी क्योंकि उनमें से अधिकांश को फ्लाइट पकड़नी थी. कई एनआरआई भी थे. हम मुरथल के निकट ही पहुंचे थे कि हमारी गाड़ियों पर पथराव शुरू हो गया. हथियारों से लैस भीड़ सड़क के दोनों ओर से निकलकर बाहर आ गई. लोगों में भगदड़ मच गई. लोग गाड़ियां छोड़कर यहां-वहां भागने लगे. वो लोग भी हमारे पीछे भाग-भागकर हम पर हमला कर रहे थे. उनमें से कई नशे में थे. जो लोग गाड़ियों से बाहर नहीं निकले, उन्हें जबरन बाहर निकालकर पीटा गया.’ मुरथल में ही इंसानियत को शर्मसार करने वाली कई घटनाएं सामने आईं. लोगों का दावा है कि प्रदर्शनकारी वहां महिलाओं को गाड़ियों में से खींच-खींचकर खेतों में ले गए और उनके साथ बलात्कार किया.

मंत्री-सांसदों को भी नहीं छोड़ा

हिंसा की चपेट में आने से पुलिस भी खुद को नहीं रोक सकी. लगभग डेढ़ दर्जन पुलिस चौकियां इस दौरान निशाना बनाई गईं. पुलिस के आला अधिकारियों के घर व ऑफिसों पर भी हमला किया गया. रोहतक में डीएसपी को बंधक बना लिया गया, जिसके बाद पुलिस फायरिंग में एक व्यक्ति की मौत भी हुई. वहीं नेताओं पर भी अनियंत्रित भीड़ का गुस्सा फूटा. राज्य के वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु सिंह का घर और अखबार का दफ्तर जला दिया. कांग्रेसी नेता सुभाष बत्रा के दामाद के घर पर भी हमला हुआ. चौटाला परिवार का पेट्रोल पंप भी आग के हवाले कर दिया. कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनकड़ का भी घर इस हिंसा की भेंट चढ़ गया. सांसद राजकुमार सैनी के घर भी पथराव और तोड़-फोड़ हुई. वहीं हिसार में पूर्व मंत्री अत्तर सिंह सैनी के भाई को गोली मार दी गई. नवीन जिंदल के कॉलेज को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश प्रदर्शनकारियों ने की. भिवानी-महेंद्रगढ़ सांसद धर्मवीर सिंह का घर भी पूरी तरह जला डाला.

बहरहाल, एसोचेम के अनुसार आंदोलन के पहले सात दिन में ही सरकारी व निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने और ट्रांसपोर्ट व व्यापार के ठप होने से 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान अर्थव्यवस्था को हो चुका था. वहीं रेलवे को भी 300 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा. 1400 ट्रेनें प्रभावित हुईं और 16 रेलवे स्टेशन जलाए गए. लेकिन नुकसान की स्थिति अब तक साफ नहीं हो सकी है. इसके आकलन के लिए समितियों का गठन किया जा चुका है. लेकिन जिन लोग के घर व दुकानें इस मानव निर्मित आपदा की भेंट चढ़ गए वे मुआवजा पाने के लिए सरकार के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं.

दूसरी ओर राजनीतिक स्तर पर देखा जाए तो आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो चुका है. सत्तापक्ष विपक्ष को हिंसा का साजिशकर्ता ठहरा रहा है तो विपक्षी दल इसे सरकार की नाकामी मान रहे हैं. इस सबके बीच हरियाणा सरकार को जो आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है उसकी भरपाई करना भी उसके लिए आसान नहीं होगा. आंदोलन और हिंसा के बीच हरियाणा के भविष्य का भी सवाल है कि आगे ये जातीय मतभेद कौन-सी करवट बदलेगा. नवीन जयहिंद कहते हैं, ‘हरियाणा में राजनीति को कोई धर्म नहीं मिला लड़ाने को तो उसने जातीय हिंसा की राह पकड़ ली. यह तो अभी शुरुआत है. ये जो 35 बिरादरी की परंपरा रखी गई है, वो हरियाणा को आगे भी जातीय हिंसा की आग में जलाएगी.’