‘जीवन की जटिलता का प्रतीक है छंदमुक्त कविता’

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आप को केदार सम्मान भी प्राप्त हो चुका है. आप उनकी धारा के प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं. केदार की जनवादी कविता धारा में समकालीन कविता का क्या भविष्य हैं?
केदार जी की कविता से मैं प्रेम तो करता हूं लेकिन उनकी धारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता. केदार जी बहुत सरलरेखीय कवि हैं लेकिन उनके भीतर जो स्थानिक प्रेम और संघर्ष है, लोकजीवन के रंग व गंध हैं वे मुझे आकर्षित करते हैं. दूसरी बात कविता को इस तरह से वादों में बांटना सम्भव नहीं है. अब जनवाद, कलावाद, प्रगतिवाद आदि जो ‘इज्म’ हैं वे खत्म हो रहे हैं अब वादी-प्रतिवादी कविता का नहीं, संवादी कविता का युग आ रहा है.

तो क्या आप स्वयं को वैचारिक रूप से कहीं सम्बद्ध पाते हैं?
अवश्य! मेरी सम्बद्धता और प्रतिबद्धता उन असंख्य जनों के प्रति है जिनके जीवन के स्वप्न, आनंद, आदि लगातार समाप्त करने की कोशिश जारी है. मैं उनके साथ हूं, कोटि-कोटि जनों की आवाज में, उनकी चीत्कार, पुकार में, सदैव उनके साथ हूं.

समकालीन कविता में आप किसे प्रतिनिधि स्वर मानते हैं?
समकालीन कविता में प्रतिनिधि स्वर कहना कठिन है, क्योंकि एक समय ‘अज्ञेय’ जी ने कहा था- ‘मेरे पीछे तू आ-आ’ तो वे कवियों का आहवान कर रहे थे. उन्होंने प्रत्येक कवि को ‘अपनी-अपनी राहों का अन्वेषी’ कहा था. प्रत्येक कवि अपना रास्ता बनाते हुए आ रहा था. आज की कविता में ऐसा स्वर तलाशना बहुत कठिन है बल्कि मैं यह कहूंगा कि कविता में व्यंजन बहुत अधिक हो गए हैं, स्वर लुप्त हो गया है. ये कविताएं हमारे समय की व्यंजनबहुला कविताएं हैं, एक तरह से स्वरहीन कविता हैं. ‘धूमिल’ के समय तक ही कविता जीवंत दिखाई देती है, बल्कि नागार्जुन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, त्रिलोचन तक भी.

आपने एक बहुचर्चित कविता  ‘भारत घोड़े पर सवार है’  में एक जगह समलैंगिकता की बात की है. क्या आप वैश्विक ग्राम के संदर्भ में इसे भारतीय परम्परा का हनन मानते हैं?
उस कविता के संदर्भ में आप उसे हास-परिहास के रूप में देख सकते हैं. जहां तक समलैंगिकता की बात है यह दुनिया के हर समाज में, हर व्यवस्था, तंत्र में, चाहे वामपंथ हो या रामराज्य, रही है. और अब जब यह अस्मितामूलक आंदोलन के रूप में छिड़ा है, तो मैं इसका समर्थन करता हूं. क्योंकि यह वैयक्तिक आजादी का सवाल है. सेक्स मानव मात्र की अपरिहार्य जैविक आवश्यकता है. इसे नैतिकता व अनैतिकता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. नैतिकता /अनैतिकता का सवाल सामाजिक संरचना में अपना खास स्थान रखता है जबकि सेक्स या धर्म का सम्बंध व्यक्ति की सत्ता से है. मेरी दृष्टि में काम; सेक्स जीवन की मूल प्रतिज्ञा है. कुमार सम्भव – कालिदास, कामसूत्र – वात्सयायन, तक की हमारी समृद्ध परम्परा है.

विवाह संस्था को आप किस नजरिए से देखते हैं?
देखिए, विवाह संस्था का सर्वाधिक संत्रास स्त्रियों को ही भोगना पड़ा है. क्योंकि सामाजिक संरचना में पुरुषों का वर्चस्व सदा से बना रहा है स्त्रियों को सदैव ‘पुत्रवती भव’ का ही वरदान दिया जाता रहा. फलस्वरूप स्त्रियों की पहचान दर्ज नहीं हुई. विवाह संस्था का पहला उदेश्य सेक्स और संतानोत्पत्ति माना गया और कालांतर में इसे सामाजिक वैधता प्रदान की गई. लेकिन स्त्री आज अपनी स्वतंत्रता को समझ रही है. वह अपनी शक्ति, ऊर्जा तथा लक्ष्यों प्रति अधिक सजग है. उसके सुसुप्त गुण-सूत्र जागृत हो उठे हैं. विवाह आचार-संहिता अन्य संहिताओं की भांति समय-संदर्भ के सापेक्ष रही है. कालांतर में इसका स्वरूप यथावत बना रहे, यह जरूरी नहीं है.

पिछले कुछ समय से उपचुनाव वाले क्षेत्रों में हो रहे साम्प्रदायिक दंगे को आप किस तरह देखते हैं?
साम्प्रदायिकता का सबसे विकट विस्फोट बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ हुआ, तब एक पत्रिका निकली थी ‘परिवेश’. उसने एक पूरा अंक ही 6 दिसंबर पर केन्द्रित किया था. उसमें मेंरी कविता ‘गणित के प्रश्न’ छपी थी. लेकिन उससे भी पहले यह कविता ‘समकालीन जनमत’ के मुखपृष्ठ पर छपी थी. साम्प्रदायिकता, दो धार्मिक विश्वासों को उन्मादी बनाने की निन्दनीय चाल है. भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में सभी समुदाय परस्पर इतने घुले-मिले हैं कि अलग-अलग धार्मिक विश्वास का मनुष्य दूसरे देशों, समाजों, समुदायों के साथ-साथ रह रहा है. ऐसे में यह विद्वेष चल नहीं सकता क्योंकि वर्तमान में घुलनशील सर्वस्वीकृत समाज का स्वप्न धीरे-धीरे साकार होने को है. अब सांप्रदायिकता के कारतूस खाली हो चुके हैं उसके ध्वंशावशेष/ भिनभिनाहट यदा-कदा, यत्र-तत्र सुनाई देगी किंतु साम्प्रदायिक ताकतों की मंशा अब नहीं पूरी होगी.

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