ह्त्याग्रही गांधी!


अब तक अपने भाषणों से वरुण की कानूनी मुश्किलें तो बढ़ चुकी थीं लेकिन उनका चुनावी पैतरा कामयाब हो गया था. उनके समर्थकों ने सारे पीलीभीत में उनको हिंदू नेता के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया. ‘वरुण नहीं है आंधी है, दूसरा संजय गांधी है’ सरीखे नारों और पोस्टरों से सारा पीलीभीत भरा जा चुका था. पीलीभीत में रहने वाले भाकपा (माले) के कार्यकर्ता अफरोज आलम बताते हैं, ‘वरुण गांधी ने पूरे चुनाव को ही हिंदू-मुस्लिम लड़ाई में तब्दील कर दिया था. अपनी सभा वो इसी बात से शुरू करते थे कि जो भी मुसलमान यहां मौजूद हैं वो लौट जाएं, मुझे किसी मुसलमान का वोट नहीं चाहिए. उन दिनों पीलीभीत के आस-पास के गांवों में उनके लोगों द्वारा कई अफवाहें भी फैलाई गईं. हर जगह सुनने को मिलता था कि दूसरे गांव में कुछ मुसलमान लड़कों ने एक हिंदू लड़की का बलात्कार कर दिया है. या फिर कुछ मुस्लिमों ने मिलकर हिंदू लड़कों की पिटाई कर दी है .

कई बार रात को 10-12 मोटर साइकिलों पर कुछ अज्ञात लोग लाठी-डंडे और मशाल लेकर निकलते थे और शोर मचाते हुए गुज़र जाते थे. अगले दिन सुबह अफवाहें फैल जाती थीं कि वो मुस्लिम लुटेरे थे.’

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अपनी मनचाही चुनावी जमीन तैयार कर लेने के बाद अब वरुण को चिंता थी अपने खिलाफ दर्ज हुए आपराधिक मामलों से निपटने की. उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करके अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे खारिज किए जाने की मांग की. उच्च न्यायालय ने उनके मुकदमे खारिज करने के बजाय 25 मार्च, 2009 को वरुण की इस याचिका को ही ख़ारिज कर दिया. अब उन्हें कभी भी खुद के गिरफ्तार हो जाने का डर था. लिहाजा अपनी गिरफ्तारी को राजनीतिक रंग देने और उससे सियासी फायदा उठाने के लिए उन्होंने खुद ही अदालत में आत्मसमर्पण करने का फैसला किया. अपनी गिरफ्तारी का माहौल बनाने के लिए उन्होंने अपने लोगों को बाकायदा निर्देश दिए. योजनाबद्ध तरीके से जेल और कोर्ट के बाहर भारी भीड़ जुटाई गई. मगर उस दिन पीलीभीत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने यह कहकर वरुण गांधी की योजना की हवा निकाल दी कि अदालत के संज्ञान में अभी तक यह मामला किसी भी औपचारिक माध्यम से नहीं पहुंचा है, इसलिए अदालत उन्हें जेल नहीं भेज सकती. वरुण गांधी की सारी योजना धराशायी होती दिख रही थी. अब एक नया दांव चला गया. भाजपा के तत्कालीन जिला अध्यक्ष योगेंद्र गंगवार ने कोर्ट को शपथपत्र दिया कि वरुण गांधी के खिलाफ दो आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं और वे स्वयं ही जेल जाना चाहते हैं लिहाजा उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाए (तहलका के पास उस शपथपत्र की कॉपी मौजूद है). जाहिर है वरुण पूरी तैयारी कर चुके थे और वे अपनी योजना को यों ही असफल नहीं होने देना चाहते थे.

