खेमों का खामियाजा

इसके बाद तो लड़ाई अब पूरी तरह से सतह पर आ गई. नेताओं ने अपनी ही सरकार और मुख्यमंत्री को घेरना शुरू किया. अपने इस दूसरे कार्यकाल में हुड्डा भले ही कम सीटें लेकर आए थे लेकिन वे इस बार बेहद मजबूत होकर उभरे. हुड्डा ने बेहद आक्रामकता के साथ अपने विरोधियों का न सिर्फ मुकाबला करना शुरू किया बल्कि वे पूरी पार्टी को अपने नियंत्रण में लेने की तैयारी भी करने लगे.

2007 में ही फूलचंद मुलाना पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए थे. तब तक उनके अध्यक्ष बनने पर कोई खास हो-हल्ला नहीं मचा था. लेकिन जानकारों के मुताबिक आने वाले समय में जिस तरह से मुलाना ने हुड्डा के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया उससे सरकार और पार्टी के बीच का अंतर खत्म हो गया. 2011 में हिसार लोकसभा उपचुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद मुलाना ने इस्तीफा दे दिया था लेकिन उसके बाद भी आज तक वे प्रदेश अध्यक्ष के पद पर काबिज हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘जब आपका सीएम आपकी बात नहीं सुनता तो आप पार्टी के पास जाते हैं लेकिन यहां तो पार्टी अध्यक्ष भी सीएम के इशारों पर नाचता है.’ राज्य की राजनीति के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारद्वाज कहते हैं, ‘ मुलाना का अब तक का कार्यव्यवहार हुड्डा की कठपुतली जैसा रहा है.’ हालांकि मुलाना यह बात खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ‘लोग झूठ बोल रहे हैं. मैंने अपनी भूमिका अच्छे से निभाई है. जो कह रहे हैं कि सरकार और पार्टी में उनकी सुनवाई नहीं हो रही है, वे झूठे हैं. असल में वे सब महत्वाकांक्षा के मरीज हैं.

हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी शकील अहमद कहते हैं, ‘बड़ी विचित्र स्थिति है. कहीं से ये शिकायत आती है कि विधायक दल के नेता और प्रदेश अध्यक्ष एक-दूसरे को फूटी आंख भी नहीं देखना चाहते तो कहीं से ये खबर आ रही है कि प्रदेश अध्यक्ष सीएम की जेब में चला गया है. मुझे प्रभारी बने अभी कुछ ही दिन हुए हैं. थोड़ा इंतजार कीजिए, मैं स्थिति को देख-समझ रहा हूं. जल्द ही इस बारे में निर्णय होगा.’ शकील हरियाणा में कांग्रेसी नेताओं के बीच गुटबाजी और हुड्डा के विरोध को दबे शब्दों में स्वीकार तो करते हैं लेकिन इसका कारण समन्वय का अभाव बताते हैं.

BHUPENDRAहुड्डा के विरोधी मुख्यमंत्री को घेरने के पीछे किसी तरह की राजनीति से इनकार करते हैं. ईश्वर सिंह कहते हैं, ‘प्रदेश में दलितों के उत्पीड़न का मामला उठाना कहां से गलत है. इसमें क्या राजनीति है ?’ चौधरी वीरेंद्र सिंह भी कुछ ऐसी ही बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘अगर नेता अपने लोगों पर हो रहे अत्याचार, विकास में अपने क्षेत्र के साथ हो रहे भेदभाव का मामला उठाते हैं तो ये कहां से गलत है. ये जनप्रतिनिधि हैं. कल के दिन जब ये वोट मांगने जाएंगे तो जनता नहीं पूछेगी कि विधायक और सांसद रहते तुमने हमारे लिए क्या किया जबकि तुम्हारी अपनी सरकार राज्य में थी.’ विकास के मामले में सरकारी भेदभाव का शिकार हुए क्षेत्रों के बारे में बताते हुए वे कहते हैं, ‘गुड़गांव के विकास को आप हरियाणा का विकास नहीं मान सकते. मध्य हरियाणा के हिस्से जैसे जिंद, हिसार समेत फतेहाबाद, कैथल, कुरुक्षेत्र, करनाल आदि इलाकों में तो विकास का कोई नामोनिशां नहीं है.’

सामाजिक कार्यकर्ता नवीन जयहिंद इसे एक अलग नजरिये से देखते हुए कहते हैं, ‘यह कोई नई बात नहीं है. हरियाणा की राजनीति जाति, क्षेत्र और सरकारी नौकरियों के आस-पास ही घूमती है. जो भी सीएम बनता है, वह सबसे पहले अपनी जाति और क्षेत्र को प्राथमिकता पर रखता है. उनका विकास और उनको सरकारी नौकरी ही उसकी प्राथमिकता में रहते हैं. उसी परंपरा को हुड्डा आगे बढ़ा रहे हैं.’

फिलहाल हुड्डा ने प्रदेश कांग्रेस और सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है. हाल ही में जब चौधरी वीरेंद्र सिंह मंत्री बनते-बनते रह गए तो इसके पीछे हुड्डा का ही हाथ देखा गया. हुड्डा से नाराज कांग्रेसी नेताओं की कांग्रेस हाईकमान भी सुनवाई करता नहीं दिखता. सूत्रों के मुताबिक ये नेता कई बार राहुल गांधी के पास हुड्डा की शिकायत लेकर पहुंचे, लेकिन राहुल ने इनकी शिकायतों की लिस्ट को कचरे की पेटी में डाल दिया.

प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘किसके पास आप अपनी बात रखने जाएंगे. हाईकमान को भी लगता है कि हुड्डा सब कुछ अच्छा कर रहे हैं. वे उनकी आंखों का तारा बने हुए हैं. ऐसे में जो आवाज उठा रहा है वह हाईकमान की आंख की किरकिरी ही बनेगा.’ वरिष्ठ पत्रकार मीनाक्षी शर्मा कहती हैं, ‘हुड्डा के हाईकमान से मधुर संबंध की वजह से ही उनके विरोधी उन्हें कुछ खास नुकसान पहुंचा पाने में असफल रहे हैं.’

हालांकि हुड्डा पर हाईकमान की कृपा के तार उनके पुत्र दीपेंद्र हुड्डा की राहुल गांधी से नजदीकी समेत रॉबर्ट वाड्रा मामले से भी जुड़ते हैं जिसमें हुड्डा ने हरियाणा में हर तरह से सहयोग किया. इसके साथ पिछले साल चार नवंबर को दिल्ली में एफडीआई के समर्थन में हुई कांग्रेस की महारैली, जिसमें कांग्रेस शासित राज्यों में से सबसे ज्यादा लोग हरियाणा से हुड्डा ले आए थे, उससे भी हाईकमान की नजरों में हुड्डा की स्थिति मजबूत हुई. नवीन ग्रेवाल कहते हैं, ‘उस रैली में जुटाई भीड़ के माध्यम से हुड्डा ने हाईकमान के सामने काफी हद तक यह स्थापित कर दिया कि हरियाणा के वे सबसे बड़े नेता हैं.’

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