गोडसे के वारिस : हिंदुत्व आतंक के रचयिता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाम जमात-ए-इस्लामी

दक्षिण एशिया में धर्म विशेष की राजनीति करने वाले दो संगठनों- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है और जमात-ए-इस्लामी, जो इस्लामिक राज्य बनाने की बात करता है- में गजब की समानता दिखती है. दरअसल दोनों ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अनुषांगिक संगठनों, संस्थाओं एवं समविचारी समूहों का विशाल नेटवर्क तैयार किया है. ऐसे अनुषांगिक संगठनों में समाज के अलग-अलग तबकों के अलावा, अलग-अलग मुद्दों पर सक्रिय संगठन शामिल हैं.

सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किताब ‘परम वैभव के पथ पर (लेखक सदानंद दामोदर सप्रे) आरएसएस की ऐसी कार्यप्रणाली पर रोशनी डालती है. संघ से संबद्ध डॉ. सप्रे 31 छोटे-छोटे अध्यायों में संघ से संबद्ध विद्यार्थी परिषद से लेकर पूर्व सैनिक परिषदों जैसे संगठनों पर तथा प्रचार माध्यम एवं सामयिक महत्व के कार्य के अंतर्गत गोरक्षा आदि मामलों में संघ तथा उससे संबंधित संगठनों की सक्रियता को रेखांकित करती है, इनमें हिंदू जागरण मंच का भी जिक्र है. गौरतलब है कि जब हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ता कई सूबों में ईसाईविरोधी हिंसा फैलाने में लिप्त पाए गए थे, तब उससे किनारा करने में भी संघ ने वक्त नहीं गंवाया था. (देखें, पेज 15, गोडसेज चिल्ड्रेन, हिंदुत्व टेरर इन इंडिया)

बांग्लादेश के अनुभवों को लेकर प्रोफेसर अब्दुल बरकत का अध्ययन, बांग्लादेश में मूलवाद के राजनीतिक अर्थशास्त्र की चर्चा के बहाने वहां जड़ जमा चुकी जमात-ए-इस्लामी पर निगाह डालता है. (अंग्रेजी पत्रिका, मेनस्ट्रीम, मार्च 22-28, 2013) ढाका विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बरकत बताते हैं कि अपनी मूलवाद की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए अपने काडर आधारित नेटवर्क के माध्यम से जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश ने ‘वित्तीय संस्थानों, शैक्षिक संस्थानों, फार्मास्युटिकल एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थानों, धार्मिक संगठनों, यातायात से जुड़े संगठनों, रियल इस्टेट, न्यूज मीडिया और आईटी, स्थानीय प्रशासन, एनजीओ, हरकत-उल-जिहाल-अल-इस्लामी से लेकर जमाइतुल मुजाहिदीन बांग्लादेश’ जैसे संगठनों/समूहों का निर्माण किया है. ध्यान रहे कि यह वही जमाइतुल मुजाहिदीन बांग्लादेश है, जिसने अपनी आतंकी गतिविधियों के जरिए बांग्लादेश में कहर बरपा किया था, जिसकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने एक साथ बांग्लादेश के तमाम जिलों में बम विस्फोट करके आतंक मचाने की कोशिश की थी.

निश्चित ही संघ द्वारा अपने अनुषांगिक संगठन के तौर पर किसी आतंकी संगठन का निर्माण किया गया हो, इसकी आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है, मगर इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि 21वीं सदी की पहली दहाई में भारत के विभिन्न स्थानों पर हुए आतंकी हमलों में हिंदुत्ववादी विचारों से प्रेरित कार्यकर्ताओं की संलिप्तता देखी गई थी, जिनमें से कइयों के संघ से संबंधों का खुलासा हुआ है. कइयों के बारे में संघ ने इस बात की भी पुष्टि की है कि वह संघ के पूर्व कार्यकर्ता थे, तो यह उसके लिए आत्मपरीक्षण का भी वक्त है कि आखिर उसके जैसे अनुशासित कहे जाने वाले संगठन के कार्यकर्ता- जो अपने आप को ‘चरित्र निर्माण’ के लिए प्रतिबद्ध कहता हो- वह आखिर बम-गोलियों के सहारे मासूमों की हत्या क्यों कर रहे हैं?

विडंबना यही है कि संविधान को ताक पर रख कर काम करने वाले इन संगठनों पर अंकुश कायम करने की बजाय ऐसे हालात पैदा किए जा रहे हैं कि उन्हें आसानी से फलने-फूलने का रास्ता मिले. और यह प्रतीत हो रहा है कि भाजपा के केंद्र में सत्तारोहण के बाद हिंदुत्व आतंक की परिघटना एवं उससे जुड़े मामलों में शामिल लोगों को क्लीनचिट देने की तैयारी चल रही है. इस बदली हुई परिस्थिति को लेकर संकेत एक केंद्रीय काबिना मंत्री के बयान से भी मिलता है जिसमें उन्होंने हिंदू आतंक की किसी संभावना को सिरे से खारिज किया था और यह इस हकीकत के बावजूद कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी कम से कम 16 ऐसे उच्च-स्तरीय मामलों की जांच में मुब्तिला रही है, जिसमें हिंदुत्व आतंकवादियों की स्पष्ट संलिप्तता दिखती है और हिंदुत्व संगठनों के आकाओं पर से संदेह की सुई अभी भी हटी नहीं है.

ताजा समाचार यह है कि मालेगांव बम धमाके के असली कर्णधारों में शुमार किए जाने वाले कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ‘बेदाग बरी’ कर देगी. (http://economictimes.indiatimes.com/ news/politics-and-nation/ malegaon-blasts-nia-may-let-off-sadhvi-pragya-lt-colpurohit/ articleshow/ 49264576.cms)

और यह खबर पढ़ते ही देश के अंदर कुछ समय पहले सुर्खियां बनीं मुंबई की मशहूर वकील रोहिणी सालियान- जो मालेगांव बम धमाके में सरकारी वकील हैं- के उन साक्षात्कारों को याद किया जा सकता है, जिसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह राष्ट्रीय जांच एजेंसी की तरफ से उन पर दबाव पड़ रहा है कि वह मालेगांव बम धमाके में चुस्ती न बरतें. और हम इस बात को भी याद कर सकते हैं कि जिन दिनों इस मसले पर चर्चा चल ही रही थी कि समाचार मिला कि अजमेर बम धमाके (2007) में कई गवाह अपने बयान से मुकर चुके हैं और एनआईए द्वारा मध्य प्रदेश के संघ के प्रचारक सुनील जोशी की हत्या के मामले को अचानक फिर मध्य प्रदेश पुलिस को लौटा दिया जा रहा है. समाचार यह भी मिला था कि उसी राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने ‘अधूरे सबूतों’ की बात करते हुए मोदासा बम धमाका मामले में अपनी फाइल बंद करने का निर्णय लिया है.

21वीं सदी की दूसरी दहाई के मध्य में यह सवाल नए सिरे से मौजूं हो उठा है कि नाथूराम गोडसे के असली वारिस कहे जाने वाले यह आतंकी एवं उनके सरगना कभी अपने मानवद्रोही कार्यों की सजा पा सकेंगे?

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक हैं)

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