किस तरह से योजनाबद्ध तरीके से इस सबको अंजाम दिया गया इसके बारे में पीलीभीत के वर्तमान भाजपा जिला उपाध्यक्ष और वरुण गांधी के बेहद करीबी परमेश्वरी दयाल गंगवार तहलका के खुफिया कैमरे पर बताते हैं, ‘हमें दिल्ली से फैक्स आ चुका था कि सरेंडर वाले दिन इतनी-इतनी भीड़ हो जानी चाहिए. हमने कहा हो जाएगी साहब. पुलिस लग गई थी गाजियाबाद से, नोएडा से. लेकिन गांधी परिवार तो गांधी परिवार है . हम-तुम तो सोच ही नहीं सकते वो बात. मुरादाबाद हाईवे पे बाईपास पड़ता है, वहां से काफिले की नौ गाडि़यां निकल गईं सीधी बरेली और एक कट गई सितारगंज को. जहां से वो एक गाड़ी कट हुई वहां दस गाडि़यां और खड़ी थीं जो उसके साथ लग गईं. काफिला बरेली में रोका गया तो वरुण गांधी गायब मिले साहब. मुझे फोन आया कि जेल गेट पहुंच गए हैं.’

वरुण गांधी द्वारा जुटाई गई यह भीड़ आत्मसमर्पण के समय हिंसक प्रदर्शनों पर उतर आई. कई गाड़ियों और भवनों के शीशे फोड़ दिए गए, कई संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया गया और ईंट-पत्थरों की ऐसी बरसात की गई कि पांच पुलिसकर्मियों सहित लगभग 20 लोग घायल हुए. उनके इस अपराध के लिए उन पर और उनके साथियों पर एक और आपराधिक मुकदमा 28 मार्च को दर्ज किया गया. इस मामले में अदालत ने उन्हें चार मई, 2013 को इस स्टोरी के लिखे जाने के दौरान बरी कर दिया. हालांकि इस मामले से जुड़े तमाम ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी को मिला नहीं है और जिन्हें आगे के पन्नों में उठाया गया है.

वरुण के जेल जाते ही उनके इस सांप्रदायिक चुनावी अभियान की बागडोर उनकी मां मेनका गांधी ने संभाल ली. 28 मार्च को ही प्रदर्शन में घायल हुए लोगों को देखने जिला अस्पताल पहुंची मेनका गांधी ने घायलों के लिए एक मुस्लिम इंस्पेक्टर को जिम्मेदार ठहराते हुए बयान दिया ‘लगभग 45 लोगों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है. इन घायलों में से 25 लोगों को एक ही पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा घायल किया गया है जिसका नाम है परवेज़ मियां.’ मगर तहलका को मिली जानकारी से ऐसा लगता है कि इंस्पेक्टर परवेज़ मियां घटना के वक्त मौके पर मौजूद ही नहीं थे.

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बहरहाल वरुण गांधी 20 दिन के लिए जेल चले गए. जब वे जमानत पर जेल से लौटे तो सारा माहौल हिंदू बनाम मुस्लिम में तब्दील हो चुका था और वे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ बन चुके थे. अपने पहले ही चुनाव में इस गांधी ने सोनिया और राहुल गांधी को भी पछाड़ते हुए लगभग तीन लाख वोटों की बढ़त से जीत दर्ज की और संसद पहुंच गए. अब तक वरुण के खिलाफ आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन, स्थानीय लोगों से मारपीट, भड़काऊ भाषण देने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, धर्म के नाम पर लोगों को उकसाने, पुलिस टीम पर जानलेवा हमला करवाने और बलवा करवाने के कई मुकदमे दर्ज हो चुके थे. 2009 के बाद से वरुण फिर कभी भी इतनी चर्चाओं में नहीं रहे. उनके खिलाफ दर्ज हुए आपराधिक मुकदमों की सुनवाई पीलीभीत की अदालत में चलती रही. पिछले दिनों अचानक ही वरुण फिर से चर्चाओं में आ गए जब भड़काऊ भाषण से जुड़े दोनों मामलों में उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया.

