आरक्षण की आग

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मिंटू नाम के एक शख्स का शव धनीपाल गांव के खेतों में मिला. उसे दो गोलियां लगी थीं. वह गांव अपने रिश्तेदारों से मिलने गया था. गांव में जाटों ने हमला बोल दिया. गोलीबारी की और घर जलाए. झज्जर में जाट प्रदर्शनकारियों ने एक कॉलोनी पर हमला बोल दिया, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई और 22 लोग घायल हो गए. वहीं एनएच-1 हाइवे पर प्रदर्शनकारी तबाही के दूत बनकर निकले. जो रास्ते में मिला, उसे जला डाला. होटल, ढाबा, कॉलेज, मालगाड़ी, पुलिस पोस्ट.

एक प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं, ‘दिल्ली-चंडीगढ़ हाइवे पर लगभग 500 गाड़ियां फंसी हुई थीं. पानीपत के पास दो गुरुद्वारों में हमने शरण ले रखी थी. देर रात वहां पुलिस ने आकर बोला कि अब हालात नियंत्रण में हैं, आप जा सकते हैं. जैसे ही यह खबर मिली सब एक साथ अपनी-अपनी गाड़ियां लेकर निकले. सबको जल्दी थी क्योंकि उनमें से अधिकांश को फ्लाइट पकड़नी थी. कई एनआरआई भी थे. हम मुरथल के निकट ही पहुंचे थे कि हमारी गाड़ियों पर पथराव शुरू हो गया. हथियारों से लैस भीड़ सड़क के दोनों ओर से निकलकर बाहर आ गई. लोगों में भगदड़ मच गई. लोग गाड़ियां छोड़कर यहां-वहां भागने लगे. वो लोग भी हमारे पीछे भाग-भागकर हम पर हमला कर रहे थे. उनमें से कई नशे में थे. जो लोग गाड़ियों से बाहर नहीं निकले, उन्हें जबरन बाहर निकालकर पीटा गया.’ मुरथल में ही इंसानियत को शर्मसार करने वाली कई घटनाएं सामने आईं. लोगों का दावा है कि प्रदर्शनकारी वहां महिलाओं को गाड़ियों में से खींच-खींचकर खेतों में ले गए और उनके साथ बलात्कार किया.

मंत्री-सांसदों को भी नहीं छोड़ा

हिंसा की चपेट में आने से पुलिस भी खुद को नहीं रोक सकी. लगभग डेढ़ दर्जन पुलिस चौकियां इस दौरान निशाना बनाई गईं. पुलिस के आला अधिकारियों के घर व ऑफिसों पर भी हमला किया गया. रोहतक में डीएसपी को बंधक बना लिया गया, जिसके बाद पुलिस फायरिंग में एक व्यक्ति की मौत भी हुई. वहीं नेताओं पर भी अनियंत्रित भीड़ का गुस्सा फूटा. राज्य के वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु सिंह का घर और अखबार का दफ्तर जला दिया. कांग्रेसी नेता सुभाष बत्रा के दामाद के घर पर भी हमला हुआ. चौटाला परिवार का पेट्रोल पंप भी आग के हवाले कर दिया. कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनकड़ का भी घर इस हिंसा की भेंट चढ़ गया. सांसद राजकुमार सैनी के घर भी पथराव और तोड़-फोड़ हुई. वहीं हिसार में पूर्व मंत्री अत्तर सिंह सैनी के भाई को गोली मार दी गई. नवीन जिंदल के कॉलेज को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश प्रदर्शनकारियों ने की. भिवानी-महेंद्रगढ़ सांसद धर्मवीर सिंह का घर भी पूरी तरह जला डाला.

बहरहाल, एसोचेम के अनुसार आंदोलन के पहले सात दिन में ही सरकारी व निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने और ट्रांसपोर्ट व व्यापार के ठप होने से 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान अर्थव्यवस्था को हो चुका था. वहीं रेलवे को भी 300 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा. 1400 ट्रेनें प्रभावित हुईं और 16 रेलवे स्टेशन जलाए गए. लेकिन नुकसान की स्थिति अब तक साफ नहीं हो सकी है. इसके आकलन के लिए समितियों का गठन किया जा चुका है. लेकिन जिन लोग के घर व दुकानें इस मानव निर्मित आपदा की भेंट चढ़ गए वे मुआवजा पाने के लिए सरकार के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं.

दूसरी ओर राजनीतिक स्तर पर देखा जाए तो आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो चुका है. सत्तापक्ष विपक्ष को हिंसा का साजिशकर्ता ठहरा रहा है तो विपक्षी दल इसे सरकार की नाकामी मान रहे हैं. इस सबके बीच हरियाणा सरकार को जो आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है उसकी भरपाई करना भी उसके लिए आसान नहीं होगा. आंदोलन और हिंसा के बीच हरियाणा के भविष्य का भी सवाल है कि आगे ये जातीय मतभेद कौन-सी करवट बदलेगा. नवीन जयहिंद कहते हैं, ‘हरियाणा में राजनीति को कोई धर्म नहीं मिला लड़ाने को तो उसने जातीय हिंसा की राह पकड़ ली. यह तो अभी शुरुआत है. ये जो 35 बिरादरी की परंपरा रखी गई है, वो हरियाणा को आगे भी जातीय हिंसा की आग में जलाएगी.’