‘अगर हिंसा करनी पड़ी तो वो भी करूंगा’

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तो क्या इसलिए इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए आप सरदार पटेल समूह (एसपीजी) के साथ जुड़ गए?

वह समूह हमारे संगठन का हिस्सा कभी नहीं रहा और न ही हम कभी उसके साथ रहने की चाहत रखते थे. एसपीजी की तरह गुजरात में 5,000 पाटीदार समूह हैं. सिर्फ पाटीदार अनामत आंदोलन समिति ही है जो खासतौर पर पटेल समुदाय काे आरक्षण दिलाने के लिए संघर्ष कर रही है. हर छोटा समूह इस आंदोलन में हमारा साथ दे रहा है. एसपीजी ने भी हमारा साथ दिया था, लेकिन अब वे अलग हो गए हैं. इससे हमें कोई खास फर्क नहीं पड़ा है. यह तो हमारी समिति थी, जो एसपीजी को राज्य में आगे लेकर आई.

इसका मतलब आप पूरे आंदोलन को अपने कंधों पर आगे बढ़ा रहे हैं और खुद को अलग पहचान देने में लगे हुए हैं. अहमदाबाद में हुई अपनी रैली में आपने गुजरात से भाजपा सरकार को हटाने का भी जिक्र किया था. क्या इसे एक राजनीतिक उद्देश्य के तौर पर देखा जाना चाहिए?

मैं कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूं, लेकिन अगर मेरे मित्र आगे आना चाहते हैं और इस संगठन को राजनीतिक दल बनाने की इच्छा रखते हैं तो मैं हमेशा उनकी मदद करूंगा. अगर हमारे पास रिमोट है तो हम सरकार को बदल सकते हैं. हम भाजपा या कांग्रेस को नहीं चाहते. हम उनके साथ हैं, जो हमारा समर्थन करते हैं. हम लोगों से अपील करेंगे कि अगर हमारी मांगों को पूरा नहीं किया जाता तो 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में वे नोटा (नन ऑफ द अबव) बटन दबाएं. मैं शिवसेना की तरह एक ऐसा संगठन बनाना चाहता हूं, जो लोगों के अधिकारों के लिए लड़े और उनकी तकलीफों का ख्याल रखे. हमारी कार्यप्रणाली में दोहरापन नहीं है. हम वही करते हैं जो कहते हैं. मैं भी वहीं करूंगा जो सही है, वह भी पूरी दबंगई के साथ.

क्या आप खुद को बालासाहब ठाकरे की तरह देखते हैं?

हां, मैं खुद को उनकी स्थिति में देखता हूं. उनके फैसले पूरी राजनीतिक कार्यप्रणाली का रुख बदले सकते थे. उन्होंने हमेशा सही किया. उनके पास जो ताकत थी, उसकी बात ही अलग है.

आपको हिरासत में लिए जाने के बाद गुजरात में दंगे जैसी स्थितियां बनने के बारे में आपका क्या कहना है? क्या हिंसा फैलने की स्थिति में भी आप आंदोलन को आगे बढ़ना चाहेंगे?

अगर सही तौर पर हिंसा करनी पड़ी तो वो भी करूंगा. गुजरात में जो कुछ भी हुआ उसके लिए सरकार और पुलिस जिम्मेदार है. जिस तरह पुलिस ने लोगों को घरों में घुसकर पीटा और महिलाओं के साथ बदसलूकी की, वह कहीं से भी न्यायोचित नहीं था. अगर मेरे पास ताकत और अधिकार होंगे तो मैं ऐसे पुलिसवालों को पीटने का कोई भी मौका नहीं गंवाऊंगा. उन्हें लगता है कि वे हिटलर या जनरल डायर हैं.

क्या आपको नहीं लगता कि इस तरह का दृष्टिकोण हिंसा को और बढ़ाता है?

अगर वे हिंसक हो सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? वे सरकार का हिस्सा हैं और तब वे ऐसा कर रहे हैं. हम तो आम लोग हैं, तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? अगर पुलिस ने इस तरह से काम किया तो लोग इसका विरोध जताने के लिए आगे आएंगे. आम लोगों के लिए मेरा संदेश है कि वे व्यवस्था बनाए रखें और तब तक हिंसा न करें, जब तक कि कोई उनके घरों में घुसकर उनसे मारपीट न करे.

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