मेहरबान सपा सरकार

वरुण कैसे सारे मामलों में बरी हो गए इस पर चर्चा करने से पहले बात करते हैं उस पृष्ठभूमि की जो इन सब मामलों को निपटाने के लिए तैयार की गई. वरुण पर मेहरबानियों की शुरुआत हुई उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद. पिछले साल अक्टूबर में उत्तर प्रदेश के कई अख़बारों में यह खबर छपी कि अखिलेश सरकार वरुण गांधी के सभी मुकदमे वापस लेने वाली है और न्यायिक विभाग से इन मामलों की मेरिट भी मांगी गई है. लेकिन इस खबर के सार्वजनिक होते ही कई मुस्लिम संगठनों और दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने इसका विरोध कर दिया. बढ़ते विरोध के चलते मुकदमे वापस तो नहीं हुए लेकिन उनके निपटारे में ऐसी तेजी आई जो शायद पीलीभीत के पूरे इतिहास में कभी नहीं देखी गई होगी. पांच-पांच, दस-दस दिन पर तारीखें पड़ने लगीं, कुछ ही समय में सारे गवाह पक्षद्रोही घोषित हो गए और वरुण गांधी बरी हो गए. पीलीभीत जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अश्विनी अग्निहोत्री बताते हैं, ‘मैं कई सालों से पीलीभीत में वकालत कर रहा हूं. मेरी नजर में आज तक एक भी मामला ऐसा नहीं आया है जब एक ही दिन में इतने लोगों की गवाही हो गई हो जितने लोग वरुण के मामलों में एक-एक दिन में परीक्षित हुए.’

पार्टी विरोधी गांधी
आखिर प्रदेश की सपा सरकार वरुण गांधी पर इतनी मेहरबान क्यों थी? इसकी तहकीकात करने पर हमने पाया कि भाजपा का यह युवा महासचिव जिसके भरोसे भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने पुराने दिन लौटने की उम्मीद कर रही है उसने 2012 के विधानसभा चुनाव में अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को हराने और पीलीभीत से सपा के उम्मीदवार को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.  ‘महासचिव’ वरुण गांधी ने पीलीभीत से अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी सतपाल गंगवार को चुनाव हराने के निर्देश दिए. तहलका को मिले एक ऑडियो में वरुण के बेहद करीबी और पीलीभीत में उनके मीडिया प्रभारी रिजवान मलिक पीलीभीत भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष मोहम्मद सदर को स्पष्ट रूप से निर्देश दे रहे हैं कि भाजपा प्रत्याशी सतपाल गंगवार को चुनाव हराना है क्योंकि वरुण गांधी ऐसा चाहते हैं.

रिजवान मलिक और मोहम्मद सदर की बातचीत के अंश :

रिजवान मलिक : यार, हमसे पूछो मत … मैं कह रहा हूं हमसे पूछो मत अब जो मुनासिब लग रहा है वो सोच-समझ के अब फैसला लो…
मोहम्मद सदर : जैसे…फिर भी तो कुछ-कुछ
मलिक : अरे यार, अब इससे ज्यादा साफ़ बात क्या है वरुण गांधी ने साफ कह दिया है सतपाल को जिताना नहीं है, सतपाल को वोट नहीं देना है, बात ख़तम. हराना है. अब ये आपको तय करना है कौन हराने वाला है. कौन जीतने वाला है , उसके साथ आप लग जाओ, क्या बोला जाए ..
मोहम्मद सदर : चलिए ठीक है फिर …
मलिक : ठीक है न ?

जब तहलका ने इस बात की पुष्टि भाजपा प्रत्याशी सतपाल गंगवार से करने की कोशिश की तो पहले तो वे बात करने से कतराते रहे लेकिन बाद में उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि वरुण ने उन्हें हराने का काम किया था और इस बात को साबित करने वाली एक और ऑडियो क्लिप उनके पास भी है.

सतपाल से तहलका की बातचीत के अंश :
तहलका : मैं बस आपसे ये जानना चाह रहा था कि वो जो लड़के ने वो वीडियो रिकॉर्ड किया था वो कहां का… किस मीटिंग का है वो एक्चुअली?
सतपाल : मीटिंग का नहीं टेलीफ़ोन का … टेलीफ़ोन पे ये कहा गया है कि बसपा को लड़ाओ ….
तहलका : बसपा को लड़ाओ या बसपा को जिताओ ?
सतपाल : हां बसपा को जिताओ, वही ..
तहलका : अच्छा तो उसमें वो  उसमें वरुण जी खुद बोल रहे हैं या उनका कोई आदमी है वो बोल रहा है ….
सतपाल : खुद बोले हैं वरुण गांधी

पीलीभीत की राजनीति को बेहद नजदीक से समझने वाले हारुन अहमद कहते हैं, ‘बसपा इस पूरी लड़ाई में कहीं थी ही नहीं. लोकसभा के चुनाव में जो हिंदू वोट भाजपा के पक्ष में ध्रुवित हुआ था वो अगर विधानसभा में भी हो जाता तो सतपाल गंगवार चुनाव जीत जाते. ऐसे में अगर भाजपा का अपना वोट बसपा के साथ बंट जाता तो उसका सीधा फायदा सपा को मिलना था. यही हुआ भी और सपा के रियाज अहमद चुनाव जीत गए. इस तरह से वरुण गांधी ने सपा को फायदा पहुंचाया और बदले में सपा ने उनके ऊपर दर्ज मामलों को वापस लेने की पहल की.’ ये वही रियाज अहमद हैं जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार में खादी और ग्रामोद्योग मंत्री और पार्टी की अल्पसंख्यक इकाई के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. इनके बारे में भाजपा के पीलीभीत जिला उपाध्यक्ष परमेश्वरी दयाल गंगवार तहलका के स्टिंग में बताते हैं कि इस मामले के मुस्लिम गवाहों को तोड़ने का काम रियाज अहमद को ही दिया गया था.

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तहलका की परमेश्वरी से बातचीत के अंश:
तहलका : तो गवाह वगैरह को कैसे मैनेज किया..?
परमेश्वरी: अरे…जैसे रियाज बाबू मंत्री हैं सपा से…और मुलायम सिंह से सीधे संबंध हैं गांधी जी के…उनके केस निपटाओ सारे…तभी वो…एक वो बुखारी दिल्ली वाले ने आवाज उठा दी…मुलायम ने तो बोल दिया था वापस लेने को लेकिन बुखारी ने आवाज उठा दी…
तहलका : हां उन्होंने तो बोला था बीच में वापस लेने के लिए…
परमेश्वरी: फिर जो मंत्री था यहां का …रियाज …उसपे दबाव डाल दिया…कि सारे मुसलमान गवाह हैं, फटाफट लगाओ , फटाफट उठाओ, फटाफट हटाओ… तो सारे मुसलमान उसने एक कर लिए रियाज ने… मैं गया था उस तारीख में…

रियाज अहमद का भी एक इतिहास है. वे मेनका गांधी के पुराने सहयोगी रहे हैं और जब उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रीय संजय मंच का गठन किया था तब रियाज अहमद उसके सचिव बने थे. पीलीभीत के पुराने नेताओं और पत्रकारों से बातचीत करने पर पता चलता है कि मेनका गांधी को पीलीभीत लाने वाले रियाज अहमद ही थे. हालांकि तहलका के साथ बातचीत में वे वरुण के मामले में अपनी और अपनी पार्टी की किसी भी तरह की भूमिका से यह कहकर इनकार कर देते हैं कि मामलों को खत्म करने की अर्जी स्वयं वरुण गांधी ने दी थी मगर वरुण के साथ अपने पारिवारिक संबंधों को वे कुछ इस तरह स्वीकार करते हैं, ‘हम उनके बाप के साथी हैं, उनकी अम्मा के साथी हैं.’

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अब चर्चा करते हैं उन तीन मुख्य मामलों की जिनमें वरुण के ऊपर संगीन आरोप थे और जिनके सिद्ध होने पर उन्हें जेल जाना पड़ सकता था, उनका राजनीतिक जीवन अवरुद्ध हो सकता था, और इन सबसे बचने के लिए नियम-कानून और न्यायिक प्रक्रियाओं को जमकर तोड़ा-मरोड़ा गया. हमारी मुलाकात के दौरान रियाज अहमद ने भी अन्य कई गवाहों की तरह ही हमें यह बात बताई कि वरुण के मामले में एक बहुत बड़े स्तर पर शासन, गवाहों और यहां तक कि न्यायपालिका तक को मैनेज किया गया. लेकिन इसके बारे में हम थोड़ा आगे बात करेंगे.

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